शोध: 'जीवन के वृक्ष' की पूरी शाखाएं हो रही विलुप्त

एक नए अध्ययन के मुताबिक मनुष्य "जीवन के वृक्ष" की संपूर्ण शाखाओं को नष्ट कर रहा है, जो छठे बड़े पैमाने पर विलुप्त होने के खतरे की चेतावनी देता है. अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यह परिदृश्य विभिन्न प्रजातियों के छठे बड़े पैमाने पर विलुप्त होने का कारण बन सकता है.
'जीवन का वृक्ष' एक रूपक मॉडल और अनुसंधान उपकरण है जिसका इस्तेमाल जैविक विकास का आकलन करने और जीवित और विलुप्त जीवों के बीच संबंधों का वर्णन करने के लिए किया जाता है.
प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित शोध के सह लेखक और ऑटोनॉमस नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मेक्सिको के प्रोफेसर गेरार्डो सेबलोस के मुताबिक, "विलुप्त होने का संकट जलवायु परिवर्तन संकट जितना ही बुरा है. इसे मान्यता नहीं दी गई है."
उन्होंने कहा, "जो कुछ दांव पर लगा है वह मानव जाति का भविष्य है."
यह अध्ययन अपने आप में अनूठा है क्योंकि यह केवल एक प्रजाति के नुकसान की जांच करने के बजाय संपूर्ण प्रजाति के विलुप्त होने की जांच करता है.
हवाई विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी रॉबर्ट कोवी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "यह वास्तव में महत्वपूर्ण काम है, मुझे लगता है कि यह पहली बार है जब किसी ने संपूर्ण प्रजाति समूहों या जेनेरा की विलुप्त होने की दर का अनुमान लगाने की कोशिश की है." कोवी इस शोध में शामिल नहीं थे.
बर्कली में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एंथनी बार्नोव्स्की इससे सहमत हैं. वह कहते हैं, "यह अध्ययन वास्तव में एक ट्री ऑफ लाइफ की पूरी शाखाओं को नुकसान दिखाता है. जिन्हें सबसे पहले ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने विकसित किया था."
बार्नोव्स्की के अनुसार अध्ययन से पता चलता है, "हम न केवल पेड़ों की सबसे महत्वपूर्ण शाखाओं को काट रहे हैं, बल्कि बड़ी शाखाओं से छुटकारा पाने के लिए आरी का इस्तेमाल कर रहे हैं."
शोधकर्ताओं ने इस शोध के लिए काफी हद तक इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) द्वारा विलुप्त के रूप में सूचीबद्ध प्रजातियों पर भरोसा किया. उन्होंने कशेरुक प्रजातियों (मछली को छोड़कर) पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके लिए अधिक डेटा उपलब्ध है.
जीवों के लगभग 5,400 प्रजाति समूहों (लगभग 34,600 प्रजातियां) के इस अध्ययन से विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि इनमें से 73 प्रजाति समूह पिछले 500 वर्षों में विलुप्त हो चुके हैं. इनमें से अधिकांश पिछली दो शताब्दियों में विलुप्त हो गये. इसके बाद शोधकर्ताओं ने इस स्थिति की तुलना बहुत प्राचीन जीवों के जीवाश्मों से की.
इस शोध के दौरान लगाए गए अनुमान के मुताबिक इन प्रजातिसमूहों को विलुप्त होने में 500 साल नहीं बल्कि 18,000 साल लगने चाहिए थे. हालांकि ऐसे अनुमान अंतिम और निश्चित नहीं हैं क्योंकि जीवों की प्रजातियों के ऐसे सभी समूहों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है और संबंधित जीवाश्म रिकॉर्ड भी अधूरा है.
प्रोफेसर गेरार्डो सेबलोस के अनुसार यह मानवीय गतिविधियों के कारण है, जैसे कि फसलों या बुनियादी ढांचे के लिए अन्य जीवों के आवासों का विनाश साथ ही अत्यधिक मछली पकड़ना और शिकार करना. इस शोधकर्ता के तर्क के अनुसार, "अगर आप एक ईंट हटा दें तो दीवार नहीं गिरेगी. अगर आप अधिक ईंटें हटा देंगे तो दीवार गिर जाएगी. हमारी चिंता यह है कि हम इतनी तेजी से चीजें खो रहे हैं कि हमारे लिए यह सभ्यता के खत्म होने का संकेत है."
सभी विशेषज्ञ सहमत हैं कि प्रजातियों के विलुप्त होने की वर्तमान दर चिंताजनक है, लेकिन क्या यह दर जैविक प्रजातियों के छठे बड़े पैमाने पर विलुप्त होने की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करती है, वैसे ही जैसे कि पिछली बार एक बड़े उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने के बाद धरती से डायनासोर गायब हो गए थे? यह अब भी बहस का एक मुद्दा बना हुआ है.
वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर विलुप्त होने को कम समय के भीतर 75 प्रतिशत प्रजातियों की हानि के रूप में परिभाषित करते हैं. जीवविज्ञानी रॉबर्ट कोवी इस 'एकपक्षीय' परिभाषा का इस्तेमाल करते हुए कहते हैं कि छठा सामूहिक विलोपन अभी तक नहीं हुआ है. लेकिन उन्होंने आगाह किया, "अगर हम मान लें कि जैविक प्रजातियों के पूरे समूह मौजूदा दर पर या उससे भी तेज गति से विलुप्त हो जाएंगे, हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि यह संभावित छठे सामूहिक विलुप्ति की शुरुआत है."
एए/वीके (एएफपी)
Source: DW
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