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इंसान मूलतः एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैंः शोध

एक नया शोध कहता है कि पूरी दुनिया में इंसान एक दूसरे की मदद करना पसंद करते हैं, और वे ऐसी परिस्थितियों में भी मदद करते हैं जिनमें वे सांस्कृतिक, धार्मिक या किसी अन्य भेद के कारण आसानी से ना कह सकते हैं.

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ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी और अमेरिका की कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी ने मिलकर यह शोध किया है जिसमें छोटी-मोटी मदद जैसे खाना पकाने आदि में लोगों द्वारा एक दूसरे से मांगी गई मदद पर हां या ना कहने की बारंबारता का अध्ययन किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि जब भी मदद का दायरा स्पष्ट था, लोगों ने ज्यादा हां में जवाब दिया.

सिडनी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर लैंग्वेज रिसर्च में प्रोफेसर निक एनफील्ड के नेतृत्व में हुआ यह अध्ययन 'नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन का निष्कर्ष है कि विभिन्न संस्कृतियों से आने वाले लोग भले ही अलग प्रतीत होते हैं लेकिन अंदर से वे बहुत कुछ एक जैसे हैं.

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शोध में इंग्लैंड, इटली, रूस और पोलैंड के कस्बों से लेकर इक्वाडोर, घाना, लाओस और ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों तक के बीच आपसी बातचीत की बारीकियों का अध्ययन किया गया. प्रोफेसर निक एनफील्ड कहते हैं, "एक दूसरे पर हमारी निर्भरता सतत है."

पल-पल मांगी जाती है मदद

रिपोर्ट के मुताबिक रोजमर्रा के जीवन में छोटी-मोटी मदद के लिए मसलन, बर्तन देने जैसे काम के लिए औसतन हर दो मिनट और 17 सेकंड्स में एक बार लोग एक दूसरे से कहते हैं. सभी संस्कृतियों में ये छोटी छोटी गुजारिशें जितनी बार नकारी जाती हैं, उससे सात गुना ज्यादा बाद जवाब हां में होता है.

प्रोफेसर एनफील्ड कहते हैं, "यदा-कदा जब लोग काम करने से मना करते हैं तो वे बताते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. एक दूसरे की मदद करने की यह प्रकृति, और मना करने पर कारण बताने की प्रवृत्ति तमाम संस्कृतियों में एक जैसी है."

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शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ संस्कृतियों में मदद मांगने पर ना करने की प्रवृत्ति दूसरों से ज्यादा होती है. जैसे कि उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में मुरीनपाथा भाषा बोलने वालों के बीच मना करने की संभावना ज्यादा पाई गई लेकिन उस स्थिति में भी 74 फीसदी हां करने वाले थे और सिर्फ 26 फीसदी मामलों में ही ना की गई. हालांकि शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि ना करने का अर्थ उन्हें खारिज करना नहीं था.

जब-जब लोगों ने मदद से इनकार किया तो 74 फीसदी मामलों में उन्होंने इनकार की वजह भी बताई, जिसके आधार पर शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि अगर लोग एक दूसरे की मदद नहीं कर पा रहे हैं तो उसकी कोई ना कोई वजह होती है और वे भिन्न परिस्थितियों में मदद करते. यानी ना करने के पीछे भी भावना मदद को नकारना नहीं थी. इसके उलट जब लोग मदद करते हैं तो वे कारण नहीं बताते कि वे क्यों मदद कर रहे हैं. सिर्फ चार फीसदी मामलों में ऐसा पाया गया कि लोगों ने कारण बताकर एक दूसरे की मदद की.

इंसानी व्यवहार की समझ

शोधकर्ता कहते हैं कि इस शोध के नतीजे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे सहयोग और संपर्क के ताने-बाने को समझने में मदद मिलती है. आम समझ है कि किसी तरह का दबाव हो तो लोग छोटी-मोटी मदद के लिए मना करेंगे लेकिन असल में ऐसा नहीं है. आमतौर पर लोग एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं और ऐसा ना कर पाने पर सफाई भी देते हैं.

शोध के लिए विशेषज्ञों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की हजारों छोटी-छोटी वीडियो का अध्ययन किया. वे उदाहरण देते हैं कि इंडोनेशिया के लामालीरा में शिकारी जब कोई बड़ा शिकार करते हैं तो वे एक दूसरे के साथ नियम से उसे बांटते हैं. तंजानिया के हादजा लोग अपने शिकार को इसलिए बांटते हैं कि कहीं उनके बारे में कोई बुरा ना बोले. केन्या के धनी ओरमा ग्रामीण सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे सड़क आदि के लिए खुलकर मदद करते हैं जबकि पापुआ न्यू गिनी के लोगों में ऐसे कामों के लिए ना करने की संभावना ज्यादा होती है.

प्रोफेसर एनफील्ड कहते हैं कि ऐसी सांस्कृतिक भिन्नताएं इंसानी व्यवहार को समझने में जटलिताएं पैदा करती हैं. वह कहते हैं, "बांटने और मदद करने के हमारे फैसले हमारी संस्कृति पर निर्भर करते हैं या ऐसा करना इंसान का मूल स्वभाव है? जब हम व्यक्तिगत स्तर पर या छोटे पैमाने पर सामाजिक रूप से संवाद करते हैं तो सांस्कृति भेद मिट जाते हैं और मदद करने की प्रवृत्ति वैश्विक हो जाती है."

Source: DW

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