पढ़ें-आजम खां के नाम पत्रकार का खुला खत!

माननीय आजम खां साहब,

माफ कीजिएगा पर मैं आपको आदरणीय कहने का गुनाह नहीं कर सकता। जिसकी कई वाजिब वजहें हैं। कल तक आपकी जुबान को एक खास धर्म पर फिसलते हुए देखकर जरा सा भी आश्चर्य नहीं होता था। क्योंकि सियासत की खातिर प्रेरित लोगों के वादों की अहमियत भी समाज भली भांति जानता है, और वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए आजमाए जाने वाले पैतरों से भी करीबन सभी परिचित हैं। कुलमिलाकर ये सब नया बिलकुल भी नहीं था।

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एक इंटरव्यू सुना था...जिसे काफी वक्त गुजर चुका है। उसमें आपने मजहबी लोगों के प्रति काफी हमदर्दी दर्शाई थी। एंकर से सवाल पूछते हुए कहा था कि आप बताईये कि क्या खाड़ी में फेंक दिया जाए। जी नहीं। बिलकुल भी नहीं। कोई भी मजहब हो, या फिर धर्म दिल दुखाने की इजाजत नहीं देता।

गौ हत्या को मुद्दे के तौर पर आपने उठाते हुए कहा था कि गाय के ज़बीहे पर पाबंदी लगाई तो वो मुसलमान बादशाह बाबर थे, गाय के ज़बीहे पर सबसे बड़ी सजा तय की तो वो बहादुर शाह जफर थे। आपके मुताबिक उन्होंने फांसी की सजा तय की थी। लेकिन अखलाक के घर से लिए गए मीट के सैंपल्स की जांच में तो ये तय हो गया है न कि वो गाय या फिर गाय के बछड़े का था। तो सजा तो उसके लिए भी बनती थी। वो भी फांसी की। हां इसे निश्चित तौर पर गलत मानूंगा कि भीड़ ने

पहले तो अपराध तय किया और फिर सजा दे दी। लेकिन भीड़ को एक रंग देने की कोशिश करने वाला कौन था ? मानता हूं आप सरकार में हैं, आपकी भैंस का भी एक अलग ही भौकाल मेनटेन है। पर, इस दफे आपने अपनी जुबान को जिस तरह से पटका है उम्मीद करता हूं कि आपको बायलाइन से भी बायकॉट कर दिया जाए।

समाज को दो फांकों में बांटने की राजनीति करने की इजाजत क्या वाकई आपका खुदा देता है। बिलकुल भी नहीं, हमारा ईश्वर भी नहीं देता और न ही देता है वो परमेश्वर...जिसके संदर्भ में कहा जाता है कि हमारे पापों की क्षमा के लिए वो खुद सूली पर चढ़ गया। एक बात हर बार समझ से ऊपर निकल जाती है कि क्यों जब ईश्वर, अल्लाह, गुरू, परमेश्वर को एक बताया गया तो हम क्यों उन्हें अलग-अलग खेमों में रख लेते हैं।

दरअसल इसकी वजह है आप जैसे सियासी लोग। जो टकराव में नफा तलाशते हैं। मैं नहीं कह रहा कि इस बंटवारे पर घी डालने का काम आप ही महज अकेले दम पर कर रहे हैं। हां इसमें दूसरे खेमे से भी कई लोग मोर्चा संभाले हुए हैं। लेकिन इंटरव्यू में आपकी जुबान पर जब इन शब्दों को सरकता हुआ पाया ( जब यहां के बहुसंख्यक ही तय कर लेंगे कि अल्पसंख्यकों को नहीं
रखना है तो भला कैसे रह लेंगे )....। जिससे आपको राजनीति की दरिद्र होती स्थिति के नाम पर कठघरे में जरूर खड़ा हुआ पाया।

बहरहाल आपको ये भी बताता चलूं कि 2011 की जनगणना के मुताबिक 17.22 करोड़ अल्पसंख्यक भारत के विकास के कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। रही बात आपसी मतभेद की तो उस आग को हवा देने वालों की फेहरिस्त में आप भी अव्वल नंबर पर हैं। और ज़रा खुद के इतर और लोगों से सवाल कीजिएगा कि कौन किसे नहीं रहने दे रहा।

जवाब आएगा सियासत, सियासत और सियासत।

इन सबके इतर आपको एक बात से और रूबरू कराना चाहूंगा कि लोग आपको समझने लगे हैं, चर्चित शायर मुनव्वर राना साहब से बातचीत के दौरान तो उन्होंने आपको मुसलमानों का आदित्यनाथ तक कह दिया था। लेकिन ताजा बयान के बाद आप उस तमगे से भी कहीं ऊपर खड़े नजर आ रहे हैं।

जी हां उसी बयान की बात कर रहा हूं जो आपने बुलंदशहर के स्याना में दिया। "80 फीसदी मुसलमान रोजे नही रखते और झूठ बोलते हैं, जो मालिक का नहीं वो कुत्ते से बदतर है"...काश ! कभी आपने जो रोजे नहीं रख पाते उनमें से कुछ लोगों से कारण भी पूंछा होता। तलाशिएगा कितने लोगों को आपके इस बयान से दुख पहुंचा है। और इसकी सजा क्या है ?

एक जिम्मेवार पत्रकार
हिमांशु तिवारी आत्मीय

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