यूं ही नहीं होती है अंसारी जैसे अपराधियों की राजनीति में एंट्री

आखिर कैसे अपराधी छवि के नेता राजनीति में आने हासिल करते हैं सफलता, देश के तंत्र में खामी के चलते इन अपराधियों की राजनीति में होती है एंट्री

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चुनाव में जिस तरह से अपराधियों का बोलबाला एक बार फिर से लौट रहा है उसने साफ कर दिया है कि देश की राजनीति में अपराधियों की आमद हमारे तंत्र की खामी के चलते ही मुमकिन हो पा रहा है। हाल ही में जब समाजवादी पार्टी के भीतर विवाद खड़ा हुआ था तो कौमी एकता दल के नेता मुख्तार अंसारी का नाम काफी चर्चा में आया था, उस वक्त शिवपाल यादव ने अंसारी की पार्टी का सपा में विलय का ऐलान किया था लेकिन अखिलेश यादव ने इस फैसले के खिलाफ खुली बगावत कर दी जिसके बाद यह विलय रद्द हो गया। लेकिन सपा के हाथ से यह मौका निकलने के बाद बसपा ने अंसारी की पार्टी का अपनी पार्टी में स्वागत किया और अंसारी बंधुओं को शराफत का सर्टिफिकेट भी बांट दिया।

10 साल से अधिक समय से जेल में अंसारी

10 साल से अधिक समय से जेल में अंसारी

मुख्तार अंसारी अपराध का वह नाम है जिसपर 40 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं और वह पिछले 10 साल से अधिक समय से जेल की सलाखों के पीछे है, बावजूद इसके मायावती ने अंसारी को पार्टी में ना सिर्फ शामिल किया बल्कि उसे बसपा का टिकट भी देने का ऐलान किया। ना सिर्फ मुख्तार अंसारी बल्कि उसके भाई और बेटे को भी मायावती ने बसपा का टिकट दिया। अंसारी पर लूट, हत्या, अपहरण, फिरौती, दंगे जैसे तमाम मामले दर्ज हैं, लेकिन इस हकीकत को दरकिनार करते हुए मायावती ने उसे पार्टी का टिकट दिया और सपा सहित अन्य दल पर आरोप लगया का अंसारी की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया और उनपर झूठे मुकदमे लगाए गए।

कैसे पाक साफ हो गए मुख्तार अंसारी

कैसे पाक साफ हो गए मुख्तार अंसारी

अंसारी पर 2005 में भाजपा नेता कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप है लेकिन मायावती ने उसे अपनी पार्टी में शामिल करते हुए इसे सुधारात्मक कदम बताया। मायावती ने कहा कि अगर कोई रास्ता भटक जाए तो उसे सुधरने का दूसरा मौका देना चाहिए, उन्होंने कहा कि अंसारी को सपा ने जानबूझकर फंसाया और उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश की जिसके चलते उनके खिलाफ तमाम फर्जी मुकदमे लगाए गए। वहीं दिवंगत भाजपा नेता कृष्णानंद राय की पत्नी अल्का राय का कहना है कि मुख्तार और उसके भाई ने मेरे पति की हत्या की है और मायावती कहती हैं कि उनके खिलाफ आरोप गलत है, क्या मायावती को इस बात की जानकारी है कि कोर्ट में उनके खिलाफ ट्रायल चल रहा है और कोर्ट उसपर अपना अंतिम फैसला सुनाने वाली है। लेकिन सिर्फ वोट बैंक के लिए मायावती ने अंसारी को टिकट दिया है, ऐसे में वह कैसे लोगों की सुरक्षा की गारंटी दे सकती हैं। आपको बता दें कि अल्का राय भाजपा के टिकट पर सिगबतुल्लाह के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं।

मायावती के सामने दो सवाल

मायावती के सामने दो सवाल

यहां यह बात बेहद खास है कि 2010 में मायावती ने मुख्तार अंसारी व उनके भाई अफजाल अंसारी को पार्टी से बाहर कर दिया था, उस वक्त दोनों ही नेता कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप में जेल में थे, जिसके बाद दोनों ही भाइयों ने बसपा से अपना रुख अलग कर लिया था। ऐसे में मायावती के सामने दो सवाल हैं जिनका जवाब देना उनके लिए काफी अहम है, पहला कि क्या मायावती मानवता के आधार पर बड़े-बड़े अपराधियों को सुधरने का मौका देंगी और उन्हें चुनावी मैदान में उतारेंगी। दूसरा बड़ा सवाल मायावती के लिए यह है कि क्या मायावती ने अंसारी बंधुओं को पूर्वांचल के मुस्लिम-दलित समीकरण को साधने के लिए उनकी पृष्ठभूमि को ताक पर रख दिया।

