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'आज उनकी आत्मा तृप्त हुई', कौन थे अशोक सिंघल, महंत रामचंद्र और डालमिया जी, जिनको याद कर भावुक हुए मोहन भागवत

RSS Mohan Bhagwat On Ram Mandir Dhwajarohan 2025: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भावुक दिखे। उन्होंने कहा कि राम मंदिर आंदोलन में अपना जीवन, समय और समर्पण लगाने वाले अनगिनत लोगों की "आत्मा आज तृप्त हुई होगी।'' उन्होंने अपने बयान में अशोक सिंघल, महंत परमहंस रामचंद्र दास और विष्णु हरि डालमिया का नाम लिया। भागवत ने यह भी कहा कि "रामराज्य का ध्वज, जो कभी विश्व को शांति और समृद्धि का संदेश देता था, आज फिर अपने शिखर पर लहरा रहा है।''

मोहन भागवत ने कहा कि यह सिर्फ एक मंदिर का उद्घाटन नहीं, बल्कि उन पीढ़ियों के संघर्ष की पूर्णता है जिन्होंने सदियों तक इस दिन का इंतजार किया। उन्होंने कहा, "कई लोगों ने सपना देखा, कई ने प्रयास किए और कई ने अपने प्राण अर्पित किए। आज उनकी आत्माएं तृप्त होंगी। अशोक जी, महंत रामचंद्र दास जी, डालमिया जी को आज वास्तविक शांति मिली होगी। हमने अपनी आंखों से 'शास्त्रीय प्रक्रिया' का पूर्ण होना देखा है।''

RSS Mohan Bhagwat On Ram Mandir Dhwajarohan 2025

उनके इस बयान ने अशोक सिंघल, महंत परमहंस रामचंद्र दास और विष्णु हरि डालमिया को चर्चा में ला दिया है। आखिर कौन थे ये लोग और क्यों इनके बलिदान को याद करते ही मोहन भागवत की आवाज भर आई?

🟡 अशोक सिंघल कौन थे? आंदोलन की रीढ़ माने जाते थे

अशोक सिंघल (1926-2015) विश्व हिंदू परिषद के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे।
• वे दो दशक से अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष रहे।
• राम जन्मभूमि आंदोलन को संगठित करने और इसे जन-जन तक पहुंचाने में उनका योगदान निर्णायक माना जाता है।

कई सालों तक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हुए भी उन्होंने खुद को आंदोलन से कभी अलग नहीं किया। 2015 में निधन तक वे इसके लिए सक्रिय रहे। आंदोलनकारी नेताओं में उन्हें सबसे बड़ा वैचारिक स्तंभ माना जाता है।

🟡 महंत परमहंस रामचंद्र दास-जिन्हें 'चलता-फिरता पुस्तकालय' कहा गया

महंत परमहंस रामचंद्र दास का जन्म 1913 में बिहार में हुआ था। बचपन का नाम चंद्रेश्वर तिवारी था। करीब 17 साल की उम्र में वे अयोध्या आए और दिगंबर अखाड़े में दीक्षा लेकर परमहंस रामचंद्र दास बने। राम जन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती वर्षों में वे सबसे मुखर और अग्रिम पंक्ति के संतों में रहे।

• उन्होंने आयुर्वेद की पढ़ाई पटना से की थी।
• वेद, पुराण और रामायण के अद्भुत विद्वान थे।
• करपात्री जी महाराज उन्हें चलता-फिरता पुस्तकालय कहते थे।
• उनकी वाणी की प्रभावशीलता ऐसी थी कि उन्हें "प्रतिवादी भयंकर'' की उपाधि भी दी गई।

🟡 विष्णु हरि डालमिया-VHP के वह नेता जिनका पूरा जीवन आंदोलन को समर्पित रहा

विष्णु हरि डालमिया विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष थे।डालमिया को आंदोलन का रणनीतिक चेहरा कहा जाता था। वे न सिर्फ संगठनात्मक रूप से मजबूत रहे, बल्कि आर्थिक और जनसमर्थन जुटाने में भी उनकी अहम भूमिका थी।

• 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संचालकों में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।
• 6 दिसंबर 1992 के मामले में भी वे सह-अभियुक्त रहे।
• 2019 में 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।

मोहन भागवत के भाषण की बड़ी बातें?

🔹ध्वजारोहण उत्सव में आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, ''आज हम सबके लिए एक सार्थकता का दिन है। इतने लोगों ने सपना देखा, इतने लोगों ने प्रयास किए, इतने लोगों ने अपने प्राण अर्पण किए आज उनकी आत्मा को तृप्त हुई होगी। आज वास्तव में अशोक जी को वहां शांति मिली होगी। उन्होंने अपना प्राण अर्पण किया और अपना पसीना बहाया तथा जो पीछे रहे वो भी मन में इच्छा करते रहे कि मंदिर बनेगा-बनेगा और आज मंदिर निर्माण की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। ध्वजारोहण हो गया। हमने इसे अपनी आंखों से देखा है।"

🔹मोहन भागवत ने कहा, "हिंदुओं ने 500 साल के संघर्ष में अपना 'सत्व' साबित किया है। आज राम लला विराजमान हैं और मंदिर बनकर तैयार है। अब हमें ऐसा भारत बनाना है जो पूरी दुनिया को सत्य का मार्ग दिखाए। यह राम मंदिर - सत्य और धर्म का प्रतीक - आज खड़ा है। धर्म, ज्ञान और सत्य को दुनिया तक पहुंचाने का कार्य शुरू हो चुका है और हमें हर बाधा के बावजूद साहस के साथ आगे बढ़ना होगा। आज कृतज्ञता का दिन है और उन संकल्पों को याद करने का दिन है जो हमारे पूर्वज हमें सौंपकर गए थे। इस देश में जन्म लेने वाले सभी बड़े भाई की तरह हैं और दुनिया की हमसे बहुत अपेक्षाएँ हैं, जिन्हें हमें पूरा करना है।"

🔹मोहन भागवत ने यह भी कहा, "राम राज्य का जो ध्वज कभी अयोध्या में ऊंचा लहराता था और दुनिया को शांति व समृद्धि का संदेश देता था, वह आज अपने 'शिखर' पर स्थापित हो गया है और हमने इसे अपनी आँखों से देखा है। ध्वज एक प्रतीक है... मंदिर निर्माण में समय लगा। 500 साल की बात अलग भी कर दें, तो भी यह 30 साल की लंबी प्रतीक्षा थी।"

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