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MP News: पिंजरे से निकलते ही तेज रफ्तार से भागे चीतें, गांधी सागर अभयारण्य में चीतों का नया सफर शुरू

MP News: रविवार की शाम जैसे ही गांधी सागर अभयारण्य के बाड़े का फाटक खुला, वहां मौजूद हर आंख चौंक गई - पिंजरे से निकला एक चीता, जिसने कुछ ही पल में ज़मीन नाप डाली।

फिर निकला उसका भाई - थोड़ा हिचकिचाता, लेकिन जैसे ही उसने धरती को महसूस किया, दौड़ने लगा पूरे जोश से। ये थे 'पावक' और 'प्रभास', दो अफ्रीकी चीते, जो अब गांधी सागर के नए राजा बनने जा रहे हैं।

MP News Cheetahs ran at high speed as soon as they came out of the cage Gandhi Sagar Sanctuary

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खुद इन दोनों चीतों को उनके नए घर में छोड़ा - एक ऐसा पल जो भारत में वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में दर्ज हो गया।

चीतों का सफर, अफ्रीका से कूनो, और अब गांधी सागर

पावक और प्रभास सगे भाई हैं, और 2023 में दक्षिण अफ्रीका के वाटरबर्ग बायोस्फीयर रिजर्व से लाए गए थे। कूनो नेशनल पार्क में इन दोनों ने लगभग दो साल गुज़ारे, वहां के जंगलों में दौड़े, शिकारी बने, और अब जब वे पूरी तरह अनुकूल हो चुके हैं, तो उन्हें एक नई ज़िम्मेदारी दी गई है - गांधी सागर अभयारण्य में बसी नई पीढ़ी के लिए रास्ता बनाना।

यह स्थानांतरण एक ऐतिहासिक उपलब्धि है - भारत में पहली बार किसी संरक्षित क्षेत्र से दूसरे संरक्षित क्षेत्र में चीतों का स्थानांतरण हुआ है। 250-300 किमी का यह सफर तय करने से पहले दोनों चीतों की मेडिकल जांच, मॉनिटरिंग, और सुरक्षित ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था की गई थी। यह सब हुआ गहन विशेषज्ञता और सावधानी के साथ।

MP News: 'दरवाज़ा खुलते ही इतिहास दौड़ पड़ा'

गांधी सागर के खिमला क्षेत्र में बनाए गए विशेष बाड़े में चीतों को छोड़ने का दृश्य बिल्कुल फिल्मी था। जब सीएम डॉ. मोहन यादव ने पहला पिंजरा खोला, तो प्रभास झट से बाहर निकला और सीधा दौड़ लगा दी। वो कुछ दूरी पर रुका, और फिर मुड़ा - जैसे अपने नए घर को देख रहा हो।

पावक थोड़े शांत थे, शायद नया माहौल परख रहे थे। उन्हें पिंजरे से बाहर आने में थोड़ी देर लगी, लेकिन बाहर आते ही जैसे जंगली आत्मा जाग गई - वो भी दौड़ पड़े। और फिर दोनों भाई बाड़े में साथ-साथ घूमते नज़र आए, मानो ये उनकी ज़मीन हो - जो अब है भी।

MP News: गांधी सागर: 'मसाई मारा' जैसा भारतीय जंगल

368 वर्ग किलोमीटर में फैले गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य को भारत का 'मिनी सवाना' कहा जाए तो गलत नहीं होगा। चंबल नदी, खुले घास के मैदान, चट्टानी इलाके और उथली मिट्टी - ये सब उस सवाना इकोसिस्टम का हिस्सा हैं जिसमें चीते फलते-फूलते हैं।

यहां 64 वर्ग किलोमीटर का विशेष बाड़ा तैयार किया गया है। बाड़ सौर ऊर्जा से चालित है, और अंदर चीतों के लिए पर्याप्त शिकार जैसे चीतल, नीलगाय, चिंकारा और खरगोश छोड़े गए हैं। इस आदर्श आवास को तैयार करने के लिए प्रशासन ने 17 तेंदुओं को स्थानांतरित किया, हालांकि इसमें से तीन की मौत विवाद का कारण भी बनी।

सीएम बोले: ''भारत का वन्यजीव भविष्य अब दौड़ रहा है''

चीतों को छोड़ते समय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भावुक दिखाई दिए। उन्होंने कहा: "यह सिर्फ दो चीतों को बाड़े में छोड़ना नहीं था, यह भारत के वन्यजीव भविष्य को रफ्तार देना था। पावक और प्रभास अब गांधी सागर के ब्रांड एम्बेसडर हैं।" सीएम ने बताया कि मई 2025 में बोत्सवाना से चार और चीते भारत लाए जाएंगे और गांधी सागर में बसाए जाएंगे। यह चीता परियोजना का दूसरा चरण है, जिसकी शुरुआत अब औपचारिक रूप से हो चुकी है।

प्रोजेक्ट चीता: नामीबिया से अब गांधी सागर तक

  • सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था।
  • 2023 में 12 और चीते दक्षिण अफ्रीका से आए।
  • अब कूनो में 26 चीते हैं (14 भारत में जन्मे शावकों सहित) और गांधी सागर में शुरू हुआ है उनका नया अध्याय।

पर्यटन, रोजगार और स्थानीय जुड़ाव

मंदसौर और नीमच जिले अब केवल खेत और संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि वन्यजीव पर्यटन के लिए भी जाने जाएंगे। जिला कलेक्टर अदिति गर्ग ने बताया कि चीतों की मौजूदगी से इस क्षेत्र में पर्यटन और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।चतुर्भुज नाला, हिंगलाज माता मंदिर जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल पहले से ही आकर्षण का केंद्र हैं - अब गांधी सागर अभयारण्य में चीते देखने का रोमांच भी जुड़ गया है।

विवाद और चुनौतियां

तेंदुओं के स्थानांतरण में हुई 3 मौतों को लेकर सवाल उठे हैं। बोत्सवाना से चीतों को लाने के प्रोटोकॉल पर भी वन्यजीव कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई है, और यह मामला कोर्ट तक जा सकता है। फिर भी, विशेषज्ञ मानते हैं कि वन्यजीव संरक्षण में ऐसे जोखिम उठाना जरूरी है। दक्षिण अफ्रीकी विशेषज्ञों की मदद से परियोजना को वैश्विक मानकों पर लागू किया जा रहा है।

आगे क्या?

गांधी सागर अभयारण्य को 2000 वर्ग किलोमीटर तक विस्तारित करने की योजना है। राजस्थान का भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य भी भविष्य में इससे जोड़ा जाएगा। चंबल क्षेत्र और गुजरात के बन्नी घास के मैदान को भी चीतों के लिए उपयुक्त समझा जा रहा है।

चीतों की दौड़, भारत की उम्मीद

जैसे ही पावक और प्रभास ने दौड़ लगाई, वह केवल चीतों की रफ्तार नहीं थी - वह एक देश की उम्मीद थी, जो अपने खोए हुए गौरव को वापस लाने की ओर दौड़ रही है।

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