Kurmi Protest: झारखंड और बंगाल के 'कुर्मी' क्यों बनना चाहते हैं आदिवासी? आंदोलन किया और तेज

Kurmi Andolan: दक्षिण पूर्व रेलवे के महत्वपूर्ण खड़गपुर-टाटानगर और आद्रा-चांडिल खंडों में तीन दिनों से जारी विभिन्न कुर्मी संगठनों के आंदोलन के कारण शुक्रवार को कम से कम 64 एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें रद्द कर दी गईं।

Kurmi Protest

Kurmi Protest News: झारखंड और पश्चिम बंगाल में एक बार फिर से कुर्मी जाति का आंदोलन तेज हो गया है। पिछले तीन दिनों से दोनों राज्यों में 100 से ज्यादा ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हो चुकी है। कुर्मी समाज के लोग ट्रेन की पटरी पर जमा हो गए हैं और हावड़ा से दिल्ली जाने वाली कई ट्रेनों की आवाजाही रोक दी है। चलिए आज हम आपको बताते हैं आखिर कुर्मी समाज ने आंदोलन तेज क्यों कर दिया है? आखिर इनकी मांग क्या है?

जानें कुर्मी समाज की क्या मांग है?
Kurmi Protest: बता दें कि सभी कुर्मी जाति OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आती है। ये यूपी और बिहार के कुर्मी समुदाय से अलग होते हैं और इन लोगों को कुड़मी कहा जाता है। कुर्मी(Kurmi) समुदाय के ज्यादातर लोग झारखंड के छोटा नागपुर पठार के रहने वाले हैं जहां आदिवासियों की संख्या बहुत अधिक है। इन आदिवासियों को आरक्षण का जबरदस्त लाभ मिल रहा है। लेकिन उनके साथ ही रहने वाले कुर्मी समाज इससे वंचित हैं तो ऐसे में ये सभी बार-बार आंदोलन कर रहे हैं। इन सभी की मांग है कि इन्हें दोबारा अनुसूचित जनजाति (ST) की लिस्ट में शामिल किया जाए।

ब्रिटिश राज में ST की सूची में शामिल होने का दावा
दरअसल, इस कुर्मी (Kurmi) समाज के प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ब्रिटिश राज में 1931 की अनुसूचित जनजाति की लिस्ट में ये सभी लोग शामिल थे। 1950 तक कुर्मी ST के तौर पर ही जाने जाते थे। लेकिन 1950 में आई लिस्ट में इन्हें ST से निकालकर OBC में शामिल किया गया। साथ ही आंदोलनकारी कुर्माली भाषा को संविधान के 8वें शेड्यूल में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं। इसी बात को लेकर ये मांग और आंदोलन तेज होता रहता है कि इन्हें दोबारा ST लिस्ट में शामिल किया जाए।

पिछले साल ओडिशा के सीएम ने इस मामले पर केंद्र को लिखा था पत्र
पिछले साल ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा को पत्र लिखकर 160 समुदायों को एसटी सूची में शामिल करने की मांग की थी। पटनायक ने पत्र में दावा किया था कि 1978 से ओडिशा सरकार ने राज्य के इन समुदायों को एसटी सूची में शामिल करने की सिफारिश की है लेकिन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया गया है।

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