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Niranaram Chaudhary: निरानाराम चौधरी ने छोटी सी गलती के कारण मृत्युदंड पाकर 25 साल जेल में काटे

Narayan Chaudhary Pune Murder Case: साल 1994 में पुणे में सात लोगों की हत्‍या के केस में राजस्‍थान के बीकानेर जिले के गांव जलाबसर के निरानाराम चौधरी को सजा हुई। इसे साल 1998 में 20 साल की उम्र में मौत की सजा सुनाई गई।

Niranaram Chaudhary shreya rastogi project 39a

Niranaram Chetanram Chaudhary Binaker Rajastha: 26 अगस्त 1994...। यह वो तारीख है, जिसने राजस्‍थान के निरानाराम चौधरी को ढाई दशक तक सलाखों के पीछे रहने को मजबूर कर दिया। इस दिन महाराष्‍ट्र के पुणे शहर में सात लोगों की हत्‍या हुई थी। जान गंवाने वालों में पांच महिलाएं व दो बच्‍चे शामिल थे। वारदात को डकैती के प्रयास के दौरान चाकू से अंजाम दिया गया था।

निरानाराम चौधरी (नारायण) राजस्‍थान के बीकानेर जिले के गांव जलाबसर का रहने वाला है। साल 1994 को पुणे में राठी हत्‍याकांड हुआ था तब 12 साल और छह महीने का था। चार साल बाद 23 फरवरी 1998 में निरानाराम को मौत की सजा सुना दी गई। तब उसकी उम्र 20-22 वर्ष मानी गई थी। जबकि वह नाबालिग था। यह सब पुलिस कार्रवाई में रही एक गलती की वजह से हुआ।

राठी हत्‍याकांड में 5 सितम्‍बर को राजू पुरोहित, जीतू गहलोत व निरानाराम चौधरी को भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं में गिरफ्तार किया गया था। बाद में सरकारी गवाह बनने वाले राजू को रिहा कर दिया गया। कुछ साल बाद उसकी राजस्‍थान में सड़क हादसे में मौत हो गई थी। निरानाराम उर्फ नारायण और जीतू को अतिरिक्‍त सत्र न्‍यायाधीश एमएन पटाले ने 19 फरवरी 1998 को दोषी करार देकर चार दिन बाद 23 फरवरी को मौत की सजा सुनाई।

इसके बाद निरानाराम की रिहाई के लिए दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में क्रिमिनल जस्टिस प्रोग्राम प्रोजेक्ट 39ए के तहत नौ साल तक कानूनी लड़ाई गई। तब जाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मार्च 2023 में निरानाराम की रिहाई हुई है। प्रोजेक्ट 39ए मृत्युदंड पाने वाले कैदियों को जेलों में कानूनी सहायता और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर केंद्रित एक अनुसंधान और याचिकाओं की पहल है। इसमें वकीलों की टीम काम करती है।

पुणे मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रोजेक्ट 39-ए की श्रेया रस्तोगी ने बताया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम में नवीनतम संशोधन निरानाराम की रिहाई में काम आया। दरअसल, राजू पुरोहित पुणे शहर में मिठाई की दुकान पर काम करता था। जीतू गहलोत व निरानाराम चौधरी भी उसके गांव के ही थे। एक घर में डकैती के प्रयास में सात लोगों की चाकू मारकर हत्‍या कर दी गई थी।

पुणे पुलिस ने अपनी चार्जशीट में निरानाराम चौधरी का नाम नारायण लिखा। उसकी उम्र 20-22 बताई। जबकि वह उस समय नाबालिग था। पुलिस की यह सबसे बड़ी गलती थी, जिसकी सजा निरानाराम ने ढाई दशक तक भुगती। दूसरी वजह यह थी कि नारायण के नाम से ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिला, जिससे साबित किया सके कि उसे 18 साल की उम्र से पहले ही मौत की सजा सुना दी गई।

जनवरी 2006 में नारायण की दया याचिका में नाबालिग होने का मुद्दा उठाया गया था, लेकिन याचिका वापस ले ली गई थी। उसी समय दिल्‍ली एनएलयू के प्रोजेक्‍ट 39A की संस्थापक सदस्य श्रेया रस्‍तोगी की कैदियों के इंटरव्‍यू करते हुए नारायण से मुलाकात हुई। तब उन्‍हें उसके नाबालिग वाला मुद्दा पता चला।

फिर नारायण ने रस्‍तोगी और अधिवक्ता बसंत के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 2015 के किशोर न्याय अधिनियम की धारा 9 (2) के तहत एक समीक्षा याचिका दायर की। पूरे केस में प्रोजेक्ट 39-ए के अन्‍य स्‍वयंसेवक भी जुड़े। जांच में पता चला कि पुलिस ने निरानाराम को गिरफ्तार करते समय गलत उम्र और नाम नारायण दर्ज कर लिया था।

लंबे समय बाद सामने आया कि नारायण अपने गांव के स्‍कूल में पढ़ता था। समस्‍या यह थी कि गांव के स्‍कूल के पुराने रजिस्‍टर में उसका नाम नारायण की बजाय निरानाराम दर्ज था। जन्‍मतिथि 1 फरवरी 1982 लिखी हुई थी। टीसी व पटवारी का प्रमाण पत्र भी था। इस जन्‍मतिथि ने उसे बचा लिया, क्‍योंकि वह इसके हिसाब से वारदात के समय 12 साल व सजा सुनाए जाने पर 18 साल से कम का साबित हो रहा था। फिर कोर्ट ने भी माना कि नारायण व निरानाराम एक ही व्‍यक्ति है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार करीब तीन दशक तक जेल में बिताने के बाद 41 साल की उम्र में घर लौटे निरानाराम ने कहा कि एक छोटी सी गलती के कारण उसने अपनी जवानी जेल में काट दी। इसके उसका क्‍या कसूर? इसकी भरपाई कौन करेगा?

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