अकेले पड़े उद्धव ठाकरे तो याद आया भाई राज

मुंबई। कहते हैं जब गैर साथ छोड़ देते हैं तो अपने याद आते हैं। वही शिवसेना के उद्धव ठाकरे के साथ होता दिख रहा है। पच्चीस सालों से चल रहा भाजपा शिवसेना गठबंधन टूटने के बाद उद्धव ठाकरे अपने आपको राजनीतिक मैदान पर अकेला महसूस कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि उद्धव ने राज को फोन करके हाल चाल जाना है।

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इसके बाद कहा जा सकता है कि उद्धव और राज साथ आ सकते हैं। क्योंकि विधानसभा चुनाव में अगर शिवसेना अच्छी खासी सीटों पर जीत दर्ज करती है और कुछ सीटों की कमी दूर करने के लिए वह महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के साथ हाथ मिला सकती है। क्योंकि भाजपा-शिवसेना और एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन टूटने के बाद महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का थोड़ वोट बैंक बनता हुआ दिख रहा है। इस वोट बैंक के जरिए शिवसेना महाराष्ट्र में सत्ता पर काबिज होने में इस्तेमाल कर सकती है।

आना होगा साथ

दरअसल,वर्तमान के दृश्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि ठाकरे परिवार को अपना खोया हुआ जनाधार थोड़ा-बहुत भी वापस बटौरना है तो इसके लिए पहली शर्त टूटकर बनी पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना व शिवसेना को एक साथ आना ही होगा। क्योंकि जब शिवसेना में टूट पड़ी तो ठाकरे परिवार की ओर से महाराष्ट्र में अपने दम पर सरकार बनाने की कोशिशों पर भी पानी फिर गया।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसकी मुख्य वजह शिवसेना में अंदरूनी फूट व वर्ष 2005-06 में उस फूट का महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के गठन के रूप में सामने आ जाना है। गौर करने वाली बात है कि यह दरार आज भी जस की तस है और शिवसेना को आज भी भाजपा के सहारे की जरूरत है। वर्तमान में महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना के पास 4 सीटें हैं। शिवसेना की खुद की गलतियों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1995 में शिवसेना के पास खुद के दम बहुमत न सही लेकिन 73 सीटें आईं थीं और अब केवल 4 सीटें हैं।

शिवसेना की गलतियां

वर्ष 1995 में मिले जनाधार का महत्व शिवसेना कभी समझ ही नहीं पाई। दरअसल, इसका महत्व समझना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि विश्वास न करने लायाक 73 सीटें मिलना शिवसेना के लिए एक सुनहेरा मौका ही था। जो अवसर शिवसेना ने गंवाकर शायद ऐतिहासिक गलती कर दी। वर्ष 1995 से पहले 1970, 1984, 1992, 1993 में हुए दंगों के बाद एक आम तबका बहुत बुरी तरह डर गया था। इन दंगों में मुस्लिम व हिंदू दोनों समुदाय के लोग मारे गए थे। बिडम्बना तो देखिए कि इतना सब कुछ होने के बाद एक आम तबके ने विकल्प न होने की स्थिति में भी शिवसेना पर विश्वास किया था जिसमें मराठा समुदाय भी शामिल था। लेकिन शिवसेना अपने अंदरूनी कलह में इतनी उलझी रही कि उसकी राजनीतिक जमीन कब खिसक गई पता ही नहीं चला।

भाई से दूरी का काऱण

वर्ष 2005-06 में कुछ अंदरूनी कलह की वजह से पार्टी नेता नारायाण राणें को पार्टी से निकाला गया तो पार्टी के एक तबके में पनप रही फ्रस्ट्रेशन यानि झुंजलाहट निकलकर बाहर आ गई। कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस झुंजलाहट की चपेट में बालठाकरे के भतीजे राज ठाकरे भी आ गए और अपरिपक्वता का परिचय देते हुए अलग पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के रूप में गठित करने का निर्णय ले लिया। जिसके बाद शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे व महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे के बीच में तनातनी ऐसी ही बनी हुई है।

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