यूपी की राजनीति में शीला दीक्षित सफर, क्या कांग्रेस लगायेगी दांव
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस औऱ भारतीय जनता पार्टी अपने सीएम उम्मीदवार के नाम को लेकर मंथन कर रही हैं। दोनों ही दलों में किस चेहरे को आगे किया जाए इस पर बहस चल रही है। भारतीय जनता पार्टी में जहां राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह और स्मृति ईरानी के नाम पर चर्चा हो रही है तो कांग्रेस के भीतर प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित जैसे चेहरों पर चर्चा हो रही है।
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शीला दीक्षित को यूपी की कमान सौंपने पर जहां पार्टी में सुगबुगाहट हो रही थी तो इसकी घोषणा से पहले ही पार्टी के भीतर एक तबका इसका विरोध भी करने लगा है। यूपी कांग्रेस के कई नेताओं ने शीला दीक्षित के नाम पर आपत्ति जतायी है। शीला दीक्षित दिल्ली की राजनीति में आने से पहले यूपी में अपना दांव आजमा चुकी हैं। वर्ष 1989 के बाद यूपी में तीन लोकसभा चुनाव शील दीक्षित हार चुकी हैं।
जिसके बाद 1998 में उन्हें दिल्ली की राजनीति में मौका दिया गया जहां उन्होंने लंबी और सफल पारी खेली। सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने यूपी में शीला दीक्षित के नाम को आगे करने की सिफारिश की थी। शीला के समर्थकों का मानना है कि वह ब्राम्हण वोटों को अपनी ओर खींच सकती हैं।
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यूपी की राजनीति में शीला दीक्षित 1994 में पहली बार कन्नौज की सीट से चुनाव लड़ा और वह यह चुनाव जीत गयी। लेकिन यह चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए थे जिसमें कांग्रेस को सहानुभूति वोट मिले थे। लेकिन इस लहर के बाद तीन बार शीला लगातार चुनाव हारी। शीला राजीव गांधी सरकार में पीएमओ में राज्यमंत्री भी रह चुकी है और आखिरी बार उन्होंने 1996 में यूपी में चुनाव लड़ा था।












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