इतिहास में पहली बार 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट

इतिहास में पहली बार 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट

यूपी के इतिहास में आजतक किसी भी राजनीतिक दल ने 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया था लेकिन मायावती ने इस बार अंसारी के बेटे और भाइयों को टिकट देकर इस आंकड़े को छू लिया है। हालांकि सपा ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर मुस्लिम वोटों को बंटने से रोकने का पूरा प्रयास किया है, लेकिन बावजूद इसके मायावती इस बात की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं कि वह दलित वोट बैंक के साथ इस बार मुस्लिम वोटों के जरिए सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे। प्रदेश में 21 फीसदी दलित वोट बैंक के अलावा मायावती को मुस्लिम वर्ग का साथ चाहिए, इसी को ध्यान में रखते हुए मायावती ने मऊ, गाजीपुर, बलिया और वाराणसी में अंसारी बंधुओं की पैठ को देखते हुए उन्हें टिकट देने का फैसला लिया है।

अकेले मायावती पर निशाना साधना गलत

अकेले मायावती पर निशाना साधना गलत

लेकिन अपराधियों को टिकट देने के मामले में सिर्फ मायावती पर ही निशाना साधना उचित नहीं होगा, अगर अखिलेश यादव अंसारी बंधुओं को टिकट नहीं देकर उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर साफ ऱाजनीति का संदेश देना चाहते हैं तो वह गलत है। अखिलेश यादव की सरकार के दौरान कई मंत्रियों व नेताओं पर कानून व्यवस्था को तोड़ने और खुलेआम गुंडागर्दी का आरोप लगा और उनकी सरकार को गुंडाराज का तमगा भी मिला, लिहाजा यह कहना है कि अखिलेश यादव अपराधियों को किसी भी तरह की शह नहीं देते सरासर गलत होगा।

अतीक पर दर्ज 43 मुकदमे, सपा ने दिया था टिकट

अतीक पर दर्ज 43 मुकदमे, सपा ने दिया था टिकट

लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान सपा ने अती अहमद को टिकट दिया था, जिनके खिलाफ 43 आपराधिक मामले दर्ज हैं, यही नहीं उन्होने खुलेआम अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा था कि जितनी वरुण गांधी की उम्र है उससे अधिक उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे हैं। यही नहीं पिछली बार पश्चिम बंगाल के चुनाव में ममता बनर्जी ने कोर्ट द्वारा अपराधी घोषित मोहम्मद सोहराब अली के साथ मंच साझा किया था और उसे बेचारा कहकर बुलाया था, जिसे 2011 के चुनाव में टीएमसी की सीट से जीत हासिल हुई थी।

सरकार की विफलता अपराधी नेताओं को जन्म देती है

सरकार की विफलता अपराधी नेताओं को जन्म देती है

लेकिन जिस तरह से इन अपराधी नेताओं को राजनीतिक पार्टियां टिकट देती है उससे देश के तंत्र में कमी साफ नजर आती है। इन अपराधी नेताओं के पीछे पैसे की काफी बड़ी ताकत होती है जो किसी भी उम्मीदवार की हार और जीत को निश्चित करती है, इसी के चलते इनके प्रभावी क्षेत्रों में ये पार्टियां इन्हें टिकट देने से गुरेज नहीं करती हैं। इन क्षेत्रों में मतदाता भी यही सोच रखता है कि भ्रष्ट तंत्र में कौन नेता बेहतर काम कर सकता है, उन्हें इस बात का भी चयन करना होता है कि ऐसे उम्मीदवार को अपना वोट देकर क्या हासिल होगा जो इस तंत्र में काम नहीं कर पाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्ट तंत्र जिन कामों को पूरा करने में विफल होता है उसे यह अपराधी अपने क्षेत्र में पैसे के दम पर पूरा कराकर लोगों की बीच अपनी साख को मजबूत करते हैं, इसी के चलते इन अपराधी नेताओं की लोगों के बीच पैठ बढ़ती है।

कानून के जरिए नहीं मुमकिन अपराधियों को रोकना

कानून के जरिए नहीं मुमकिन अपराधियों को रोकना

सरकार की विफलता इन अपराधी नेताओं के लिए संजीवनी का काम करती है, जब सरकार आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बदलाव लाने में पूरी तरह से विफल होती है तो इन अपराधी नेताओं को समाज में अपनी पैठ बनाने में मदद मिलती है। हालांकि कानून इसमें अपनी अहम भूमिका निभा सकता है और पिछले कुछ समय में कोर्ट ने राजनीति को साफ करने के लिए काफी अहमद फैसले भी दिए हैं। अगर कोर्ट इन आपराधिक नेताओं को चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाती है तो राजनीतिक दल इससे एक कदम आगे बढ़ाते हुए उनके रिश्तेदारों को टिकट बांटती है, ऐसे में इस बात की अधिक आवश्यकता है कि तंत्र में सुधार लाया जाए जिससे कि इन नेताओं की आमद को प्रतिबंधित किया जा सके, जिसके बाद ही लोगों का ऐसे आपराधिक नेताओं को समर्थन बंद हो सकता है।

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