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मुजफ्फरनगर दंगों में सजा के बाद अब विधायकी छिन जायेगी

2013 में मुजफ्फरनगर दंगों को रोकने के लिए सेना बुलानी पड़ी थी

इन दंगों से जुड़े बहुत से मामले सरकार ने वापस भी लिए लेकिन विक्रम सिंह सैनी के खिलाफ मामला वापस नहीं हुआ. यूपी के मुजफ्फरनगर जिले की खतौली विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक की विधायकी पर तलवार लटक गई है. करीब दस साल पहले जिस घटना ने उनके ग्राम प्रधान से विधायक बनने का रास्ता साफ किया था, वही घटना अब उनकी विधायकी छिनने की वजह बन रही है.

मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के मामले में खतौली से बीजेपी विधायक विक्रम सैनी समेत 12 लोगों को निचली अदालत ने सजा सुनाई गई है. मुजफ्फरनगर दंगों की प्रमुख वजह माने जाने वाले 'कवाल कांड' में विशेष एमपी/ एमएलए कोर्ट ने इसी हफ्ते सजा सुनाई है. विधायक विक्रम सैनी को इन्हीं दंगों से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने बरी कर दिया है लेकिन सजा पाने के बाद अब उनकी विधायकी जानी तय है.

यह भी पढ़ेंः मुज्फ्फरनगर दंगों के लिए कौन जिम्मेदार

कवाल कांड में बीजेपी विधायक विक्रम सैनी और 11 अन्य लोगों को दोषी करार देते हुए कोर्ट ने दो-दो साल की कैद और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. सजा सुनाए जाने के कुछ देर बाद ही सभी को निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी गई और सभी लोग तत्काल रिहा कर दिए गए. इस मामले में अदालत ने अन्य 15 अभियुक्तों को बरी कर दिया. बीजेपी विधायक विक्रम सैनी समेत 27 लोगों के खिलाफ मुजफ्फरनगर दंगों की मुख्य वजह माने जाने वाले कवाल कांड मामले में मुकदमा दर्ज किया गया था.

विक्रम सैनी के वकील भरत सिंह अहलावत ने फैसले के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि वो इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे. इस बहुचर्चित मामले में सजा पाने वाले विक्रम सैनी पहले व्यक्ति हैं.

मुजफ्फरनगर दंगों के समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी

मुजफ्फरनगर दंगे का मामला

मामला 2013 का है जब मुजफ्फरनगर जिले के कवाल कस्बे में शाहनवाज, सचिन और गौरव नाम के तीन युवकों की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में छेड़खानी को लेकर पहले शाहनवाज की हत्या हुई और फिर शाहनवाज की हत्या के मुख्य अभियुक्त बताए जाने वाले सचिन और गौरव की हत्या कर दी गई. इसी हत्या के बाद मुजफ्फरनगर और आस-पास के इलाकों में सांप्रदायिक दंगे हुए थे जिनमें पचास से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था.

28 अगस्त 2013 को सचिन और गौरव की अंत्येष्टि से लौट रहे लोगों ने कवाल में मारपीट और तोड़ फोड़ की थी जिसके बाद वहां दोनों समुदाय के लोगों के बीच बहस हो गई थी. मौके पर पहुंची पुलिस ने 9 लोगों को गिरफ्तार किया था जबकि 15 लोग फरार हो गए. विक्रम सैनी भी कुछ हथियारों के साथ पकड़े गए थे और उसी वजह से उन्हें इस मामले में कोर्ट की ओर से राहत नहीं मिल सकी.

जानसठ पुलिस स्टेशन के तत्कालीन इंचार्ज शैलेंद्र कुमार ने बीजेपी नेता विक्रम सैनी समेत 27 लोगों पर गंभीर धाराओं में नामजद केस दर्ज किया था. वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि कवाल कांड में विक्रम सैनी के खिलाफ जब चार्ज शीट दायर की गई थी तभी लग रहा था कि इसमें सजा होनी तय है. चार्ज शीट तब दायर की गई थी जब राज्य में बीजेपी सरकार आ चुकी थी.

