यूपी उपचुनाव: क्यों खास हैं फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे, पड़ेंगे ये 5 असर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में उपचुनाव के आज नतीजे आएंगे, हालांकि प्रदेश की सिर्फ दो सीटों पर ही उपचुनाव हुआ था, लेकिन इस चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है। यह उपचुनाव इसलिए भी बेहद खास हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ना सिर्फ बंपर जीत दर्ज की थी, बल्कि पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने प्रचंड जीत दर्ज करके सबको चौंका दिया था। लिहाजा इस उपचुनाव के नतीजों को भाजपा की लोकप्रियता के पैमाने के तौर पर देखा जा रहा है। इस चुनाव के नतीजे इस बात को निर्धारित करेंगे कि आने वाले समय में प्रदेश और देश की सियासत का रुख क्या होगा।

यूपी की जनता का मूड सामने आएगा
19 मार्च को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर रही है, ऐसे में दोनों ही लोकसभा सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन प्रदेश की जनता का रुख साफ करेगा कि क्या लोग भाजपा की नीतियों से संतुष्ट हैं या फिर महज एक साल के भीतर ही लोगों का योगी सरकार में भरोसा कम होने लगा है। गोरखपुर और फूलपुर दोनों ही सीटें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई हैं। लिहाजा दोनों ही सीटें काफी है, ऐसे में पार्टी की साख इन दोनों ही सीटों पर दांव पर लगी है।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की परीक्षा
2014 के बाद जिस तरह से 2017 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की चुनावों में दुर्दशा हुई थी, उसके बाद दोनों ही पार्टियों के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है। दोनों ही दलों ने अपने आपसी मतभेद को सामने रखकर इस उपचुनाव में गठबंधन किया है। ऐसे में अगर इन दोनों ही सीटों पर सपा के उम्मीदवार को जीत मिलती है तो यह भविष्य में दोनों दलों के गठबंधन की संभावनाओं को और प्रबल करेगी।

2019 के गठबंधन पर विचार
हालांकि मायावती ने इस समझौते के बाद साफ किया था कि यह गठबंधन नहीं है बल्कि महज एक समझौता है इस उपचुनाव के लिए, लेकिन निश्चित तौर पर चुनाव के नतीजे अगले वर्ष होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच समझौते की नींव डाल सकती है। बहरहाल देखने वाली बात यह होगी कि अगर इस उपचुनाव में सपा के दोनों उम्मीदवार को जीत नहीं मिलती है तो 2019 में सपा-बसपा के बीच किस गठबंधन होता है या नहीं। दोनों ही दलों के सामने यह भी मजबूरी है कि जहां लगातार भाजपा मजबूत हो रही है, ऐसे में अकेले दोनों दल कैसे भाजपा का मुकाबला करेंगे।

मोदी और योगी सरकार की नीतियों का टेस्ट
मोदी सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में प्रवेश कर रही है और योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल को एक वर्ष पूरा हो रहा है। हालांकि योगी सरकार का अभी एक वर्ष ही पूरा हो रहा है, लेकिन मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल के बाद इस उपचुनाव को मोदी-योगी सरकार की नीतियों की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है। इस उपचुनाव के नतीजे यह साफ करेंगे कि लोग पार्टी की नीतियों से खुश हैं या फिर लोगों में असंतोष है। आपको बता दें कि 11 मार्च को दोनों ही सीटों पर मतदान हुआ था।
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