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फ़ुटबॉल, साहित्य, गोलकीपिंग का दर्शनशास्त्र और कामू के फटे जूते

दुनिया भर में बीसवीं शताब्दी के लेखन की आत्मा पर जिन दो या तीन लेखकों ने सबसे ज़्यादा प्रभाव छोड़ा है, कामू निर्विवाद रूप से उनमें से एक हैं.

By BBC News हिन्दी
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अल्बैर कामू
Getty Images
अल्बैर कामू

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक टीम के रूप में अल्जीरिया का प्रदर्शन किसी भी तौर पर उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता. 1930 में हुए पहले फुटबॉल वर्ल्ड कप से लेकर आज तक वह कुल चार बार - 1982, 1986, 2010 और 2014 - उसमें हिस्सा ले सकी है.

पिछले वर्ल्ड कप में बाहर होने के बाद वह इस बार भी कैमरून से हार कर क्वालीफाई करने से रह गई. इसके बावजूद उसके नाम कुछ अद्वितीय रिकॉर्ड दर्ज हैं.

मिसाल के तौर पर किसी भी यूरोपियन टीम को पराजित करने वाली वह पहली अफ्रीकी टीम बनी. 1982 के वर्ल्ड कप में उसने जर्मनी को हराकर यह असंभव काम कर दिखाया था.

यह और बात है कि जब-जब अल्जीरियाई फुटबॉल का ज़िक्र चलता है, बीसवीं सदी के महानतम साहित्यकारों में से एक का नाम अवश्य लिया जाता है.

मात्र चवालीस साल की आयु में साहित्य का प्रतिष्ठित नोबेल पुरुस्कार हासिल करने वाले इस साहित्यकार का नाम था अल्बैर कामू.

रूडयार्ड किपलिंग के बाद इस सम्मान को पाने वाले वे सबसे युवा लेखक थे. आलोचकों ने कामू को अस्तित्ववादी कहा अलबत्ता वे खुद ऐसा मानने से इनकार करते रहे.

वाकया है कि पेरिस के पार्क देस प्रिंसेस स्टेडियम में 23 अक्टूबर 1957 की दोपहर चल रहे एक फुटबॉल मैच को देखने के लिए मौजूद करीब 35000 दर्शकों में अल्बैर कामू भी थे जिन्हें ठीक एक सप्ताह पहले साहित्य का नोबेल दिए जाने की घोषणा हुई थी.

गोलकीपर थे कामू

अल्बैर कामू एक फोटोग्राफर के साथ
Getty Images
अल्बैर कामू एक फोटोग्राफर के साथ

इस लेखक का इंटरव्यू करने के लिए एक टीवी पत्रकार स्टेडियम में ही पहुँच गया. मैच के दौरान एक गोल हुआ तो इंटरव्यू करने वाले पत्रकार ने कामू से पूछा, “टीम का गोलकीपर अपनी पूरी फॉर्म में नहीं दिख रहा?”

कामू जवाब देते हैं, “उसे दोष मत दीजिये. गोलपोस्ट के खम्भों के बीच खड़े होकर ही आपको अहसास होगा यह सब कितना मुश्किल होता है.”

पत्रकार अगले सवाल के साथ तैयार था, “आप भी तो गोलकीपर रहे थे न?”

कामू कहते हैं, “हां, मैं अल्जीरियन यूनिवर्सिटी रेसिंग क्लब का गोली था. उसकी और पेरिस रेसिंग क्लब की जर्सियां एक जैसी हैं.”

मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार नोबेल मिलने के बाद किसी लेखक का इंटरव्यू फुटबॉल स्टेडियम में हो रहा था. पत्रकार पूछता है, नोबेल ज्यूरी के निर्णय को किन चीजों ने प्रभावित किया होगा?”

“पता नहीं, मैं स्वीडिश अकादमी के सेक्रेटरी को नहीं जानता. लेकिन मैं समझता हूँ दो-एक लेखक और हैं जिन्हें मुझसे पहले इस इनाम के लिए चुना जाना चाहिए था.”

इस दुर्लभ इंटरव्यू की थोड़ी सी फुटेज यूट्यूब में देखी जा सकती है.

दुनिया भर में बीसवीं शताब्दी के लेखन की आत्मा पर जिन दो या तीन लेखकों ने सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ा है, कामू निर्विवाद रूप से उनमें से एक हैं.

आल्बेयर कामू के उपन्यास 'द प्लेग' में इस दौर के लिए क्या हैं सबक?

फुटबॉल के साथ रिश्ता

अल्बैर कामू की क़ब्र
Getty Images
अल्बैर कामू की क़ब्र

फुटबॉल के साथ कामू का रिश्ता बेहद आकर्षक था. खेल से प्रेम करने वाले लेखकों की बड़ी संख्या है लेकिन जिस तरह कामू ने उसे अपने जीवन दर्शन का हिस्सा बनाया वह अद्भुत है. ऐसे लेखकों को याद करते हुए मुझे अर्नेस्ट हेमिंग्वे, सी. एल. आर. जेम्स और एदुआर्दो गालेयानो के नाम याद आना स्वाभाविक है.

कामू ख़ुद फ़ुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे. कामू के मुताबिक उन्होंने दो विश्वविद्यालयों से जीवन सीखा – पहला थियेटर और दूसरा फुटबॉल.

उनका एक और कथन कई जगह उद्धृत किया जाता है - "नैतिकता और कर्तव्य की बाबत जितना भी मुझे निश्चित ज्ञान है, उसके लिए मैं फ़ुटबॉल का ऋणी हूं."

