Kanpur Fake Degree Racket: 13 साल का फेक डिग्री रैकेट, मास्टरमाइंड कौन? UK तक फैला नेटवर्क, 4 अरेस्ट
Kanpur Fake Degree Racket Busted: NEET पेपर लीक को लेकर देश में मचे तांडव के बीच कानपुर पुलिस ने मंगलवार को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय फर्जी डिग्री रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस रैकेट ने हाईस्कूल की मार्कशीट से लेकर पीएचडी डिग्री तक के नकली दस्तावेज बनाकर पूरे देश और विदेशों में सप्लाई किए। पुलिस ने 32 वर्षीय कथित मास्टरमाइंड समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
छापेमारी किदवई नगर और बेकनगंज इलाकों में की गई, जहां एक रिहायशी इमारत में हाई-टेक अवैध प्रिंटिंग यूनिट चल रही थी। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि नकली सर्टिफिकेट असली से भी ज्यादा बेहतर क्वालिटी के थे, जिससे वे आसानी से वेरिफिकेशन पास कर जाते थे।

Who Is Mastermind Zia-ul-Hasan: मास्टरमाइंड कौन? ज़िया-उल-हसन उर्फ समीर उर्फ आतिफ
रैकेट का सरगना ज़िया-उल-हसन (32) हीरामन पुरवा का रहने वाला है, जो हाल में चमनगंज के नाला रोड स्थित इकबाल बिल्डिंग में रह रहा था। उसके साथ गिरफ्तार अन्य तीन आरोपी हैं:
- हसन आसिफ (34) - जिया का भाई
- आमिर अहमद (33)
- नूरुद्दीन (34)
ये सभी कथित तौर पर रैकेट के कोर मेंबर्स थे। पुलिस के मुताबिक, यह गैंग कई सालों से सक्रिय था और व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा था।
क्या-क्या बरामद हुआ? हाई-टेक प्रिंटिंग सेटअप
- छापेमारी के दौरान पुलिस ने जबरदस्त सामान जब्त किया:
- 2 लैपटॉप, 1 डेस्कटॉप कंप्यूटर, कलर प्रिंटर, CPU
- 3 हार्ड डिस्क, वाई-फाई राउटर
- 141 यूनिवर्सिटी रबर स्टैंप
- 80 होलोग्राम स्ट्रिप्स, होलोग्राम डाइज, फ्लोटिंग पंच डाइज
- 830 खाली मार्कशीट पेपर
- प्रिंटिंग का कच्चा माल और तैयार नकली डिग्रियां
पुलिस कमिश्नर ने कहा, 'प्रिंट क्वालिटी इतनी बेहतर थी कि असली सर्टिफिकेट से भी मुश्किल से अलग पहचाना जा सकता था।'
रैकेट कैसे चलता था? पूरा सिस्टम
गैंग 10,000 से 15,000 रुपये में एक नकली मार्कशीट या डिग्री बना कर देता था। ग्राहक पूरे भारत के अलावा विदेशों में भी थे।
तरीका:
- ग्राहक ऑर्डर देता।
- कानपुर के इस हब में प्रिंटिंग होती।
- PDF और CorelDRAW फाइलें विदेश भेजी जातीं।
- फिशिंग वेबसाइट्स के जरिए फेक ऑनलाइन वेरिफिकेशन लिंक उपलब्ध कराया जाता, ताकि एंप्लॉयर या संस्थान चेक करें तो असली लगे।
शामिल यूनिवर्सिटीज (8 प्रमुख):
- अन्नामलाई यूनिवर्सिटी
- लिंगायाज विद्यापीठ
- कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी
- उस्मानिया यूनिवर्सिटी
- डीवाई पाटिल विद्यापीठ
- अलागप्पा यूनिवर्सिटी
- आचार्य नागार्जुन यूनिवर्सिटी
- छत्रपति शाहू जी महाराज (CSJM) यूनिवर्सिटी, कानपुर
अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन
ज़िया-उल-हसन कनाडा में रह रहे भावीन और बारी नाम के दो साथियों के संपर्क में था। वह उन्हें फाइलें भेजता और वे विदेश में प्रिंट कर सप्लाई करते।
ज़िया UK मोबाइल नंबर इस्तेमाल करता था, जिससे उसे क्रेडिबिलिटी मिलती। वह कई बार विदेश घूम चुका था । 2024-25 में लंदन में लंबा समय बिताया और 2023 में सऊदी अरब भी गया था।
आर्थिक लेन-देन: करोड़ों का खेल
- ज़िया-उल-हसन के अकाउंट में करीब 49 लाख रुपये
- हसन आसिफ के एक्सिस बैंक अकाउंट में 40 लाख रुपये
- आमिर अहमद के अकाउंट में 1 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन
पुलिस फाइनेंशियल ट्रेल की गहन जांच कर रही है।
कैसे पकड़ा गया रैकेट?
