कुछ इस तरह से उत्तर प्रदेश की राजनीति को पलटा था मुलायम सिंह यादव ने, यूपी को कर दिया था कांग्रेस मुक्त

Mulayam Singh Yadav: उत्तर प्रदेश को देश की राजनीति का केंद्र माना जाता है। इसकी बड़ी वजह है यहां लोकसभा की सर्वाधिक सीटें हैं। ऐसा कहा भी जाता है कि केंद्र की सत्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाती है। उत्तर प्रदेश ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक कई प्रधानमंत्री देश को दिए। यूपी की राजनीति की बात करें तो पहली पीढ़ि के नेता वो थे जो देश की आजादी के आंदोलन से निकले तो दूसरी पीढ़ि के नेता वो थे जो सड़कों पर लड़कर नेता बने। दूसरी पीढ़ि के नेताओं की बात करें तो यह वह दौर था जब देश के शिक्षण संस्थानों से राजनीति को एक से बढ़कर एक पुरोधा मिले। देश में जब आपातकाल लगा तो उस वक्त यूपी से कई बड़े नेता उभरे, इन नेताओं ने आम लोगों के हक की जमीनी लड़ाई लड़कर लोगों के बीच अपनी खास पहचान बनाई और इसी विरासत से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी आते हैं। उत्तर भारत की राजनीति में मुलायम सिंह यादव को दूसरी पीढ़ि का सबसे बड़ा नेता कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी, ऐसे में मुलायम सिंह यादव के जाने से एक युग का अंत हो गया।

यूपी की राजनीति में मुलायम सिंह की ग्रैंड एंट्री, सवर्णों को बैकफुट पर भेजा

यूपी की राजनीति में मुलायम सिंह की ग्रैंड एंट्री, सवर्णों को बैकफुट पर भेजा

उत्तर प्रदेश को जाति के लिहाज से काफी अहम राज्य माना जाता है और किसी भी राजनीतिक दल को यहां अपने जमाने के लिए राजनीतिक समीकरण को साधना जरूरी होता है। राम मनोहर लोहिया ओबीसी को 60 फीसदी आरक्षण की वकालत करते थे। जब 1967 में उनका निधन हुआ तो मुलायम सिंह यादव पहली बार विधायक बने। उस वक्त जाट नेता चौधरी चरण सिंह ने ओबीसी वोटर्स को एकजुट किया, जिसमे से अधिकतर मतदाता बाद में वीपी सिंह के साथ खड़े नजर आए। लेकिन जब मुलायम सिंह यादव 5 दिसंबर 1989 को यूपी की राजनीति के केंद्र में आए तो उन्होंने लंबे समय तक सवर्णों को सत्ता से दूर रखा। महज कुछ सालों के लिए रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें और आखिरकार 2017 में योगी आदित्यनाथ जोकि ठाकुर जाति से आते हैं प्रदेश के मुख्यमंत्री बन सके।

यूपी में ओबीसी जातियों का उदय

यूपी में ओबीसी जातियों का उदय

मुलायम सिंह के सत्ता में आने के बाद ही ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की शुरुआत हुई। उनकी इस राजनीति के चलते ही भाजपा को ओबीसी नेता कल्याण सिंह को आगे करना पड़ा, जिसके चलते 1991 में वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। मुलायम सिंह यादव ने सर्वाधिक यादव वोटर्स को अपनी ओर खींचा, सरकार में ओबीसी का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ा। मुलायम सिंह के उदय के बाद कई ओबीसी जातियां जो पहले अपने नाम के आगे अपना सरनेम नहीं लगाती थी, वह अब अपना सरनेम लगाने लगी थीं और उन्हें ऐसा करने में फक्र महसूस होने लगा था।

यूपी में दलित-ओबीसी की राजनीति की शुरुआत

यूपी में दलित-ओबीसी की राजनीति की शुरुआत

यूपी की राजनीति में दलितों की एंट्री भी पहली बार तब हुई जब 1977 में राम नरेश यादव मुख्यमंत्री बनें। वह पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो सवर्ण जाति से नहीं आते थे। लेकिन जिस तरह से ओबीसी नेता के तौर पर मुलायम सिंह यादव का उदय हुआ, माना जाता है उसी वजह से यूपी की राजनीति में काशीराम की एंट्री हुई। ओबीसी और दलितों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सपा-बसपा के साथ शुरू हो गई। 1993 में जब यूपी में विधानसभा चुनाव हुआ तो उस वक्त बाबरी मस्जिद को गिराया जा चुका था, भाजपा को उम्मीद थी कि वह हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचेगी, लेकिन भाजपा की उम्मीदों पर मुलायम सिंह यादव ने बसपा के साथ हाथ मिलाकर पानी फेर दिया। उस वक्त बसपा को छोटे दल के तौर पर जाना जाता था। हालांकि सपा-बसपा का साथ लंबा नहीं चला और कुछ ही समय के बाद यह सरकार गिर गई। मुलायम सिंह यादव की राजनीति बिल्कुल अलग थी, जबकि बसपा में सत्ता तक पहुंचने की अधीरता थी। यही वजह है कि यह गठबंधन की सरकार नहीं चल सकी और 1995 में मायावती भाजपा के समर्थन से यूपी की पहली दलित मुख्यमंत्री बन गईं।

