Uttarakhand crisis:कैसे RSS प्रचारक से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे त्रिवेंद्र सिंह रावत
देहरादून: पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड बीजेपी में जारी घमासान के बाद राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने आखिरकार मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे ही दिया है। पहले यह संभावना जताई जा रही थी कि नेतृत्व परिवर्तन का फैसला पांच राज्यों के मौजूदा विधानसभा चुनावों तक टल सकता है। लेकिन, आखिरकार सीएम ने देहरादून में राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। माना जा रहा है कि बीजेपी सेंट्रल लीडरशिप ने विधायकों के एक वर्ग में उनके खिलाफ पैदा हुए असंतोष और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मिली फीडबैक के आधार पर उन्हें ऐसा करने को कहा है। बहरहाल आइए जानते हैं कि आरएसएस के एक स्वयं सेवक से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का उनका सियासी सफर कैसा रहा है।

2002 में उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में जीते थे
त्रिवेंद्र सिंह रावत की उत्तराखंड के 9वें मुख्यमंत्री पद पर 18 मार्च, 2017 को ताजपोशी हुई थी। उन्होंने पिछले 20 दिसंबर को ही अपना 60वां जन्मदिन मनाया है। भाजपा के जिन नेताओं का उन्हें बेहद करीबी बताया जाता है, उसमें खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। गौरतलब है कि जब रावत को चार साल पहले भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया था, तब शाह ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। पिछले विधानसभा चुनाव में वो राज्य के डोईवाला विधानसभा सीट से चुने गए थे, जो उनकी परंपरागत सीट रही है। इस क्षेत्र का वह 2002 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव और 2007 के विधानसभा चुनाव में भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
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2007 में राज्य के कृषिण मंत्री बने त्रिवेंद्र सिंह रावत
2007 में चुनाव जीतने के बाद उन्हें प्रदेश की बीजेपी सरकार में कृषि मंत्री बनाया गया था। इस पद पर वो 2012 तक रहे। रावत उत्तराखंड प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और झारखंड में पार्टी के प्रभारी महासचिव की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। 20 दिसंबर, 1960 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के पौड़ी गढ़वाल के खैरासैंण गांव में जन्मे त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राजनीति में उतरने पहले जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रैजुएशन किया था। लेकिन, इस दौरान वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ भी लंबी पारी खेल चुके हैं।

लंबे समय तक आरएसएस प्रचारक रहे हैं रावत
त्रिवेंद्र सिंह रावत 1979 से 2002 तक आरएसएस से बहुत ही सक्रिय तौर पर जुड़े रह चुके हैं। यह वही दौर था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संघ में विभिन्न जिम्मेदारी निभा रहे थे। 1983 से 2002 तक इन्होंने देश के कई हिस्सों में संघ के प्रचारक की भूमिका निभाई थी। शायद यही वजह है कि पार्टी संगठन में रावत को संघ का आदमी माना जाता है, जिनकी वर्किंग स्टाइल शायद राजनीति के धुरंधर पार्टी नेताओं को कहीं ना कहीं खटकता रहा है। बीजेपी की राजनीति शुरू करने से पहले वो संघ के उत्तराखंड क्षेत्र के संगठन महामंत्री का कार्यभार संभाल चुके हैं। 2000 में जब अटल बिहारी की सरकार ने नए राज्य का गठन किया तो उन्हें प्रदेश के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी मिली।

विधायकों में बढ़ रहा था असंतोष
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड बीजेपी में उनके खिलाफ बगावत के सुर ज्यादा ही बुलंद होने शुरू हो गए थे। खासकर कैबिनेट विस्तार का मसला टलते जाने से पार्टी नेताओं में नाराजगी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं। वहां की जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह और प्रदेश के प्रभारी महासचिव दुष्यंत गौतम को देहरादून भेजा था, जिनसे मिलने वाले विधायकों ने खुलकर सीएम के खिलाफ अपना असंतोष जाहिर किया था। लग रहा था कि नेतृत्व किसी तरह से मुख्यमंत्री बदले जाने की मांग को पांचों राज्यों में चुनाव तक टालने की कोशिश करेगा, लेकिन शायद उसने महसूस किया कि तबतक बहुत ज्यादा देर हो जाएगी, इसलिए उनकी जगह नए नेता को जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कर लिया गया।












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