पंजाब विधानसभा चुनाव में इस सियासी पार्टी का सब कुछ लगा है दांव पर, पढ़िए रिपोर्ट

यह बात छुपी हुई नहीं है कि सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू में बीते करीब साढ़े चार साल तक शीत युद्ध जारी था।

चंडीगढ़, अगस्त 10, 2021। पंजाब में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी सियासी पार्टियों ने अपनी रणनीति तैयार करने शुरू कर दी है। वहीं पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल दो बड़ी सियासी पार्टियों के तौर पर देखी जा रही है। अगर आम आदमी पार्टी की बात की जाए तो आम आदमी पार्टी भी पूरी ज़ोर-शोर के साथ दिल्ली मॉडल पर चुनाव लड़ने के लिए प्रचार-प्रसार में जुट गई है। भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो वह गठबंधन के सहारे शिरोमणि अकाली दल के साथ मिल कर सत्ता का मज़ा लूटते आई है।

punjab leaders

अब सवाल उठता है कि पंजाब विधानसभा में किस सियासी पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है तो सबसे ज़्यादा खोने और पाने के लिए शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस की इज़्ज़त दांव पर लगी हुई है। नवजोत सिंह सिद्धू पर कांग्रेस हाईकमान ने दांव खेला है तो वहीं शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल के लिए अपने पिता की विरासत को बचाना एक बड़ी चुनौती है। प्रकाश सिंह बादल की उम्र काफ़ी हो चुकी है और सेहत भी नासाज़ है। इसलिए क़यास लगाए जा रहे हैं कि पंजाब चुनाव में शिरोमणि अकाली दल का परचम लहराने की सारी ज़िम्मेदारी सुखबीर सिंह बादल की है।

राजनीतिक गलियारों में यह बात छुपी हुई नहीं है कि सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू में बीते करीब साढ़े चार साल तक शीत युद्ध जारी था। जब तक कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू में शीत य़ुद्ध जारी था तब तक शिरोमणी अकाली दल ख़ुद को सेफ़ ज़ोन में महसूस कर रही थी। राजनीतिज्ञ की मानें तो कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू में अभी भी अंदरूनी मनमुटाव जारी है। कांग्रेस आलाकमान जिस तरह से 18 सूत्रीय एजेंडा लेकर चुनावी मैदान में उतरी है उससे सुखबीर सिंह बादल की परेशानियां और बढ़ गईं हैं।

वहीं नवजोत सिंह सिद्धू को जब पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो उसके बाद शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल भी अपना 13 सूत्रीय एजेंडा लेकर चुनावी मैदान में उतर गए। जिस दिन शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन चुनावी वादों की घोषणा के दौरान सुखबीर सिंह बादल ने अपने 27 मिनट के संबोधन दौरान लगभग 30 बार अपने पिता के नाम का ज़िक्र किया। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि शिरोमणि अकाली दल के स्टार प्रचारकों में सब से उपर प्रकाश सिंह बादल का ही नाम आता है। इनके आगे बड़े-बड़े सियासी धुरंधर भी फीके हो जाते हैं। इसका एक उदाहरण ये है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह एक बार खुद कांग्रेस पार्टी छोड़ कर शिरोमणि अकाली दल में शामिल हो गए थे।

लंबी से विधायक बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश बादल ने 2017 में सिर्फ़ दो बार ही पंजाब विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लिया। कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 117 सीटों में से 77 सीटों पर अपना क़ब्ज़ा जमाया था। वहीं 15 सीटों के साथ अकाली दल तीसरे जगह पर थी। पंजाब विधानसभा चुनाव में इस बार प्रकाश सिंह बादल चुनाव लड़ेंगे या नहीं इस पर अभी सवालिया निशान लगा हुआ है।

2008 में सुखबीर सिंह बादल ने शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष के तौर पर पदभार संभाला और तब से निर्वाचित ही हो रहे हैं। 2012 के चुनावों में, अकाली दल ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की थी। 2017 के चुनावों में शिरोमणि अकाली दल को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। वहीं आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी थी। इसके बाद कई दिग्गज अकाली नेताओँ ने सुखबीर सिंह बादल की मुखालफत की थी। उन्होंने सुखबीर सिंह बादल को चुनावी हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था। यह सभी समीकरण शिरोमणि अकाली दल के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। या फिर ऐसा कह ले कि सुखबीर सिंह बादल को सौ साल पुरानी पार्टी की विरासत को बनाए रखने के लिए काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ सकती है। इसलिए सियासी गलियारों में ये हलचल सी मची हुई है कि शिरोमणि अकाली दल का इस बार पंजाब में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में सब कुछ दांव पर लगा हुआ है।

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