ढूँढ़-ढूँढ़कर जेल भेजे जाएं हाजी याकूब कुरेशी जैसे
नई दिल्ली/मेरठ। (विवेक शुक्ला) उत्तर प्रदेश विधान सभा के पूर्व विधायक हाजी याकूब कुरैशी की गिरफ़्तारी जितनी जल्दी हो उतना अच्छा है। वे मेरठ से हैं। वे बसपा की टिकट पर विधायक रहे हैं। उनके जैसे इंसान की जगह जेल के अंदर है, बाहर नहीं। इस तरह के बहुत से लोग हैं जिन्हें समाज में खुला नहीं घूमना चाहिए। इन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर अंदर करना चाहिए। वैसे इन्हें ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि ये आसपास ही हैं और सर्वविदित भी।

वरिष्ठ लेखक मुकेश कुमार कहते हैं कि ये लोग घृणा और हिंसा फैलाते हैं। उनके पास इसके लिए बहाने भी हजा़र हैं। फिल्म, किताब, कार्टून, मंदिर, धर्मांतरण, लव जिहाद, गोरक्षा, क्रिकेट में हार-जीत आदि आदि।
शासकों में कहां साहस
उन्हें लड़ने-लड़ाने की आदत हैं और इसी तरह वे अपने वर्चस्व, सत्ता को कायम रखने के उपाय करते हैं। लेकिन मूल प्रश्न ये है कि क्या ऐसा होगा। क्या छल-छद्म से चुने गए शासकों में इतना साहस है कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का जोखिम उठाएं।
जीरो टालरेंस दिखाएं
असली समस्या इन्हीं सवालों पर आकर टिक जाती है। सबको अपनी आस्था पवित्र और आवश्यक लगती है। वे उसका फैसला न अदालत के ज़रिए करना चाहते हैं न वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर। वे चाहते हैं कि उनके "सत्य" को सब स्वीकार कर लें बस। इनसे निपटने का एक ही तरीका है और वह यही कि शासन और न्याय व्यवस्था ऐसे मुद्दों पर ज़ीरो टालरेंस दिखाएं। लोकतंत्र संविधान से चलता है और न्याय व्यवस्था कानून से। इन्हें सिरफिरे लोगों की आस्थाओं पर छो़ड़कर वृहत्तर समाज के भविष्य को ख़तरे में नहीं डाला जा सकता।ये लोग चाहे किसी भी समुदायों के हों इनको अपराधियों के रूप में देखा जाना चाहिए और आईपीसी तथा सीआरपीसी के तहत इनसे निपटा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है।
पुलिस, प्रशासन, न्याय व्यवस्था और सरकार के स्तर पर भेदभाव होते हैं और इनके आँकड़े मौजूद हैं। इसलिए इनसे आँखें मूँदकर ये कहना कि बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के पहलू को नज़रअंदाज़ कर दिया जाना चाहिए, व्यावहारिक नहीं लगता।












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