दंगों में शामिल होने के आरोप में विधायक विक्रम सैनी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत भी कार्रवाई हुई थी और वो कई महीने तक जेल में रहे थे.

बीजेपी की सरकार बनने के बाद भी विक्रम सैनी को राहत नहीं मिल सकी

सरकार की कार्रवाई से सहानुभूति

स्थानीय लोगों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान विक्रम सैनी पर हुई कार्रवाई की वजह से मिले सहानुभूति वोटों के चलते वो विधायक बने थे. विक्रम सैनी कवाल गांव के प्रधान रह चुके हैं. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें खतौली से टिकट दिया था और वो पहली बार विधायक चुने गए. साल 2022 में उन्हें दोबारा टिकट मिला और जीत गए लेकिन अब सजा मिलने के बाद उनकी सदस्यता चली जाएगी.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अली कमर जैदी कहते हैं कि किसी केस में दोषी सिद्ध हो गए हैं तो सजा कितनी भी मिले, अब सदस्यता जाएगी. जैदी के मुताबिक, "यदि ऊपर की अदालत से इनकी दोषसिद्धि पर स्टे हो गया तो इनकी सदस्यता पर असर नहीं पड़ेगा, यदि नहीं हुआ तो सदस्यता जाएगी."

जैदी इस संबंध में लिली थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहते हैं कि पहले यह संभव नहीं था लेकिन उस फैसले के बाद दोषसिद्ध होते ही सदस्यता जाने का प्रावधान हो गया है. दो साल की सजा पूरी करने के बाद भी अगले छह साल तक वो कोई चुनाव नहीं लड़ सकते हैं.

लिली थॉमस ने साल 2003 में जनप्रतिनिधित्व कानून 1952 के विरुद्ध एक याचिका दायर की थी जिसमें मांग की गई थी कि इसके सेक्शन 8 (4) को असंवैधानिक करार दिया जाए. इस इस सेक्शन में प्रावधान किया गया था कि दोषी करार दिए जाने के बाद भी कोई जनप्रतिनिधि अपने पद पर तब तक बने रह सकते हैं यदि वो तीन महीने के भीतर अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देते हैं और वहां से उन्हें स्टे मिल जाता है या मामला लंबित रहता है. लंबी सुनवाई के बाद 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी कोर्ट द्वारा अपराधी साबित होने के बाद तुरंत जनप्रतिनिधियों को पद से हटना होगा. यहां तक कि सजा काटने वाले जनप्रतिनिधि चुनाव लड़ने की योग्यता भी खो देते हैं.

पिछले साल यूपी के एक अन्य बीजेपी विधायक इंद्रप्रताप उर्फ खब्बू तिवारी की विधानसभा सदस्यता चली गई थी. उन्हें कोर्ट ने एक मामले में दोषी ठहराया था और सजा सुनाई थी.

दंगे से जुड़े सैकड़ों मामले वापस

यूपी की राजनीति में बड़ा परिवर्तन लाने वाले मुजफ्फरनगर दंगों में साल 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 77 मामले वापस ले लिए थे लेकिन कुछ मामलों में अदालत ने वापसी से इनकार कर दिया था. इन दंगों से जुड़े कुल 510 मामलों में से सिर्फ 164 में ही अंतिम रिपोर्ट पेश की गई. मामलों को वापस लेते समय सरकार ने कोई विशेष कारण नहीं बताया था.

साल 2019 में मुजफ्फरनगर की एक अदालत ने सचिन और गौरव की हत्या से संबंधित एक मामले में सात लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. मामलों की जांच के लिए गठित एसआईटी ने पिछले साल कहा था कि दंगों के दौरान हत्या, बलात्कार, डकैती एवं आगजनी से संबंधित 97 मामलों में एक हजार से भी ज्यादा लोग सबूतों के अभाव में बरी हो गए. एसआईटी 20 मामलों में आरोप-पत्र दायर कर नहीं सकी क्योंकि राज्य सरकार की ओर से उसे मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मिली.

Source: DW

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