UP Civic Polls: यूपी निकाय चुनाव परिणाम के ये पांच सबक समझ लीजिए
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के परिणाम ने एक बार फिर से कांग्रेस और सपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जिस तरह से माना जा रहा था कि यूपी के चुनाव में भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर होगी, उससे उलट इस बार के चुनाव में बसपा ने अपनी धमक दिखाते हुए कई जगह पर भाजपा को सीधी टक्कर दी और दूसरे पायदान पर रही है। एक तरफ जहां कांग्रेस और सपा प्रदेश की 16 मेयर सीटों में से एक पर भी अपना खाता नहीं खोल पाई हैं, तो दूसरी तरफ बसपा ने दो सीटों पर जीत दर्ज कर ली है और दो पर उसकी बढ़त है। इस चुनाव परिणाम ने ना सिर्फ सपा को बड़ा झटका दिया है, बल्कि गुजरात चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकने में जुटी कांग्रेस को भी बड़ा झटका दिया है। यूपी के निकाय चुनाव ने कई राजनीतिक संकेत दिए हैं, आईए डालते हैं उनपर नजर

योगी राज में जनता की आस्था
जिस वक्त यूपी में भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया, ऐसा कहा जा रहा था कि यह परिणाम भाजपा के लिए तुक्का है और लोगों ने मोदी लहर में अपना वोट दिया है। लेकिन योगी सरकार को छह महीने से अधिक का समय हो गया है और पार्टी ने जिस तरह से निकाय चुनाव में प्रदर्शन किया है उससे साफ हो गया है कि लोगों ने योगी सरकार के कामकाज में भरोसा जताया है। निकाय चुनाव जाति और धर्म के आधार की बजाए स्थानीय मुद्दों और साफ सफाई पर होते हैं, ऐसे में ये परिणाम योगी सरकार के कामकाज के प्रति लोगों का भरोसा दिखाते हैं। ऐसे में विपक्ष के तमाम आरोपों के खिलाफ भी योगी सरकार को लोगों का साथ मिला है।

शहरों में बीजेपी का हमेशा की तरह दबदबा
भाजपा को हमेशा से शहरी पार्टी के तौर पर जाना जाता है, लिहाजा जिस तरह से निकाय चुनाव में पार्टी ने प्रदर्शन किया है उससे साफ है कि पार्टी अभी भी शहरों में लोकप्रिय है और लोग अभी भी साफ सफाई के लिए भाजपा को ही पसंद करते है, यह रुझान से साफ हो गया है।

बसपा का बाउंस बैक करना
निकाय चुनाव में एक बड़ा चौकाने वाला परिणाम यह आया है कि बसपा ने अप्रत्याशित प्रदर्शन किया और सपा कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। इस परिणाम के साथ ही एक बार फिर से मायावती की पार्टी ने अपनी उपस्थिति को दर्ज कराया है, जिसने साफ कर दिया है कि पार्टी में अभी भी दमखम बाकी है।

सपा अब भी सदमे से नहीं उभरी
जिस तरह से समाजवादी पार्टी ने प्रदेश के निकाय चुनाव में हताश करने वाला प्रदर्शन किया है, उससे साफ हो गया है कि पार्टी के भीतर जिस तरह से यादव परिवार में कलह शुरू हुई और विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा, अभी भी सपा उस सदम से बाहर निकलने में सफल नहीं हुई है। पार्टी एक भी जगह मेयर पद का खाता तक नहीं खोल पाई। पार्टी को परिवार के बीच मचे घमासान का अब भी असर देखने को मिल रहा है।

कांग्रेस को गढ़ बचाने की चुनौती
एक तरफ जहां यूपी में भाजपा ने हर तरफ भगवा का परचम लहराया है, तो देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर अब अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है, पहले लोकसभा चुनाव, फिर विधानसभा चुनाव और अब निकाय चुनाव में पार्टी का शर्मनाक प्रदर्शन पार्टी के नेताओं के लिए बड़ी मुश्किला का विषय है। यूपी में अब कांग्रेस को नाक बचाना तक मुश्किल हो रहा है, पार्टी को अपने गढ़ अमेठी में भी हार का सामना करना पड़ा है। बहरहाल देखने वाली बात यह है कि कहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के हाथ से यह सीट भी ना निकल जाए।
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