राजस्थान में बहरूपिया कलाकार जानकीलाल भांड जिसे मिलेगा पद्मश्री अवार्ड, जो जानते हैं चार से अधिक भाषाएं
Jankilal Bhand of Rajasthan: राजस्थान में भीलवाड़ा के बहरूपिया कलाकार जानकीलाल भांड को भारत सरकार ने पदमश्री अवार्ड की घोषणा के बाद से ही देशभर में चर्चाएं हो रही है।
भीलवाड़ा के अंतरराष्ट्रीय बहरूपिया कलाकार जानकीलाल भांड को पदमश्री अवार्ड दिया गया। वो 83 वर्ष के है। अवार्ड की घोषणा होते ही प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी है।

जानकीलाल ने अपनी रंगकला के माध्यम से दुनियां के कई देशों में इसका प्रदर्शन किया है। ग्लासगो, बर्लिन, न्यूकेसल, लंदन, न्यूयॉर्क, दुबई, मेलबोर्न में भी प्रस्तुतियां दीं हैं।
जानकीलाल अपनी रंगकला के माध्यम से होली व अन्य त्योहार पर शहर में अपनी कला से लोगों का लोकानुरंजन करते हैं।
संगीत कला केंद्र भीलवाड़ा, राजस्थान दिवस एवं विश्व रंगमंच दिवस पर जानकीलाल भांड को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड दे चुका है। जानकीलाल अपने स्वांग से प्रदेश भर में खासी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं।
जानकीलाल बताते है कि वह 83 वर्ष के हो चुके हैं। बहरूपिया कला उन्हें विरासत में मिली है। पहले दादा कालूलाल व पिता हजारी लाल इस कला को जीवंत रखे थे। इसी से पारिवार का पालन पोषण हो रहा था।
अब ऐसा नहीं है, जहां राज दरबार के सामने प्रदर्शन कर मनोरंजन कर उन्हें हंसाते थे और हमारे को नजराने के रूप में कुछ आर्थिक मदद मिल जाती थी। वह 22 साल की उम्र में भीलवाड़ा आ गए और इसके बाद वह यहीं के हो कर रह गए।
Rajasthan news: जानकीलाल भांड,कौन है आप भी देखिए,सुनिए pic.twitter.com/ofyIAbrVRr
— PURSHOTTAM KUMAR (@pkjoshinews) January 26, 2024
जानकीलाल की माने तो पिछले 65 सालों से विभिन्न तरह की वेशभूषा पहन लोगों का मनोरंजन कर रहे है। वह गाडोलिया लुहार, कालबेलिया, काबुली पठान, ईरानी, फ कीर, राजा, नारद,भगवान भोलेनाथ, माता पार्वती, साधु, दूल्हा, दुल्हन सहित विभिन्न स्वांग रचकर एवं उसके स्वरूप वेशभूषा पहनकर लोगों का मनोरंजन करते हैं।
जानकीलाल मेवाड़ी, राजस्थानी, पंजाबी व पठानी भाषा बेखूबी बोल लेते हैं। दो दशक पहले जिले में कई परिवार इस कला से जुड़े थे, लेकिन अब वह ही इस कला को संभाले हुए है।
लोग मंकी मैन के नाम से जानते थे
जानकीलाल बताते है कि उदयपुर लोक कला मंडल, मुंबई व जोधपुर तथा विदेशों में उन्हें कई खिताब मिले। दिल्ली में एक माह तक कार्यक्रम किया।
वर्ष 1986 में लंदन और न्यूयॉर्क तथा वर्ष 1988 में जर्मन, रोम, बर्मिंघम और फिर लंदन गए थे। न्यूयॉर्क, दुबई, मेलबोर्न में भी उनकी कला को खास दाद मिली।
वहां उन्हें लोग मंकी मैन के नाम से जानने लगे। विदेश में उन्होंने फकीर व बंदर का रोल अदा किया था। जहां लोगों को खूब हंसाने का काम किया।
अभी उम्र के ढलाने पर होने के बावजूद वह होली, दीपावली, ईद व अन्य त्योहार पर शहर में अपनी कला से लोगों का लोकानुरंजन करते हैं।












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