गठबंधन की उबड़-खाबड़ सड़क पर पंचर हो सकती है टीपू की साइकिल

कांग्रेस के साथ सपा का गठबंधन साबित हो सकता है घाटे का सौदा, अपेक्षा के अनुसार नतीजे नहीं आने पर मुश्किल हो सकता है अखिलेश का सफर

लखनऊ। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने के बाद एक तरफ जहां अखिलेश यादव और राहुल गांधी 300 से अधिक सीटें हासिल करने का दावा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। गठबंधन के बाद दोनों ही दलों के बागी नेता और कार्यकर्ता दबी जुबान यह कहने से नहीं हिचकते हैं कि इस गठबंधन से जहां कांग्रेस को लाभ मिल सकता है तो सपा को इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

कांग्रेस को मिल सकती है 40 सीटें

कांग्रेस को मिल सकती है 40 सीटें

मेरठ में कांग्रेस के पुराने समर्थक की का मानना है कि जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस से पार्टी के मुख्य मतदाता दूर हो गए हैं और हमें इस बात को स्वीकार करना होगा, लेकिन उनका मानना है कि गठबंधन के बाद कांग्रेसको इस बार प्रदेश में 70 सीटें हासिल होंगी। हालांकि वह कुछ ही देर बात अपनी दावे में सुधार करते हैं और कहते हैं कि अगर पार्टी को 35-40 सीटें भी मिल गई तो पार्टी के लिए काफी लाभकारी होगा और प्रदेश में कांग्रेस फिर से मजबूत हो सकती है।

गठबंधन में चूके अखिलेश

गठबंधन में चूके अखिलेश

राजनीतिक जानकारों की मानें तो जमीनी हकीकत यह कहती है कि कांग्रेस को मुश्किल से ही इस चुनाव में 30 सीटे हासिल हो सकती है, ऐसे में आखिर क्यों अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 105 सीटें दे दी है। आलम यह था का पार्टी को कई जगहों पर उम्मीदवार तक नहीं मिले। कांग्रेस की यूपी में हालत काफी कमजोर थी बावजूद इसके अखिलेश ने उसे 105 सीटें दी इससे साफ है कि पार्टी उन्हें गठबंधन की जल्दबाजी थी और अगर वह चाहते तो कांग्रेस को 70 सीटों में भी मना सकते थे, ऐसे में कांग्रेस के पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

कांग्रेस करेगी सपा के वोटबैंक में सेंधमारी

कांग्रेस करेगी सपा के वोटबैंक में सेंधमारी

विशेषज्ञों का मानना है कि कई ऐसी सीटें कांग्रेस को सपा ने दे दी हैं जिसे वह जीत सकती थी, जिसके चलते पार्टी के कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है। लेकिन इस गठबंधन को समझने की जरूरत है, जिस उम्मीद में सपा ने कांग्रेस से गठबंधन किया है जरूरी नहीं है कि वह उनके पक्ष में जाए। इस गठबंधन की सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि कांग्रेस का वोट बैंक सपा के हाथ लगेगा, लेकिन इसका नुकसान सीधे तौर पर सपा को होगा, क्योंकि इस गठबंधन के बाद कांग्रेस का वोटर तो कांग्रेस के पास ही रहेगा, लेकिन सपा के वोट बैंक में भी सेंधमारी करने का कांग्रेस को मौका मिलेगा।

बसपा-कांग्रेस आ सकते हैं साथ

बसपा-कांग्रेस आ सकते हैं साथ

यूपी में त्रिशंकु विधानसभा की भी संभावना है, ऐसे में अगर कांग्रेस को इस चुनाव में 40 सीटें हासिल होती है तो मुमकिन है कि कांग्रेस सपा के साथ हाथ मिला सकती है। जिस तरह से अखिलेश यादव के साथ राहुल ने साझा प्रेस कांफ्रेंस में मायावती के लिए नरम रुख दिखाए और तमाम रैलियों में वह बसपा पर हमला बोलने से बच रहे हैं, उससे इस संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस त्रिशंकु विधानसभा के आसार बनने पर बसपा के साथ नहीं जाएगी।

अमेठी-रायबरेली अखिलेशी का नाकामी

अमेठी-रायबरेली अखिलेशी का नाकामी

गठबंधन के बाद तकरीबन 10 से 12 ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस के उम्मीदवारों को सपा के उम्मीदवार कड़ी टक्कर देते नजर आ रहे हैं, जिसमें अमेठी और रायबरेली अहम है। अमेठी और रायबरेली में कुल 10 सीटों में से 4 सीटों पर दोनों ही दलों के उम्मीदवार एक दूसरे के सामने हैं और यही वजह मानी जा रही है कि प्रियंका गांधी ने इस बार यहां चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।

उल्टा पड़ सकता है दांव

उल्टा पड़ सकता है दांव

वहीं बसपा के चुनाव प्रचार पर गौर करें तो तकरीबन हर रैली में मायावती मुसलमानों को वोटों का समीकरण समझाती हैं कि अगर मुसलमान सपा को वोट देते हैं तो पार्टी के भीतर दो गुट एक दूसरे को हराने का काम करेंगे जिसका लाभ भाजपा को होगा, ऐसे में अगर भाजपा सत्ता में आई तो दलितों और मुसलमानों का आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। यही नहीं मायावती ने पहली बार प्रदेश में 100 मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दिया है। ऐसे में अगर मुसलमान एकजुट होकर बसपा को वोट देते हैं तो मुमकिन है कि बसपा सरकार बनाने की स्थिति में भी आ जाए।

भाजपा के लिए भी भारी पड़ सकता है हाथी

भाजपा के लिए भी भारी पड़ सकता है हाथी

हालांकि भाजपा ने एक भी मुसलमान उम्मीदवार को टिकट नहीं देकर हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश की है ताकि एकजुट उसे हिंदुओं का वोट मिल जाए, लेकिन इसकी संभावना कम ही नजर आती है कि हिंदु एकजुट होकर भजापा को अपना वोट दें। ऐसे में मुस्लिम वोटरों को एकजुट करने के जिस अहम मकसद को लेकर अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है वह पूरी तरह से विफल हो सकता है और इसका सीधा लाभ बसपा को हो सकता है। ऐसे में चुनाव बाद अगर अखिलेश यादव को हार का सामना करना पड़ता है तो उनके लिए कई मुश्किल सवाल इंतजार करेंगे, एक तरफ जहां परिवार के भीतर तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर भी उन्हें जवाब देना पड़ेगा।

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