मुंडे होते तो आज एक होती शिवसेना-भाजपा

मुंबई। महाराष्ट्र चुनावी रण के धुरंधर किंगमेकर गोपीनाथ मुंडे की मृत्यु के बाद भाजपा को इतना बड़ा झटका लग चुका है कि उस झटके का अहसास उसे चुनावी नतीजों से हो सकता है। क्योंकि गोपीनाथ मुंडे के मृत्यु के बाद से भाजपा से साथ पच्चीस वर्षों से दोस्ती बनाए रख रहे शिवसेना संगठन की आवाज मुखर हो गई है। जिससे मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है।

gopinath-munde

गोपीनाथ मुंडे के चेहरे के रूप में भाजपा के पास एक ऐसा नेता था जिसके बल पर भाजपा की जीत पक्की लग रही थी। शरद पवार के मुख्यमंत्री रहते हुए गोपीनाथ मुंडे ने कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। इसके लिए मुंडे को समर्थन मिला था। इसका ही परिणाम कहा जा सकता है कि वर्ष 1995 में भाजपा-शिवसेना दोनो मिलकर महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज हो सके थे।

मुंडे ने कई बार भाजपा-शिवसेना के बीच एक पुल का काम किया था। जिसके कारण शिवसेना-भाजपा गठबंधन इतने सालों तक बना रहा। लेकिन मुंडे के मृत्यु होने के बाद शिवसेना की दबी आवाज मुखर हो गई और इतने सालों तक का गठबंधन टूट गया।

इन पंद्रह सालों के दौरान कांग्रेस-एनसीपी ने महाराष्ट्र पर कब्जा जमाए रखा। काफी कोशिशों के बाद जब भाजपा महाराष्ट्र में सरकार बनाने में हर मोर्चे पर असफल साबित हो रही है। तो लोकसभा चुनाव के बाद बने माहौल को भुनाते हुए गोपीनाथ मुंडे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना तय माना जा रहा था। लेकिन अब तो पूरा का पूरा भाजपाई समीकरण ही बिगड़ सा गया है। गठबंधन टूटा है, भाजपा के पास मुख्यमंत्री के पद के लिए महाराष्ट्र का चहेता चेहरा नहीं है।

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