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गीता प्रेस शताब्दी वर्ष: 15 से अधिक भाषाएं, 70 करोड़ पुस्तकों का प्रकाशन, जानिए इस अनोखी संस्था के बारे में

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गोरखपुर, 5 जून: गीता प्रेस का नाम ही काफी है। इसके बाद यह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सत्य, प्रेम और शांति के साथ मानवता की सेवा करना था, जो सौ वर्ष बाद भी कायम है। 1923 में इसकी स्थापना कलकत्ता से हुई थी,लेकिन आज इसकी पहचान गोरखपुर से है। इसकी स्थापना के शताब्दी वर्ष का आरंभ करते हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भी शनिवार को कहा कि यह कोई सामान्य प्रिंटिंग प्रेस नहीं है, बल्कि साहित्य का मंदिर है, जो समाज को दिशा दे रहा है। राष्ट्रपति के मुताबिक सनातन धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षा करने में इसकी भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना की मंदिरों और कोई भी तीर्थस्थल का है। आइए इस स्पेशल रिपोर्ट में गीता प्रेस के बारे में विस्तार से जानते हैं।

गीता प्रेस का उद्देश्य

गीता प्रेस का उद्देश्य

गीता प्रेस ने अपने प्रकाशनों के माध्यम से भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने में जो भूमिका निभाई है, वह अनमोल, अद्वितीय है। जब इसकी स्थापना हुई थी, तब इसका प्रयोजन यही था कि किस तरह से पवित्र भगवद गीता को उसके शुद्ध स्वरूप में सही अर्थों के साथ और बहुत ही मामूली दाम पर आम जनों तक पहुंचाया जाए, जो कि उस समय उपलब्ध नहीं था। करीब सौ साल पहले कलकत्ता से शुद्ध हृदय से आरंभ हुआ यह प्रयास अब भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमिट हो चुका है।

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    गीता प्रेस की उपलब्धि

    गीता प्रेस की उपलब्धि

    गीता प्रेस की उपलब्धि का आकलन इसी से किया जा सकता है कि अब तक यहां से विभिन्न भाषाओं में 70 करोड़ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यह हिंदुओं की धार्मिक पुस्तकों का विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशक है। गीता प्रेस सिर्फ एक प्रकाशन नहीं, बल्कि एक भावना है, क्योंकि तमाम वित्तीय दबावों के बावजूद इसने लोगों को सस्ती कीमतों में धार्मिक पुस्तकें उपलब्ध करवाना कभी नहीं छोड़ा, ना ही कभी इस मामले में इसका इरादा अपने लक्ष्य से भटक पाया। आज भी गीता प्रेस से 1850 प्रकाशन हो रहे हैं। इनमें 760 अकेले संस्कृत और हिंदी भाषाओं में हैं। इनके अलावा अंग्रेजी, पंजाबी, ऊर्दू, नेपाली, गुजराती, मराठी, तेलगू, बंगाली,उड़िया, तमिल, कन्नड़, असमी और मलायलम में प्रकाशित होती हैं।

    गीता प्रेस की स्थापना

    गीता प्रेस की स्थापना

    गीता प्रेस सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1860 (वर्तमान में वेस्ट बेंगाल सोसाइटीज ऐक्ट, 1960) के तहत गोबिंद भवन कार्यालय की एक यूनिट है। इसकी स्थापना 29 अप्रैल, 1923 को जयदयाल गोयन्दका ने भगवद गीता के ज्ञान को उसी स्वरूप में जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य के साथ की थी। जिनका लक्ष्य सनातन साहित्य को कम से कम दाम में लोगों तक पहुंचाना था, ताकि उन तक गीता का ज्ञान पहुंच सके, जिसमें समाज और पूरे ब्रह्मांड का कल्याण समाहित है। इस संस्था का मूल दृष्टिकोण सनातन धर्म से संबंधित विचारों को बढ़ावा देना और फैलाना है। जिसके लिए गीता, रामायण, उपनिषद, पुराण,दुर्गा सप्तशति,भक्त-धटक, प्रख्यात संतों के वचनों और अन्य चरित्र-निर्माण पुस्तकों और पत्रिकाओं को बहुत ही मामूली कीमत पर बेचा जाता है।

    'कल्याण' गीता प्रेस की मासिक पत्रिका

    'कल्याण' गीता प्रेस की मासिक पत्रिका

    यह संस्था सभी के जीवन की बेहतरी और भले के लिए प्रयास करती है। गीता प्रेस को न्यास बोर्ड के द्वारा संचिलित किया जाता है, जिसका खुद या कमाई के लिए कोई लक्ष्य नहीं है। यह संस्था न तो दान मांगती है और ना ही अपने प्रकाशनों में विज्ञापनों को स्वीकार करती है। कल्याण और कल्याण-कल्पतरु गीता प्रेस की मासिक पत्रिकाएं हैं। राष्ट्रपति कोविंद के मुताबिक 'कल्याण' संभवत: गीता प्रेस की सबसे प्रसिद्ध प्रकाशन है और भारत में व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली धार्मिक पत्रिका है।

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    स्वच्छता का सिपाही

    स्वच्छता का सिपाही

    इतने अधिक प्रकाशन के बावजूद गीता प्रेस ने सामाजिक मानदंडों के साथ कभी भी समझौता नहीं किया है। भक्ति-भावना यहां के कार्यकर्ताओं में तो भरी हुई है ही, स्वच्छता के साथ भी इस संस्था ने कभी समझौता नहीं किया है। इसके पुस्तकों से जो गीता या रामायण का ज्ञान बांटा जाता है, सबसे पहले यह संस्था स्वयं उसपर अमल करती है। यही कारण है कि लगभग 500 कर्मचारियों की मौजूदगी और लगभग 15 पुस्तकों की कटाई-छटाई के बावजूद यहां कचरे का नाम-निशान नहीं होता। साथ के साथ कतरनों के निस्तारण की भी व्यवस्था की गई है। अनुमान के मुताबिक रोजाना इस तरह का डेढ़ टन कचरा निकलता है, लेकिन उस सबके रिसाइकल करने की पुख्ता इंतजाम किया हुआ है।

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    English summary
    Gita Press Centenary Year: publication of more than 700 million books in 15 languages,know about it
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