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जलियांवाला और भगतसिंह पाकिस्तानी बच्चों को क्यूं नहीं पढ़ाए जातेः ब्लॉग

By Bbc Hindi

क्या पाकिस्तान में जलियांवाला बाग़ की 100वीं बरसी मनाई गई? बिल्कुल मनाई गई. पाकिस्तान के सूचना मंत्री फ़व्वाद चौधरी ने 13 अप्रैल से एक दिन पहले अपने ट्विटर के ज़रिए ब्रिटेन से मांग की, कि वो जलियांवाला बाग़ नरसंहार पर माफ़ी मांगे. बंगाल में अंग्रेज़ों की ग़लत नीतियों के कारण भुखमरी से 1940 के दशक में जो लाखों लोग मारे गए, उस पर भी माफ़ी मांगे और अंग्रेज़ों ने लाहौर से जो कोहिनूर हीरा चुराया था, पाकिस्तान को वापस कर दें.

जलियांवाला बाग़
RAVINDER SINGH ROBIN/BBC
जलियांवाला बाग़

अब आप सौ प्रतिशत ये पूछेंगे कि भला जलियांवाला बाग़, बंगाल के अकाल और कोहिनूर हीरे की चोरी का आपसी संबंध क्या है, और एक ही ट्वीट में ये तीनों विषय निपटाने की ऐसी क्या जल्दी थी.

इस पर एक क़िस्सा सुनिए- एक साहब ने अपनी पत्नी के देहांत पर अपने ससुरजी को टेलीग्राम भेजा कि दौलतजहां का इंतक़ाल हो गया है, आप आएं तो अपने साथ पहलवान स्वीट्स की रेवड़ियों के दो डिब्बे भी लेते आएं.

उनके बेटे ने पूछा कि अब्बा ऐसे मौक़े पर नानाजी से रेवड़ियों की फ़रमाइश ज़रूरी थी क्या?

अब्बा ने कहा कि बेटे मैंने एक ही टेलीग्राम में दोनों बातें इसलिए लिख दी ताकि पैसे बचें, ख़ुद कमाओगे तब पता चलेगा.

तो यूं समझिए कि हमारे सूचना मंत्री ने वक़्त बचाने के लिए जलियांवाला बाग़, बंगाल की भुखमरी और कोहिनूर हीरे को एक ही ट्वीट में निपटा दिया.

क्या इतना काफी नहीं

जलियांवाला बाग़ की पुरानी तस्वीर
PARTITION MUSEUM
जलियांवाला बाग़ की पुरानी तस्वीर

अब अगर आप ये कहें कि 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ के शहीदों की याद में कोई डाक टिकट भी छपा, प्रधानमंत्री ने कोई पैग़ाम दिया, पाकिस्तानी झंडे को शोक में झुकाया गया, तो अर्ज़ ये है कि हमें और भी ज़रूरी काम करने हैं, ऐसी 'आलतू-फ़ालतू' बातों के लिए हमारे पास समय नहीं.

क्या इतना काफ़ी नहीं कि जलियांवाला नरसंहार की ख़बर 100 बरस पहले लाहौर पहुंची तो पूरे लाहौर में उसी दिन हंगामा हो गया. जिन्ना साहब ने रौलेट एक्ट के ख़िलाफ़ लेजिसलैटिव काउंसिल से इस्तीफ़ा देकर धुंआधार बयान दिए.

एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) में तैनाती के दौरान अपनी कार के साथ जनरल डायर
MARTIN DYER
एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) में तैनाती के दौरान अपनी कार के साथ जनरल डायर

जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले ही दिन गुजरांवाला में ग़ुस्से में भरे हिंदुस्तानियों की भीड़ को भगाने के लिए ब्रिटिश इंडियन एयरफोर्स ने बमबारी भी की. पर हमें तो यह सब इतिहास में बताया ही नहीं गया. हमें तो ये समाचार भी कोई 15-20 साल पहले ही पता चला कि भगतसिंह पाकिस्तान में पैदा हुआ था और उसे फांसी भी यहीं दी गई.

अच्छा, हुआ होगा ऐसा, तो? पाकिस्तान में पैदा होने से कोई पाकिस्तानी थोड़े ही हो जाता है. मनमोहन सिंह भी पाकिस्तान में पैदा हुए थे. मेरे बचपन में जो स्कूली इतिहास पढ़ाया जाता था, उसमें गौतम बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, मंगल पांडे, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला भी पाकिस्तानी सभ्यता का हिस्सा थे.

मगर फिर एक दिन फ़ैसला हुआ कि पाकिस्तानी इतिहास मोहम्मद बिन क़ासिम से शुरू होगा और विभाजन से होता हुआ मोहम्मद ज़िया-उल-हक़ पर ख़त्म होगा, सारे हीरो मध्य एशिया और मध्य-पूर्व से आयातित होंगे.

ऐसे में बुल्ले शाह, वारिस शाह और दुल्ला भट्टी की जगह भी मुश्किल से निकलती है और आप फ़रमाइश कर रहे हैं कि जलियांवाला बाग़ और भगतसिंह पाकिस्तानी बच्चों को क्यूं नहीं पढ़ाए जाते.

रंजीत सिंह से भी बस थोड़ा-बहुत इसलिए संबंध है कि उनकी राजधानी लाहौर थी और कोहिनूर हीरा उनकी पगड़ी में चमक रहा था जिसे अंग्रेज़ छीनकर ले गए.

जलियांवाला बाग़ स्मारक
Getty Images
जलियांवाला बाग़ स्मारक

मालूम नहीं कि हमारे सूचना मंत्री को भी ये बात मालूम है कि नहीं कि पाकिस्तान इस घटना के 100 बरस बाद पैदा हुआ, या उन्हें बस कोहिनूर हीरा ही याद है. चलो कुछ तो याद है.

BBC Hindi
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English summary
Why Bhagat Singh and Jallianwala Bagh are not the part of education in Pakistan.

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