यह सफलता एक संबंधित मामले में राघव सर्राफ की गिरफ्तारी के बाद मिली। सर्राफ के फोन और फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन की जांच से प्रिंटिंग हब तक पहुंच बनी। जैसे-जैसे पुलिस ने शिकंजा कसा, गैंग ने सबूत मिटाने की कोशिश की। मास्टरमाइंड ने कई मोबाइल फोन नष्ट कर दिए थे।
फेक डिग्री का खतरा: क्यों गंभीर है मामला?
- फर्जी डिग्रियां सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र और रोजगार बाजार के लिए खतरा हैं।
- नौकरियां गलत हाथों में जाती हैं।
- योग्य उम्मीदवार पीछे छूट जाते हैं।
- विदेशी विश्वविद्यालयों और कंपनियों में भारत की साख प्रभावित होती है।
- मेडिकल, इंजीनियरिंग, टीचिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में फेक डिग्री वाले लोग पहुंच जाएं तो जान-माल का खतरा।
कानपुर जैसे औद्योगिक शहर से इस तरह का रैकेट चलना चिंताजनक है। पुलिस का मानना है कि यह सिर्फ आइसबर्ग का सिरा हो सकता है।
Kanpur Police की आगे की रणनीति?
- सभी जब्त सामग्रियों की फॉरेंसिक जांच
- बैंक ट्रांजेक्शन और फोन कॉल डिटेल्स का विश्लेषण
- विदेशी साथियों के खिलाफ इंटरपोल के जरिए कार्रवाई की तैयारी
- अन्य संभावित सदस्यों की तलाश
- ग्राहकों की लिस्ट तैयार करना
कानपुर पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने कहा कि जांच तेजी से चल रही है और इस रैकेट से जुड़े हर व्यक्ति तक पहुंच बनाई जाएगी।
समाज पर असर और सबक
यह घटना शिक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। आजकल ऑनलाइन और ओपन यूनिवर्सिटीज के बढ़ते चलन में फेक डिग्री रैकेट आसानी से फल-फूल रहे हैं। युवाओं को सावधान रहना चाहिए और डिग्री वेरिफिकेशन को गंभीरता से लेना चाहिए।
सरकार और विश्वविद्यालयों को भी डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम को और मजबूत करना होगा ताकि फिशिंग वेबसाइट्स और फेक होलोग्राम आसानी से न बन सकें।
कानपुर पुलिस की इस कार्रवाई ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को झटका दिया है। लेकिन पूरी जांच अभी बाकी है। अगर पुलिस इस रैकेट की जड़ तक पहुंच गई तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।
यह मामला सिर्फ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार की ईमानदारी की लड़ाई भी है। कानपुर पुलिस की टीम को इस सफलता पर बधाई, लेकिन पूरा देश अब आगे की कार्रवाई की ओर देख रहा है।
(इनपुट PTI)













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