ये हैं वो 5 अहम कारण, जिसके चलते कैप्टन अमरिंदर सिंह को पूर्ण बहुमत के बाद भी छोड़नी पड़ी कुर्सी

नई दिल्ली, 18 सितंबर: 2017 में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली और नवजोत सिंह सिद्धू को मंत्री पद मिला। पिछले चार साल कैप्टन सिद्धू खेमे पर हावी रहे, लेकिन कुछ दिनों पहले सिद्धू ने ऐसी चाल चली, जिसने सारा गेम पलट दिया। पहले सिद्धू को पंजाब पीसीसी की कमान मिली, तो वहीं शनिवार को नाराज होकर अमरिंदर सिंह ने इस्तीफा दे दिया। आइए जानते हैं वो पांच अहम कारण जिसने कैप्टन को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

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    ड्रग्स तस्करी और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी

    ड्रग्स तस्करी और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी

    पंजाब चुनाव में कांग्रेस ने वादा किया था कि वो नशीले पदार्थों की तस्करी पूरी तरह से बंद करवा देगी। साथ ही इस काम में लिप्त लोगों को कड़ी सजा मिलेगी, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद बहुत से मामले अटके रह गए। इसके अलावा बरगाड़ी के गुरुद्वारा साहिब से श्री गुरु ग्रंथ साहिब के पवित्र स्वरूप चोरी हो गए थे। उस पर भी कांग्रेस ने कार्रवाई की बात की थी, लेकिन ये वादा भी अधूरा रहा। वहीं कैप्टन पर दबाव तब ज्यादा बढ़ा, जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को कोटकपूरा पुलिस फायरिंग मामले में क्लिनचिट दे दी। इस घटना में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर फायरिंग हुई थी। कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए इसे भी मुद्दा बनाया था।

    विधायकों और सीएम के बीच दूरी

    विधायकों और सीएम के बीच दूरी

    कई लोगों का मानना है कि कैप्टन का ये कार्यकाल पिछले वाले से अलग था। पहले वो कांग्रेस विधायकों और नेताओं से आसानी से मिलते थे, लेकिन इस बार बतौर सीएम उनसे मिलना बहुत ही मुश्किल था। वो एक विशेष मंडली द्वारा घिरे रहते थे। आरोप है कि अमरिंदर सिंह बहुत कम ही चंडीगढ़ स्थित सचिवालय जाते थे। साथ ही उन्होंने अपने निवास को शहर से फॉर्महाउस में शिफ्ट कर दिया। कई बागी भी ये मुद्दा उठा चुके थे कि कांग्रेस नेताओं और विधायकों की पहुंच सीएम तक बहुत कम है।

    नौकरशाह चला रहे थे सरकार?

    नौकरशाह चला रहे थे सरकार?

    राज्यभर के कांग्रेस नेताओं की ये शिकायत थी कि पंजाब की सरकार नौकरशाहों द्वारा चलाई जा रही है। मार्च 2017 में कार्यभार संभालने के तुरंत बाद, अमरिंदर ने 1983 बैच के आईएएस अधिकारी सुरेश कुमार को अपना मुख्य प्रधान सचिव नियुक्त किया, जो केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव के बराबर का पद था। हालांकि बाद में नियुक्ति को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया और कुमार को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन बतौर सीएम कैप्टन ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बाद में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। कुछ लोगों का मनाना था कि सीएम की अनुपस्थिति में सचिवालय में सबसे पावरपुल शख्स कुमार ही थे। कई जिलों से शिकायत आई थी कि पूर्व सीएम बादल का प्रशासनिक अधिकारियों में ज्यादा दबदबा है, जिस वजह से स्थानीय कांग्रेस विधायकों तक की नहीं सुनी जा रही थी।

    सर्वे में हुए फेल

    सर्वे में हुए फेल

    हाल ही में कांग्रेस ने पंजाब में बाहरी एजेंसियों द्वारा एक सर्वे करवाया। जिसमें पाया गया कि सीएम की लोकप्रियता कम हो गई थी। जिसके बाद कैप्टर अमरिंदर सिंह की क्षमता पर सवालिया निशान खड़े हो गए।

    नंबर गेम

    नंबर गेम

    पीसीसी चीफ बनते ही सिद्धू भी एक्टिव हो गए। सबसे पहले उन्होंने उन नेताओं को अपने खेमे में किया जो कैप्टन से नाराज थे। अगस्त में पंजाब सरकार के मंत्री तृप्त राजेंद्र सिंह बाजवा के घर एक बैठक हुई। जिसमें तीन अन्य मंत्री सुखबिंदर सिंह सरकारिया, सुखजिंदर सिंह रंधावा और चरणजीत सिंह चन्नी भी मौजद रहे। इसके अलावा करीब दो दर्जन विधायक भी इसमें पहुंचे थे। इस बैठक के बाद बाहर आए मंत्रियों और विधायकों ने कैप्टन को पद से हटाने का खुला आह्वान कर डाला। जिसके बाद कैप्टन और ज्यादा बैकफुट पर आ गए। मामला तब ज्यादा गड़बड़ा गया, जब कांग्रेस के बागी नेता ही जनता के सामने ये कहने लगे कि उनकी सरकार ने चुनावी वादे नहीं पूरे किए। इन सब वजहों से परेशान कैप्टन अमरिंदर सिंह ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया।

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