पिता चलाते हैं जनरल स्टोर, बेटी ने किया UP बोर्ड में टॉप, IAS बन देश सेवा का संकल्प
यूपी बोर्ड की 12वीं कक्षा में अपने पूरे परिवार का नाम रोशन करने वाली ज्योति राठौर के आंखों में भविष्य को लेकर देश के लिए काफी सपने हैं। ज्योति सिविल सेवा के जरिए देश में फैली गरीबी और भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करना चाहती है और देश को नयी बुलंदियों पर पहुंचाना चाहती हैं।
कंप्यूटर और केमेस्ट्री में 99 अंक
ज्योति ने बोर्ड की परीक्षा में कुल 500 में से 486 अंक प्राप्त किये। हिंदी में ज्योति को 94, गणित में 96, कंप्यूटर में 99, भौतिक विज्ञान में 98 जबकि रसायन विज्ञान में उन्हें 99 अंक प्राप्त हुए हैं। ज्योति ऑनर्स के साथ सभी विषयों में डिक्टिंशन से 12वीं की परीक्षा को उत्तीर्ण करने में सफल रही हैं।
परिवार और स्कूल के शिक्षकों से हासिल किया मुकाम
ज्योति लखनऊ के एलपीएस कॉलेज में पढ़ती थी और उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 97.2 फीसदी अंक प्राप्त करके यूपी बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया है। ज्योति ने वनइंडिया से बात करते हुए बताया कि उन्होंने हर वक्त अपनी पढ़ाई को लेकर काफी संजीदगी दिखायी और उन्हें उनके परिवार और स्कूल के शिक्षकों का पूरा साथ मिला जिसके चलते वह इतने बड़े मुकाम को हासिल कर सकी है।
पिता चलाते हैं किराने की दुकान मां हैं गृहणी
ज्योति के पिता विशाल राठौर पेशे से एक बिजनेसमैन है और घर में ही एक किराने की दुकान चलाते हैं और उनकी मां एक गृहणी हैं। ज्योति का कहना है कि पहले परिवार वाले उन्हें शहर से बाहर जाने की इजाजत नहीं देते थे पढ़ाई के लिए। लेकिन मेरी इस उपलब्धि के बाद परिवार वाले मुझे पढ़ने के लिए बाहर भी भेजने को तैयार हैं।
बीटेक करके करूंगी सिविल सेवा की तैयारी
ज्योति इंटर के बाद कंप्यूटर साइंस से बीटेक करना चाहती है। ज्योति कहती हैं कि इसके लिए मेरे घर वाले मुझे राजस्थान के कोटा शहर में कोचिंग के लिए भी भेजने को तैयार हैं। ज्योति अपनी उपलब्धि से काफी उत्साहित हैं और अपने हर सपने को जी जान लगाकर सच करना चाहती हैं।
लखनऊ में भी चाहती हैं बदलाव ज्योति
वहीं लखनऊ के पारा इलाके में रहने वाली ज्योति का कहना है कि लखनऊ में रहने के बावजूद भी इस इलाके में विकास की रफ्तार काफी कम है। मुख्य शहसे से महज कुछ किलोमीटर दूर होने के बाद भी यहां कई संसाधनों की कमी है। सड़क, यातायात, जाम जैसी समस्याओं से हमें यहां अक्सर दो-चार होना पड़ता है।













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