• search
उत्तर प्रदेश न्यूज़ के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  

2017 से 2022 में अखिलेश ने बदला सपा का ट्रैक, जानिए मुलायम परिवार क्यों हैं पूरे सीन से गायब

|
Google Oneindia News

लखनऊ, 24 जनवरी: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की छोटी बहु अपर्णा यादव भाजपा में क्या शामिल हुईं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी (अखिलेश यादव) लेकिन तमाम तरह के आरोप मीडिया में सुर्खियां बटोरने लगे हैं। कोई कह रहा है कि परिवार की लड़ाई घर की दहलीज से बाहर आ गई है तो कोई कह रहा है- अखिलेश यादव 'एको अहम' की सियासी महत्वाकांक्षा का शिकार हो गए हैं। इस बीच हालांकि राम अचल राजभर, ओम प्रकाश राजभर, संजय चौहान, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे गैर-यादव ओबीसी नेताओं के साथ चुनावी मंच साझा करके अखिलेश यह संदेश देने की कोशिश की है कि समाजवादी पार्टी सिर्फ यादवों और मुसलमानों की पार्टी नहीं है और न ही परिवारवाद में उलझना चाहती है।

अखिलेश यादव

वंशवाद के राजनीतिक आरोपों से बचने के लिए अखिलेश ने न तो परिवार के सदस्यों को टिकट दिया और न ही उन्हें चुनावी गतिविधियों में शामिल किया. 2014 के लोकसभा चुनाव को कौन भूल सकता है जब मुलायम सिंह यादव मैनपुरी और आजमगढ़ से सांसद चुने गए थे, फिरोजाबाद से राम गोपाल के बेटे, बदायूं से धर्मेंद्र यादव और कन्नौज से डिंपल। जब मुलायम ने बाद में मैनपुरी सीट खाली कर दी, तो उनके दिवंगत भाई रतन सिंह यादव के पोते तेज प्रताप सिंह यादव सांसद चुने गए। लेकिन 2022 के चुनाव से पूरा सपा कुनबा चुनावी पर्दे से गायब हैं।

क्या परिवारवाद अतीत के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के लिए चाहे सपा में उम्मीदवारों के चयन का मामला हो, चुनाव में प्रचार का मामला हो या अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी गठबंधन बनाने का फैसला हो, अखिलेश यादव ही सभी में मुख्य भूमिका में नजर आए। समाजवादी पार्टी पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वह एक परिवार (मुलायम सिंह यादव परिवार) की पार्टी है।

2022 के चुनाव में अखिलेश यादव सपा पर परिवारवाद का दाग मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वृद्धावस्था और बीमार होने के कारण पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पार्टी की किसी बैठक या रैलियों में शामिल नहीं होते हैं। भतीजे की मदद के लिए हर सभा, हर रैली में मौजूद चाचा रामगोपाल यादव की मौजूदगी भी इस चुनाव में कहीं नजर नहीं आती। अखिलेश की चाचा शिवपाल के साथ तस्वीरें गठबंधन को लेकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के साथ उनकी मुलाकात तक सीमित हैं। पत्नी डिंपल यादव, जो कि सपा सांसद भी हैं, की अनुपस्थिति ने सभी को हैरान कर दिया है।

अखिलेश के लिए परिवार के किसी सदस्य को टिकट नहीं देने का फैसला आसान नहीं था। लेकिन बड़े लक्ष्य को पाने के लिए सोच को बड़ा बनाना पड़ता है। इसलिए अखिलेश ने परिवार के खिलाफ ये सारे फैसले लिए। निश्चित रूप से अखिलेश यादव मुलायम के साये से बाहर इस चुनाव को लड़ने का संदेश दे रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि 'सपा में परिवारवाद' अब बीते दिनों के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा।

अपर्णा यादव को जाना पड़ा बीजेपी में!
कई राजनीतिक पंडित और सपा के विरोधी यह कहने से बाज नहीं आ रहे हैं कि अखिलेश यादव एको अहम की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का शिकार हो गए हैं और इसका नतीजा अपर्णा यादव के भाजपा में शामिल होने के रूप में सामने आया। लेकिन यहां मामला अलग है। अगर आपको याद हो तो अखिलेश सरकार के कार्यकाल के आखिरी दिनों में जिस तरह से परिवार में कलह थी और उसका असर 2017 के चुनाव नतीजों में भी दिखा, 2022 के चुनाव से पहले भी ऐसा ही दुष्चक्र बना हुआ है, लेकिन पर्दे के पीछे अपनी चाल चलने वाले लोग शायद भूल गए होंगे कि ये 2022 के अखिलेश यादव हैं जो 2017 के बबुआ नहीं रह गए हैं।

    UP Election 2022: Mathura विधानसभा सीट का समझिए पूरा चुनावी समीकरण | वनइंडिया हिंदी

    करीब 16-17 साल पहले मुलायम परिवार को साथ रखने का समझौता हुआ था। तभी मुलायम और अखिलेश के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। तब अमर सिंह ने पिता और पुत्र के बीच के मतभेदों को खत्म करने की जिम्मेदारी ली। अमर सिंह ने न केवल साधना यादव को परिवार में प्रवेश दिया, बल्कि एक समझौते के तहत अखिलेश यादव को भी मनाया। समझौते के अनुसार, अखिलेश यादव को मुलायम की राजनीतिक विरासत का एकमात्र उत्तराधिकारी बनाया गया था।

    साधना यादव के बेटे प्रतीक यादव भले ही कह रहे हों कि वह कभी राजनीति में नहीं आएंगे, लेकिन उनकी पत्नी अपर्णा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हमेशा उबलती रही हैं। अखिलेश ने अपर्णा की जिद को उसी समझौते की शर्तों से जोड़ा। इसके बावजूद 2017 में मुलायम सिंह यादव ने अपर्णा को पार्टी का टिकट दिलाया। अपर्णा चुनाव हार गईं, जिसका आरोप अखिलेश पर भी लग गया कि वे नहीं चाहते थे कि अपर्णा चुनाव जीतें।

    लेकिन अपर्णा ने हार नहीं मानी और सीएम योगी और पीएम मोदी की तारीफ करने लगी. सीएम योगी से भी मिले। अखिलेश ने जहां राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटाने वालों को बुलाया था, वहीं अपर्णा ने राम मंदिर के लिए 11 लाख रुपये का दान दिया. अपर्णा की इन सब हरकतों से अखिलेश ने ऐसी चाल चली कि क्या अपर्णा, क्या डिंपल और धर्मेंद्र यादव सब उस जद में आ गए, जिसमें तय हुआ कि इस चुनाव में परिवार के किसी भी सदस्य को टिकट नहीं मिलेगा. राजनीति में करियर बनाने को बेताब अपर्णा के लिए ये फैसला उन्हें मिटाने जैसा था।

    यह भी पढ़ें-यूपी चुनाव 2022: कांग्रेस ने जारी की स्टार प्रचारकों की लिस्ट, प्रियंका-राहुल समेत ये 30 नाम हैं शामिलयह भी पढ़ें-यूपी चुनाव 2022: कांग्रेस ने जारी की स्टार प्रचारकों की लिस्ट, प्रियंका-राहुल समेत ये 30 नाम हैं शामिल

    Comments
    English summary
    Akhilesh changed the track of SP from 2017 to 2022
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    For Daily Alerts
    तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
    Enable
    x
    Notification Settings X
    Time Settings
    Done
    Clear Notification X
    Do you want to clear all the notifications from your inbox?
    Settings X
    X