जो फैक्ट्री कारगिल की लड़ाई में चली बोफोर्स तोप के गोले बनाती थी, सरकार ने दिए उसे बेचने के आदेश
जालंधर। कारगिल की पहाड़ियों पर हुई लड़ाई के वक्त बोफोर्स तोपों की मार को पाकिस्तानी शायद ही भूल पाएं। विदेशी तकनीक वाली इन तोपों के गोले देशी फैक्ट्री में बनाए गए। तोप के गोलों के कास्टिंग के पुर्जे बनाने वाले कृष्णा इंजीनियरिंग वर्क्स कंपनी के फोकल पाॅइंट में स्थित प्लांट-2 एवं मशीनरी को बेचा जाएगा। अब इसके आदेश जारी हो गए हैं।

बोफोर्स तोप के गोले बनाने वाली फैक्ट्री बिकेगी
पंजाब स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन (PSIDC) ने इसे बेचने की प्रक्रिया शुरू की है। हां जी, बताया जा रहा है कि उक्त कंपनी ने पंजाब स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन से कर्ज लिया था, जिसे चुकता न करने पर अपनी मलकीयत में ले लिया गया। फिर फैक्ट्री को बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, जिसका अब नोटिस जारी हो गया है।

जालंधर में पंजाब स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन (PSIDC) की ओर से बताया गया कि, फोकल पाॅइंट के प्लाॅट नंबर बी-1 में 4028 वर्ग गज के प्लाॅट और बिल्डिंग 34686 वर्ग फीट की रिजर्व प्राइस 6.16 करोड़ रुपए रखी है। इसी तरह बिक्री में लाॅट नंबर-2 के तहत प्लांट व मशीनरी की अलग से रिजर्व प्राइस 3.85 करोड़ रुपए तय की गई है।
बोफोर्स तोपें, जिनकी मार से टूटी दुश्मन की कमर
कारगिल की लड़ाई उूंची पहाड़ियों पर लड़ी गई। वहां ठंड भी बहुत ज्यादा थी। जब छिपकर हमले करने वाले पाकिस्तानी काबू में नहीं आ रहे थे, तो सेना ने बोफोर्स तोपें मंगवाईं। ये तोपें उस लड़ाई में भारत की जीत का सबसे अहम हथियार बनीं। ये तोपें 27 किलोमीटर की दूरी तक गोले दागती थीं।हल्के वजन के कारण इसे युद्धभूमि में कहीं भी तैनात करना और यहां-वहां ले जाना आसान था।
155 mm लंबी बैरल वाली बोफोर्स तोप 1 मिनट में 10 गोले दागने की ताकत रखती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत -3 डिग्री से लेकर 70 डिग्री के ऊंचे कोण तक फायर करने की है। इस खासियत से यह तोप पहाड़ी इलाकों में बहुत उपयोगी साबित हुई।












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