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संगठन का "कलेवर" बदलने से मायावती की 2024 की राह होगी आसान या बदलने पड़ेंगे "तेवर" ?

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लखनऊ, 01 जुलाई : उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती 2007 के बाद से ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव में लगातार हार का सामना कर रही हैं। 2007 के बाद से ही बसपा लगातार पांच चुनाव हार चुकी है। मायावती ने अब संगठन का कलेवर बदलकर आम चुनाव से पहले पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर जोश भरने का प्रयास किया है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मायावती क्या सिर्फ संगठन का कलेवर बदलकर आम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर ले जाएंगी ये सबसे बड़ा सवाल है। दरअसल मायावती ने पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों को जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने और अपना समर्थन आधार बढ़ाने के लिए सदस्यता अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है। यह सारी कवायद 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से की जा रही है।

बैठक में मायावती ने यूपी को 6 जोन में बांटा

बैठक में मायावती ने यूपी को 6 जोन में बांटा

दअरसल मायावती ने अब बसपा को यूपी के लिहाज से 6 जोन में बांट दिया है जिसमें हर जोन की जिम्मेदारी दो नेताओं को सौंपी गई है। जोन एक में मेरठ-मुरादाबाद-सहारनपुर को शामिल किया गया है और इसकी जिम्मेदारी राजकुमार गौतम और नौशाद अली को सौंपी गई है। जोन 2 में आगरा-अलीगढ़-बरेली मंडल को शामिल किया गया है और इसकी कमान मुनकाद अली और सूरज सिंह को मिली है। इसी तरह जोन 3 में कानपुर-झांसी-चित्रकूट मंडल को शामिल किया गया है और इसकी जिम्मेदारी डॉ विजय प्रताप और वी पी अंबेडकर को सौंपी गई है। जोन 4 में गोरखपुर-देवीपाटन-बस्ती को शामिल किया गया है। इसकी कमान सुधीर भारती और दिनेश चंद्रा को सौंपी गई है। जोन 5 में अयोध्या-आजमगढ़-वाराणसी को शामिल किया गया है इसका काम शमशुद्दीन राइन और मदन राम को मिली है। इसी तरह जोन 6 में लखनऊ-प्रयागराज-मिर्जापुर मंडल को शामिल किया गया है और इसकी कमान घनश्याम चंद्र खरवार, अखिलेश अंबेडकर और शमशुद्दीन राइन को सौंपी गई है।

मुस्लिम समुदाय को गुमराह होने से बचाएगी बसपा

मुस्लिम समुदाय को गुमराह होने से बचाएगी बसपा

लखनऊ में पार्टी की राज्य इकाई के कार्यालय में बसपा नेताओं और पदाधिकारियों की एक बैठक की अध्यक्षता की थी। इस दौरान बैठक में मौजूद एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि बसपा का उत्तर प्रदेश में मजबूत समर्थन आधार है। प्रतिद्वंदी दलों द्वारा अपनाई गई चालों के साथ-साथ उनके जातिवादी और सांप्रदायिक एजेंडे के कारण, एक विशेष समुदाय (मुसलमान) को (2022 यूपी) विधानसभा चुनाव के दौरान गुमराह किया गया था। उन्होंने विधानसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवारों का समर्थन नहीं किया। मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने के लिए प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा शुरू किए गए प्रचार का मुकाबला करने के लिए पार्टी नेताओं को सतर्क रहना होगा।

सपा ने लगाया था बीजेपी-बीएसपी में मिली भगत का आरोप

सपा ने लगाया था बीजेपी-बीएसपी में मिली भगत का आरोप

दरअसल आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में अपनी हार के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) ने आरोप लगाया था कि बसपा मुस्लिम वोटरों को बांटने के लिए बीजेपी के साथ मिलकर काम कर रही है। तब सपा नेता धर्मेंद्र यादव ने दावा करते हुए कहा था कि एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को समर्थन भाजपा और बसपा के बीच समझौते को दर्शाता है। हालांकि बसपा ने अपनी दलील में यह कहा था कि विपक्षी दलों ने अपने संयुक्त राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर फैसला करते समय बसपा को विश्वास में नहीं लिया था।

एक खास समुदाय को टारगेट कर रही सरकार

एक खास समुदाय को टारगेट कर रही सरकार

बसपा के नेता ने बताया कि भाजपा सरकार द्वारा अपनाई गई गलत नीतियों के कारण उत्तर प्रदेश में स्थिति बिगड़ गई है। बेरोजगारी, महंगाई और गरीबी में वृद्धि हुई है। शांति और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए राज्य सरकार को आपराधिक और असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। लोगों का ध्यान भटकाने के लिए, भाजपा सरकार ने एक समुदाय के खिलाफ दमनकारी नीति शुरू की है। मकान तोड़े जा रहे हैं, लोगों को जेलों में बंद किया जा रहा है और एक खास समुदाय पर अत्याचार हो रहे हैं।

आदिवासी महिला का समर्थन कर रही बसपा, बीजेपी की नहीं

आदिवासी महिला का समर्थन कर रही बसपा, बीजेपी की नहीं

बीजेपी के राष्ट्रपति उम्मीदवार को समर्थन करने के सवाल पर बसपा नेता ने कहा कि बैठक के दौरान बसपा प्रमुख ने पार्टी नेताओं से एनडीए के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने के बसपा के फैसले के बारे में लोगों को जागरूक करने का आग्रह किया। बसपा किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति को नहीं बल्कि अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार का समर्थन कर रही है। आदिवासी एक वंचित समुदाय हैं और बसपा अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है। मुर्मू को समर्थन देने का फैसला न तो एनडीए समर्थक है और न ही यूपीए विरोधी बल्कि बसपा नेतृत्व का स्वतंत्र फैसला है।

केवल संगठन का कलेवर नहीं अपने तेवर भी बदलें मायावती

केवल संगठन का कलेवर नहीं अपने तेवर भी बदलें मायावती

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं कि संगठन का कलेवर बदलना एक बेहतर पहल है लेकिन सबसे अच्छा तब होगा जब मायावती कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर सामने आकर पार्टी को लीड करें। दरअसल मायावती केवल पर्दे के पीछे से काम करना चाहती हैं वहीं दूसरी तरफ अमित शाह जैसे नेता गली मुहल्ले में जाकर पर्चा बांटते हैं। इन दो बातों से आप राजनीति के तरीकों को समझ सकते हैं। अच्छी बात है कि संगठन में बदलाव कर रही हैं और वो समय समय पर होते रहना चाहिए लेकिन जब तक वो सामने आकर अपने कार्यकर्ताओं को लीड नहीं करेंगी तब तक उनकी 2024 की राह आसान होने वाली नहीं है।

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English summary
UP: Will Mayawati's road to 2024 be easier by changing the outfit's mood?
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