विधानसभा चुनाव में वेस्ट यूपी से क्यों गायब हो गया ये अहम और बड़ा मुद्दा, जानिए
लखनऊ, 10 फरवरी: उत्तर प्रदेश में एक अलग हरित राज्य के रूप में पश्चिम यूपी की मान्यता का एक लंबा इतिहास रहा है। यह मांग सबसे पहले चौधरी चरण सिंह ने की थी। इसके बाद उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह इस मुद्दे पर सक्रिय रहे। ऐसे में वेस्ट यूपी के लोगों के दिलों में हरित प्रदेश का सपना भी पनपने लगा। समय-समय पर बीजेपी और बसपा ने भी इस मांग का समर्थन किया, लेकिन इस चुनाव में ग्रीन स्टेट का मुद्दा गायब होता दिख रहा है।

तमाम वादों के बीच हरित प्रदेश का मुद्दा गायब
इस चुनाव में सबकी नजर वेस्ट यूपी पर है। जहां राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए एक से बढ़कर एक वादे कर रहे हैं और कई पुराने मुद्दे भी गर्म हैं, लेकिन इन तमाम वादों और मुद्दों के बीच पश्चिम यूपी सबसे बड़ा मुद्दा यानी ग्रीन रीजन (हरित प्रदेश) का मामला है। एक तरफ जहां बीजेपी समेत बसपा ने इस चुनाव में इस मुद्दे से दूरी बना रखी है. तो वहीं इस मुद्दे को लेकर वेस्ट यूपी इस चुनाव में राजनीतिक जमीन को और मजबूत करने वाली राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) भी इस चुनाव में हरित राज्य को लेकर मस्त दिख रही है. आलम ये है कि रालोद के वजूद को बचाने की कोशिश में सिर्फ जयंत चौधरी ही इस मुद्दे को भूल गए हैं।
एक बार चौधरी चरण सिंह ने हरित राज्य का नारा लगाया था
वेस्ट यूपी के विकास में समान भागीदारी की मांग को लेकर हरित राज्य के गठन का मुद्दा समय-समय पर गर्म होता रहा है, लेकिन हरित राज्य बनाने की मांग आजादी के बाद से ही शुरू हो गई थी। 1953 में पहली बार चौधरी चरण सिंह ने राज्य पुनर्गठन आयोग से पश्चिम यूपी को अलग राज्य घोषित करने की मांग की। इस संबंध में 97 विधायकों ने भी मांग पत्र का समर्थन किया। आयोग के सदस्यों ने भी राज्य के बंटवारे के प्रस्ताव पर अपनी सिफारिशें दी थीं। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो यह तय हुआ कि अब उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से को एक अलग राज्य में तब्दील किया जाएगा। इसके लिए 1978 में विधायक सोहन लाल सिंह ने विधानसभा में वेस्ट यूपी को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन केंद्र की सहमति के बिना यह संभव नहीं हो सका।

हरित प्रदेश के मुद्दे को अजीत सिंह ने आगे बढ़ाया
इसके बाद अपने पिता के इस वादे को चौधरी अजीत सिंह ने आगे बढ़ाया। इसके बाद 90 के दशक में जयदीप सिंह बराड़ और चौधरी अजीत सिंह ने हरित राज्य की मांग को हवा दी। बाद में चौधरी अजीत सिंह इस मामले को संसद में ले गए। इससे अजीत चौधरी को भी काफी फायदा हुआ। जिसे वह पश्चिम यूपी में अपनी जमीन बचाने में कामयाब रहे, लेकिन इस मामले को लेकर वह कभी भी सड़क पर आंदोलन नहीं कर पाए और ग्रीन स्टेट की बात ठंडे बस्ते में डाल दी गई। हालांकि इसके बाद भी कई बार ग्रीन स्टेट बनाने की मांग उठाई जा चुकी है। जिसके तहत जयंत चौधरी कई बार ग्रीन स्टेट बनाने का वादा भी कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी रालोद पिछले साल से इस मामले पर खामोश है।

बसपा सरकार ने भी यूपी के बंटवारे का समर्थन किया है
बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी देश की सबसे बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश के विभाजन का समर्थन किया था। मायावती ने खुद 2007 के शासन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग की थी। वहीं, बीजेपी भी उत्तर प्रदेश के बंटवारे के पक्ष में रही है, लेकिन 2012 में सपा सरकार के सत्ता में आने के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। वहीं 2017 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद इसे लेकर काफी अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ।












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