मुलायम के उदय ने यूपी को दिया पहला दलित सीएम

मुलायम के उदय ने यूपी को दिया पहला दलित सीएम

सत्ता में आने के बाद बसपा की ताकत में लगातार इजाफा होता रहा। यही वजह है कि 2007 में मायावती पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहीं, जिसने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। हालांकि 2019 में सपा-बसपा एक बार फिर से साथ आए, दोनों ने साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा। बसपा ने इसमे 10 सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन अब सपा और बसपा दोनों की राजनीति ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां से दोनों दलों का भविष्य अधर में लटकता दिख रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि भाजपा ने जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला अपनाया है, वह दोनों ही दलों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

 मुलायम ने यूपी को कांग्रेस मुक्त किया

मुलायम ने यूपी को कांग्रेस मुक्त किया

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज की और उसके बाद से ही वह कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रही है। लेकिन भाजपा से कहीं पहले मुलायम सिंह यादव कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद कर चुके थे। 1989 में जब मुलायम सिंह ने पहली बार शपथ ली तो उसके बाद से ही यूपी कांग्रेस मुक्त हो गई। 1989 से पहले के दौर की बात करें तो मुस्लिम और दलितों को कांग्रेस का आधार माना जाता था, जबकि कई अगणी जातियां पहले से ही कांग्रेस के साथ थीं। लेकिन मुलायम सिंह के उदय ने इस समीकरण को तोड़ दिया। मुलायम के सामाजिक न्याय ने कांग्रेस को ऐसी चोट पहुंचाई, जिससे वह कभी भी उबर नहीं पाई। कांग्रेस मुक्त भारत का नार नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 2014 के चुनाव में दिया था, लेकिन तकरीबन 25 साल पहले मुलायम सिंह इस नारे को यूपी में यथार्थ में बदल चुके थे।

मुस्लिम-यादव गठजोड़

मुस्लिम-यादव गठजोड़

देश में धर्म की राजनीति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यूपी में जब चरण सिंह ने खुद को कांग्रेस से अलग किया तो बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता भी उनके साथ चले गए। जिसके दम पर चरण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें और बाद में कुछ समय के लिए देश के प्रधानमंत्री भी बने। हालांकि बाद में मुस्लिम वोटर्स ने जनता दल के वीपी सिंह की ओर अपना रुख किया। हालांकि बाद में मुस्लिम वोटर्स उस ओर गए, जहां उन्हें लगा कि यह दल भाजपा को हरा सकता है। मुलायम सिंह यादव को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिला। मुलायम सिंह यादव का जनाधार मुख्य तौर पर मुस्लिम-यादव वोटर्स थे। हालांकि बाद में अखिलेश यादव के काल में यह गठजोड़ कमजोर हो गया।

राजनीति का अपराधीकरण

राजनीति का अपराधीकरण

देश में जब आपातकाल लगा तो उस वक्त उत्तर प्रदेश में अपराध अपने चरम पर पहुंच गया। यूपी की राजनीति में अपराधीकरण का उदय काफी तेजी से हुआ। एचएन बहुगुणा और एनडी तिवारी के शासनकाल में राजनीति का अपराधीकरण सर्वाधिक हुआ। यह दौर 1977-80 के बीच जनता पार्टी के कार्यकाल में भी जारी रहा। वीपी सिंह की सरकार जब 1980 में आई तो उस दौरान कई अपराधियों का एनकाउंटर हुआ, डकैतों का एनकाउंटर हुआ। लेकिन उस दौर में आरोप लगा कि विशेष जाति के लोगों का ही एनकाउंटर हो रहा है। मुलायम सिंह के शासन काल में भी राजनीति का अपराधीकरण जारी रहा। उनपर अपराधियों को राजनीति में बढ़ावा देने का आरोप लगा। हालांकि वह अकेले ऐसे नेता नहीं थे जिनपर इस तरह के आरोप लगे, लेकिन मुलायम सिंह अपने ऊपर लगे इन दागों को मिटा नहीं सके। जिसका असर समाजवादी पार्टी पर देखने को मिला। यही वजह है कि सपा को उसके विरोधी गुंडों की भी पार्टी कहने लगे।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+