कामू ने 1930 के दशक में अल्जीरिया विश्वविद्यालय की तरफ़ से गोलकीपर की हैसियत से कई मैच खेले थे. उनकी टीम ने नॉर्थ अफ़्रीकन कप और नॉर्थ अफ़्रीकन चैम्पियन्स कप के ख़िताब दो-दो दफ़ा जीते.

सत्रह साल की आयु में कामू को टीबी हो गई थी जिसकी वजह से उन्हें लम्बे अंतराल बिस्तर में आराम करते हुए बिताने पड़ते थे. इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी फुटबॉल छूट गयी. खिलाड़ी के तौर पर करियर बना सकने का उनका सपना भी इसी के साथ ख़त्म हुआ.

कामू का मानना था कि धर्म और राजनीति नैतिकता को ख़ासा जटिल विषय बना देते हैं सो नैतिकता को लेकर उन के पास एक बहुत साफ़ सुथरा और सादा दर्शन था - वे कहते थे कि आपने अपने दोस्तों के प्रति वफ़ादार बने रहना चाहिये. इसके लिए साहस तथा ईमानदारी दो सबसे ज़रूरी वांछित गुण होते हैं. जैसा कि फ़ुटबॉल में आपको करना होता है.

कामू बचपन से ही गोलकीपर की तरह खेला करते थे. इसके पीछे एक खास कारण था. एदुआर्दो गालेआनो ने अपनी किताब 'सॉकर इन सन एन्ड शैडो' में इस बारे में लिखा है.

"क्योंकि गोलकीपर की पोज़ीशन में खेलते हुए आपके जूते उतनी जल्दी नहीं घिसते. बहुत गरीब परिवार वाले कामू के पास मैदान में दौड़ने की सुविधा उठाने लायक संसाधन नहीं थे. उनकी दादी हर शाम उनके लौटने के बाद उनके जूते के तलवों को ग़ौर से देखा करती थी. उनके जल्दी घिस जाने पर कामू की धुनाई होती थी."

कभी गोलकीपर बनकर सोचिए

फ़ुटबॉल गोलकीपर
Getty Images
फ़ुटबॉल गोलकीपर

फ़ुटबॉल प्रैक्टिस के दौरान कामू ने कई बातें सीखीं.

"मैंने सीखा कि जब जब आप गेंद को अपने पास आने की उम्मीद करते हैं, वह आपके पास नहीं आती. इसका मुझे ज़िन्दगी में बहुत लाभ मिला, ख़ास तौर पर बड़े शहरों में रहते हुए, जहां लोग वैसे नहीं होते जैसा वे खुद को दिखाने का यत्न करते हैं."

कामू एक जगह बताते हैं, "फुटबॉल से मैंने यह भी सीखा कि बिना ख़ुद को ईश्वर जैसा महसूस किये जीता जा सकता है और बिना ख़ुद को कचरा जैसा महसूस किये हारा भी जा सकता है. मैंने पाया कि किसी भी तरह का कौशल बहुत आसानी से नहीं प्राप्त किया जा सकता."

कभी गोलकीपर बन कर सोचिए. आप अपनी टीम को गोल करता हुआ देखते हैं तो उसमें आपका योगदान नहीं होता.

आपकी टीम गोल खाती है तो वह हमेशा आपकी ग़लती होती है.

इस मनःस्थिति में नब्बे मिनट लगातार रहते हुए आपने गोलपोस्ट के भीतर ज्यादातर समय अकेले होना होता है. बिलकुल अकेले. गंभीरता से सोचिये तो आपकी समझ में आ जाएगा दुनिया के ज्यादातर गोली दार्शनिकों जैसे क्यों दिखाई देते हैं.

फ़ुटबॉल के माध्यम से कामू दरअसल मनुष्य की आत्मा के रहस्यों के पाताललोक में उतर रहे थे.

टीबी ने उनकी फ़ुटबॉल पर लगाम ज़रूर लगाई पर फ़ुटबॉल जिन चीज़ों से वंचित रह गया, उनके बदले में वह दुनिया को एक महान पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, दार्शनिक और मानवाधिकारों के मुखर वक्ता के रूप में प्राप्त हुआ.

फ़ुटबॉल कैरियर का तो कुछ निश्चित पता नहीं पर जीवन और दर्शन के मैदान में गोलकीपिंग करते हुए कामू का रेकॉर्ड शत प्रतिशत रहा.

'अजनबी’ और 'पतन’ और 'द मिथ ऑफ़ सिसिफ़स’ जैसी कालजयी रचनाओं के लेखक अल्बैर कामू के बारे में नोबेल समिति ने लिखा था, “स्पष्ट निगाह वाली उनकी ईमानदारी हमारे समय की मानवीय चेतना को प्रकाशित करती है.” इस तकरीबन घिसी-पिटी तारीफ़ के जवाब में कामू कहते थे कि हम लोग जीवन भर ख़ुशी और तर्क़ की खोज में लगे रहते तो हैं लेकिन हमारा सामना हर जगह संसार की ऐसी बेमतलब ख़ामोशी से होता है जिसके अस्तित्व को किसी भी तर्क से साबित नहीं किया जा सकता.

ज़ाहिर है नोबेल कमेटी के एक भी सदस्य ने फुटबॉल मैदान के चौड़े, अकेले गोलपोस्ट के बीच थोड़ा सा भी समय नहीं बिताया होगा.

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English summary
Football, Literature, Philosophy of Goalkeeping
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