350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, जलती चिताओं के बीच होता नाच और गाया जाता गाना, क्‍यों?

वाराणसी के डीएम योगेश्वर राम मिश्रा ने अद्भुत संगीत पर नृत्य को कमाल की जुगलबंदी बताया। उन्होंने कहा की इस परंपरा ने समाज की भ्रांति को तोड़ा है। यहां आने वाला कोई भी शख्स मेहनताना नहीं लेता।

वाराणसी। महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर 350 सालों का परंपरा फिर एकबार देखने को मिली जहां जलती चिताओं के सामने होने वाले नगर वधुओं के नृत्य को देखने लोग पहुंचे। इतिहास में पहली बार डीएम योगेश्वर राम मिश्रा अपनी पत्नी के साथ प्रोग्राम में शामिल हुए। वहीं आज तक देश का कोई बड़ा संगीत कलाकार 350 वर्षों में नगर वधुओं के बीच नहीं पहुंचा था तो इस बार पदमश्री क्लासिकल सिंगर डॉ. सोमा घोष ने यहां अपने गीतों से समा बांधा। शिव स्तुति से लेकर ठुमरी तक के गीतों पर बहुओं ने नृत्य प्रस्तुत किए।

PICs: मोदी की काशी में 350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, चिताओं के बीच होता है नृत्य और गायन
PICs: मोदी की काशी में 350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, चिताओं के बीच होता है नृत्य और गायन

डीएम ने भी इस परंपरा को सराहा

वाराणसी के डीएम योगेश्वर राम मिश्रा ने अद्भुत संगीत पर नृत्य को कमाल की जुगलबंदी बताया। उन्होंने कहा की इस परंपरा ने समाज की भ्रांति को तोड़ा है। वहीं संगीत की साधना और भजन और स्तुति जलती चिताओं के सामने होती है जिससे इसमें किसी तरह का फुहड़पन नहीं रहता।

PICs: मोदी की काशी में 350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, चिताओं के बीच होता है नृत्य और गायन
PICs: मोदी की काशी में 350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, चिताओं के बीच होता है नृत्य और गायन

आयोजकों ने बताया इस नृत्य का इतिहास

मशान नाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया की अकबर के समकालीन राजा मानसिंह ने इस मंदिर को बनवाया था। 16 शताब्दी में आमेर के राजा मानसिंह के काशी वास को आए थे। बाबा के मंदिर के पूर्ण होने पर मानसिंह ने देश भर से संगीतज्ञों का बुलाया तो कोई नहीं आया। उस दौर में शुभ काम और नृत्य स्वरांजलि देने की परंपरा थी। मानसिंह ने तब नगर वधुओं को काशी समेत कई स्थानों पर आमंत्रण भिजवाया, नाव से बैठकर गंगा की गोद में होते हुए 10 से ऊपर नगर वधुएं श्मशान घाट पहुंची। पहली बार महिलाओं ने मशान मंदिर में मुक्ति के लिए पूजा की थी।

PICs: मोदी की काशी में 350 सालों से श्मशान में चली आ रही परंपरा, चिताओं के बीच होता है नृत्य और गायन

देश के अलग-अलग स्थानों ने आती हैं डांसर

यहां आने वाली कोई भी नगर वधु पैसा नहीं लेती बल्कि मन्नत का चढ़ावा अर्पित करके जाती है। कलकत्ता, बिहार, मऊ, दिल्ली, मुंबई समेत भारत के कई स्थानों से बीस से ऊपर नगरवधुएं यहां आती हैं।

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पद्मश्री सोमा घोष यहां आने वाली बनी पहली कलाकार, मशान पर की शिव की आराधना

पदमश्री सोमा घोष ने बताया की दुनिया में कई प्रोग्राम किया है लेकिन साक्षात शिव के स्थली पर गायन से अंदरुनी ऊर्जा का संचार हुआ। नगर वधुओं को समाज आज स्वीकार नहीं करता। उन्होंने ब्रिटिश और मुगलकाल से लड़ते हुए हमारे संगीत को बचाया है।

जीवन के नर्क से मिलेगी मुक्ति

OneIndia से विशेष बातचीत में नगर वधु निशा ने बताया की वो कई सालों से यहां आ रही हैं, पहली बार डीएम और सोमा घोष जैसे कलाकार के आने की वजह से उन्हें भी गर्व हो रहा है।

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