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Premanand Maharaj: मांस खाने वालों ने किया ये काम तो होगा बड़ा अनर्थ! प्रेमानंद महाराज ने किया सचेत

Premanand Maharaj: बहुत से लोग घर में भगवान कृष्ण के बाल रूप, ठाकुर जी की प्रतिमा रखकर उनकी सेवा और पूजा करते हैं। ठाकुर जी की सेवा में कई नियमों का पालन करना ज़रूरी होता है। ऐसे में कई भक्तों के मन में यह सवाल उठता है कि अगर वे नॉनवेज (मांसाहार) खाते हैं, तो क्या वे घर में ठाकुर जी को रख सकते हैं और उनकी सेवा कर सकते हैं?

इसी विषय पर वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने बहुत ही स्पष्टता से नियम बताए हैं। प्रेमानंद महाराज जी ने सेवा को बेहद कठिन बताया है, जो कि साधना के फल से बढ़कर है। उनके अनुसार, सेवा का अर्थ है स्वामी (भगवान) के समीप नित्य उनकी सेवा में उपस्थित हो जाना।

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Premanand Maharaj: मांस-मदिरा का सेवन शास्त्रों में निषेध

महाराज जी का कहना है कि यह जो जीवन हमें मिला है, इसमें हमें ऐसा काम करना चाहिए जिससे किसी का अमंगल न हो। इसलिए, मांस-मदिरा का सेवन शास्त्रों में पूरी तरह निषेध है और किसी भी व्यक्ति को मांस नहीं खाना चाहिए। महाराज जी मांसाहार को 'राक्षसी भोजन' मानते हैं और कहते हैं कि यह इंसानों के लिए नहीं है।

Premanand Maharaj: मांसाहार पर शास्त्रों का मत और परिणाम

प्रेमानंद महाराज ने मांसाहार के दुष्परिणामों को बताते हुए शास्त्रों का हवाला दिया है। स्कंद पुराण के अनुसार, जो मनुष्य मांस खाता है, उसे न तो इस मृत्यु लोक में और न ही मृत्यु के बाद किसी अन्य लोक में सुख मिलता है। स्कंद पुराण यह भी कहता है कि मांस-मदिरा का सेवन करने वाले व्यक्ति की पूजा कभी स्वीकार नहीं होती है।

वहीं, श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने मांस को तामसिक भोजन बताया है, जिसे ग्रहण करने से मनुष्य की बुद्धि क्षीण (कमज़ोर) हो जाती है और वह अपनी इंद्रियों पर से भी नियंत्रण खो देता है। इन सभी बातों को देखते हुए, महाराज जी का स्पष्ट आदेश है कि यदि आप ठाकुर जी की पूजा-पाठ करते हैं, तो आपको तुरंत मांस खाना छोड़ देना चाहिए।

Premanand Maharaj: नाम जप 'स्वार्थ' है या 'परमार्थ'?

प्रेमानंद महाराज एकांत वार्तालाप के दौरान भक्तों के सवालों का जवाब देते हैं। एक महिला श्रद्धालु ने उनसे पूछा था कि क्या मोक्ष और मुक्ति के लिए भगवान का नाम जपना स्वार्थ नहीं है? इस पर महाराज जी ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया। उन्होंने इस विचार को गलत बताया और कहा कि हम स्वार्थ के लिए ही नाम जप करें। उन्होंने नाम को अमृत बताया और कहा कि अगर स्वार्थ से अमृत पिएंगे तो अमर हो जाएंगे। इसलिए, हमें यह कामना करते हुए स्वार्थ से जप करना चाहिए कि "हमारा मंगल हो, हम सुखी हो जाएं," लेकिन करो तो!

Premanand Maharaj: स्वार्थ से शुरू होकर निस्वार्थ तक पहुंचती है भक्ति

महाराज जी ने आगे समझाया कि 'स्वार्थ' से ही भक्ति की शुरुआत होती है। सबकी भक्ति इसी कामना से शुरू होती है कि हमारे काम-क्रोध नष्ट हो जाएं और हमारी भावनाएं शुद्ध हो जाएं। कामना (इच्छा) के बल पर ही हम परमार्थ के रास्ते पर चल पाते हैं।

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