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मदर्स डे मना चुके लोग सुनिए इन मांओं का दर्द, आंखें छलक जाएंगी

By Rajeevkumar Singh
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मेरठ। 14 मई को मां के सम्मान में मदर्स डे सेलिब्रेट किया गया। बच्चों ने अपनी मां के साथ खींची गई सेल्फी सोशल मीडिया पर खूब शेयर किए। लेकिन कुछ माएं ऐसी भी हैं जिनको बच्चे भूल चुके हैं और जो वृद्धाश्रमों में अपनों को खोजती रहती हैं। आइए कुछ ऐसी माओं से आपको मिलाते हैं जिनका दर्द सुनकर आपकी आंखें छलक जाएंगी।

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मदर्स डे मना चुके लोग सुनिए इन मांओं का दर्द, आंख छलक जाएंगी

मेरठ में श्री साईं सेवा संस्थान में रहने वाली 70 साल की शकुंतला का दिल बहुत बड़ा है। इस मां ने अपने बेटे का घर बसाने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखकर अपना घर छोड़ दिया। एक बार घर छोड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह अलग बात है कि आज भी बेटे की बहुत याद आती है और उसे याद कर आंख भर आती हैं। 7 साल पहले बहू ने मारपीट कर निकाला था। शकुंतला देवी गढ़मुक्तेश्वर की रहने वाली हैं। गंगानगर में वह श्री साईं सेवा संस्थान में रह रही हैं। शकुंतला देवी ने बताया कि करीब 7 साल पहले उन्होंने अपना घर छोड़ दिया। उन्होंने बताया कि उनके बेटे की पहली पत्नी की मौत के बाद दूसरी शादी हुई थी। दूसरी बहू ने कुछ दिनों बाद उसे परेशान करना शुरू कर दिया। जरा जरा सी बात पर गाली गलौज और मारपीट पर उतारू हो जाती थी। जब उसका बेटा घर पर नहीं होता था तब उसके साथ मारपीट करती थी। एक दिन बेटा जब अपने काम पर गया हुआ था तब बहू ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया। तब वह घर से निकलकर ब्रजघाट पर चली आई। ब्रजघाट पर कुछ दिन रहने के बाद उसे मेरठ में वृद्धाश्रम के बारे में जानकारी मिली तो वह वहां चली आई।

शकुंतला देवी आज भी अपने बेटे को याद करती है। उसे याद कर उनकी आंखें भर आती हैं। बताया कि वापस वह घर इसलिए नहीं गई कि उसके बेटे की दूसरी शादी हुई थी। कहीं उसकी बहू घर छोड़कर न चली जाए इसलिए उसने ही घर छोड़ने का निर्णय ले लिया। शकुंतला देवी ने बताया कि उसका एक बेटा और एक बेटी हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। बताया कि जब से उसने घर छोड़ा है उसका बेटा कभी उससे मिलने नहीं आया। कुछ दिन पहले बेटी मिलने आई थी।

श्री साईं सेवा संस्थान की संचालिका श्रुति शर्मा ने बताया कि शंकुतला देवी उन्हें करीब 6 साल पहले मिली थी तब वह एक वृद्धाश्रम में वार्डन थीं। शंकुतला देवी अब उनके पास ही रहती हैं। बताया कि कुछ दिनों पहले शकुंतला देवी की बेटी रूपवती मिलने आई थी। बेटी भी मजबूर थी, वह मां को अपने साथ नहीं ले जा सकती थी, लेकिन उसने यह जरूर कहा कि उसकी मां यहां अधिक सुकून में है। वह मां से मिलने आती रहेगी। नम्रता बताती हैं कि उनके यहां 11 ऐसे वृद्ध हैं जो सबकुछ होते हुए भी परिवारिक मजबूरियों के चलते घर छोड़ने को मजबूर हुए।

श्रुति शर्मा का कहना है कि आश्रम में इन मां के प्रति अपनी मां जैसा ही लगाव है। इनका मानना है कि भले ही इनकी माँ अब इस दुनिया में ना हो लेकिन इनकी सेवा करके अपनी माँ की कमी पूरी हो जाती है। साथ ही इनका कहना है कि इन्हें आश्रम में आकर इनसे सुख-दुख बांटना, त्योहारों को सेलिब्रेट करना और साथ बैठकर मन की बातें करना बहुत अच्छा लगता है। उनको ऐसा लगता ही नहीं कि वो उनकी मां न हो, वो भी मुझे अपनी बेटी मानती है और अपने दुख-सुख को शेयर करती है। उनका प्यार पाकर काफी अच्छा लगता है।। उनका कहना है कि मां, शब्द ही ऐसा है जिसको कभी परिभाषित नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि उनका अधिकांश समय वृद्धाश्रम में ही बीतता है। मुझे उन मां को देखकर तरस भी आता है, जिनके बच्चे उनके पास नहीं और हममें ही अपने बच्चों को तलाशती है।

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English summary
Mothers in old age homes in Meerut describing their pains.
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