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"स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए, क्योंकि", अब त्रिभाषा विवाद में सीएम फडणवीस की पत्‍नी अमृता की हुई एंट्री

Hindi Language row: महाराष्‍ट्र के स्‍कूलों में कक्षा 5 तक हिंदी पढ़ाए जाने का आदेश विपक्षी पार्टियों के विरोध के बाद फडणवीस सरकार ने वापस ले लिया है और सरकार अपनी भाषा नीति पर पुनर्विचार कर रही है। इसके बावजूद इस मुद्दें को लेकर फडणवीस सरकार विपक्षी पार्टियों के निशाने पर है। वहीं त्रिभाषा विवाद में मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्‍नी अमृता फडणवीस की एंट्री हो चुकी है।

फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस ने ऐसा बयान दिया है जिससे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है। अमृता फडणवीस ने कहा कि स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए, क्योंकि यह देश भर के लोगों के साथ जुड़ने में मदद करती है।

Hindi Language row

अमृता फडणवीस ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "मराठी महाराष्ट्र के लिए नंबर एक भाषा है, इसमें कोई शक नहीं है। वैश्विक स्तर पर संवाद करने के लिए अंग्रेजी उपयोगी है। लेकिन उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक देश भर के लोगों के साथ जुड़ने के लिए, मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि हिंदी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।"

अमृता फडणवीस ने कहा कि छात्रों को उपलब्ध भाषा विकल्पों में से चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा, "यह समावेशिता को बढ़ावा देने में मदद करेगा। छात्रों को सीखने के विकल्प मिलने चाहिए और वे अपनी पसंद के अनुसार भाषा का चयन कर सकते हैं।"

अमृता फडणवीस का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने एक सरकारी संकल्प (जीआर) वापस ले लिया है जिसमें कक्षा 1 से 5 तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पेश किया गया था। ज्ञात हो कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में उनके इस बयान से विवाद खड़ा होने की आशंका है।

सरकार को लेना पड़ा फैसला वापस

फडणवीस सरकार ने शुरू में अप्रैल में घोषणा की थी कि कक्षा 1 से हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पेश किया जाएगा, जिससे विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना की थी। विपक्ष ने भाजपा पर मराठी की कीमत पर हिंदी को थोपने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। इसके बाद सरकार ने कहा कि उसने इस फैसले को रोक दिया है, लेकिन एक नए जीआर में स्पष्ट किया गया कि हिंदी को अभी भी वैकल्पिक तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकता है। इस कदम से और भी कड़ी प्रतिक्रिया हुई, और विपक्षी दलों और मराठी अभ्यास केंद्र जैसे समूहों ने सरकार पर दबाव डाला, जिससे उसे दोनों जीआर वापस लेने और नीति की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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