UP विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की सियासी कुर्सी का खेल, सरकार की 'ना' के बाद अदालत क्यों पहुंची ये लड़ाई

लखनऊ, 19 जुलाई: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में यूपी बीजेपी की सरकार विपक्ष को हाशिए पर ढकेलने के लिए अपने तरकश के हर तीर आजमा रही है। यूपी में विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी को लेकर अब नया सियासी खेल शुरू हो गया है। सरकार ने समाजवादी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी देने से इंकार कर दिया है जिसके बाद अब यह मामला हाइकोर्ट पहुंच गया है। समाजवादी पार्टी के नेता लाल बिहारी यादव अपनी कुर्सी बचाने के लिए अदालत पहुंच गए हैं।

मायावती

दरअसल यूपी विधान परिषद के कार्यालय ने एक अधिसूचना जारी की है जिसमें उनकी विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता रद्द कर दी गई है। अधिसूचना में कहा गया है कि यूपी विधान परिषद में सपा के सदस्यों की संख्या अब 9 हो गई है। नियम के अनुसार विपक्ष के नेता के तौर पर कम से कम यह संख्या दस होनी चाहिए। संख्या कम होने की वजह से विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता को वापस ले लिया गया है।

सपा नेता लाल बिहारी यादव की क्या है दलील

परिषद के इस आदेश को लाल बिहारी यादव ने हाइकोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा है कि प्रमुख सचिव की यह कार्रवाई यूपी विधान परिषद की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियम 1956 के नियम 234 के विरूद्ध है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यूपी विधान परिषद में विपक्ष के नेता के संबंध में मान्यता रद्द करने का कोई प्रावधान नहीं है। विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता को बिना सुनवाई का अवसर दिए ही मनमाने ढंग से वापस ले लिया गया है।

विधान परिषद

विधान परिषद में सरकार के पास पुर्ण बुहमत

दरअसल यूपी विधानसभा के साथ ही विधान परिषद में भी योगी सरकार के पास पुर्ण बहुमत हो गया है। विपक्ष की स्थिति का आलम यह है कि एक तरफ जहां कांग्रेस यूपी विधान परिषद से समाप्त हो गई है वहीं समाजवादी पार्टी नेता प्रतिपक्ष के मानक (कम से कम 10) से कम होकर 9 तक पहुंच गई है। यूपी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है यूपी विधान परिषद में विपक्ष के पास नेता प्रतिपक्ष के लिए आवश्यक आंकड़ा भी नहीं है। इसका फायदा सरकार भी विपक्ष को कमजोर करने के लिए उठा रही है।

विपक्ष के पास संख्या बल की कमी

राजनीतिक विश्लेषकों की माने ने यूपी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की लड़ाई वाकई दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। नेता प्रतिपक्ष के लिए कम से कम दस सदस्य होने चाहिए लेकिन उतना विपक्ष के पास नहीं है। अब यह सरकार के उपर है कि वह विपक्ष को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी देती है या नहीं देती है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि यदि सदन में सदस्यों की संख्या के दस फीसदी से कम होने पर नेता प्रतिपक्ष को कोई औचित्य नहीं होता है। सरकार उसको मान्यता देने से इंकार कर सकती है। ऐसी ही केंद्र में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ हुआ था। सरकार ने उन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा देने से इंकार कर दिया था।

अखिलेश यादव

क्यों है इस कुर्सी की अहमितयत

दरअसल नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी मिलने पर उसके कुछ लाभ भी होते हैं। इसलिए विपक्ष हमेशा इस बात की कोशिश में रहता है कि उसके किसी नेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया जाए। नेता प्रतिपक्ष का दर्जा कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है और उसको सरकार की तरफ से बहुत सारी सुविधाएं भी मिलती हैं। नेता प्रतिपक्ष को सदन के भीतर बोलने के लिए उतना ही समय मिलता है जितना नेता सदन के पास होता है। इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष का प्रोटोकॉल का भी लाभ मिलता है। नेता प्रतिपक्ष न रहने से ये सारी सुविधाएं अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं।

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