MP News: क्या मध्य प्रदेश से होगा देश का अगला उपराष्ट्रपति, ये नाम सबसे आगे, जानिए क्यों मिल सकता है मौका

MP Vice President News: भारत के अगले उपराष्ट्रपति के लिए चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद इस पद के लिए कई नाम सामने आ रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता और वर्तमान में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत का नाम सबसे आगे चल रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के इस वरिष्ठ नेता का नाम उपराष्ट्रपति की रेस में गंभीरतापूर्वक लिया जा रहा है। आइए, इस खबर के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से नजर डालते हैं।

India s next Vice President will be from MP Thaawarchand Gehlot name is at forefront

थावरचंद गहलोत: एक मजबूत दावेदार

थावरचंद गहलोत, जो वर्तमान में कर्नाटक के 13वें राज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं, मध्य प्रदेश के एक प्रमुख दलित नेता हैं। उनका जन्म 18 मई 1948 को उज्जैन जिले के नगदा तहसील के रूपेटा गांव में एक दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से कला स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की और डॉ. बी.आर. आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

गहलोत का राजनीतिक सफर लंबा और प्रभावशाली रहा है। वे 1996 से 2009 तक मध्य प्रदेश के शाजापुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और 2012 से 2021 तक मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे। 2014 से 2021 तक वे नरेंद्र मोदी सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थे और राज्यसभा में सदन के नेता के रूप में भी अपनी भूमिका निभा चुके हैं।

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क्यों है गहलोत का नाम चर्चा में?

दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व: गहलोत बीजेपी के सबसे प्रमुख दलित चेहरों में से एक हैं। वे मध्य प्रदेश में बीजेपी की अनुसूचित जाति (एससी) मोर्चा के प्रभारी रह चुके हैं और दलित समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए काम करने का उनका लंबा इतिहास है। उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद के लिए दलित नेता का चयन बीजेपी की दलित समुदाय के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत कर सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी से निकटता: गहलोत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। उनकी नियुक्ति को 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मतदाताओं के बीच एक मजबूत राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

लंबा राजनीतिक अनुभव: गहलोत का संसदीय और प्रशासनिक अनुभव उन्हें इस पद के लिए एक उपयुक्त उम्मीदवार बनाता है। वे बीजेपी के केंद्रीय चुनाव समिति और संसदीय बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। इसके अलावा, उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा में 1980, 1990 और 1993 में अलोट सीट से जीत हासिल की थी और 1990-92 में सुंदरलाल पटवा सरकार में मंत्री भी रहे।

कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में कार्य: गहलोत 11 जुलाई 2021 से कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में सेवा दे रहे हैं। इस दौरान उन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में संतुलन और परिपक्वता का परिचय दिया है।

उपराष्ट्रपति पद की रेस में अन्य नाम

हालांकि गहलोत का नाम सबसे आगे है, लेकिन बीजेपी के अन्य नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। इनमें शामिल हैं:

  • ओम माथुर: संगठनात्मक रूप से मजबूत और बीजेपी के वरिष्ठ नेता।
  • आरिफ मोहम्मद खान: मुस्लिम चेहरा और केरल के राज्यपाल।
  • हरिवंश: राज्यसभा के उपसभापति।
  • रमा देवी: बिहार की वरिष्ठ बीजेपी नेता।
  • रामनाथ ठाकुर: जनता दल (यूनाइटेड) के नेता।

बीजेपी के पास संसद में बहुमत है, लेकिन वह जातीय और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवार चुनने की रणनीति अपना रही है। दलित या मुस्लिम उम्मीदवार का चयन सामाजिक समावेश और व्यापक स्वीकार्यता को बढ़ावा दे सकता है।

गहलोत की उम्मीदवारी को बीजेपी की दलित और ओबीसी मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में राम नाथ कोविंद, जो एक दलित नेता थे, को राष्ट्रपति बनाया गया था। गहलोत की नियुक्ति इस दिशा में एक और कदम हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गहलोत जैसे अनुभवी और स्वच्छ छवि वाले नेता की उम्मीदवारी को विपक्षी दलों का भी समर्थन मिल सकता है, क्योंकि दलित उम्मीदवार का विरोध करना उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।

चुनौतियां और संभावनाएं

उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है, और इसकी जिम्मेदारियों में राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना और राष्ट्रीय स्तर पर संतुलित दृष्टिकोण रखना शामिल है। गहलोत का लंबा संसदीय अनुभव और संवैधानिक पद पर काम करने का रिकॉर्ड उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाता है। हालांकि, बीजेपी को जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना होगा।

कर्नाटक में उनके कार्यकाल के दौरान कुछ विवाद, जैसे कि म्युस्का घोटाले में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देना, चर्चा में रहे हैं। फिर भी, गहलोत ने हमेशा संवैधानिक सीमाओं के भीतर काम करने की प्रतिबद्धता दिखाई है।

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