Jharkhand Chunav: बीजेपी के लिए कितने काम के साबित हुए Champai Soren?
Jharkhand Chunav 2024: जेएमएम और उसके नेता हेमंत सोरेन से मोहभंग होने के बाद जब झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर चेहरे और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन बीजेपी में शामिल हुए तो यही लगा कि पार्टी उनके माध्यम से कोल्हान बेल्ट में खुद को लड़ाई में लाना चाहती है। लेकिन, भाजपा ने जिस तरह से चंपाई को झारखंड के मतदाताओं के बीच पेश किया है, उससे लगता है कि पार्टी की रणनीति उससे कहीं बड़ी है और वह इसमें फिलहाल सफल भी हुई है।
चंपाई सोरेन सरायकेला में इस बार भाजपा के उम्मीदवार हैं, जहां पर वह 1991 से चुनाव जीत रहे हैं। इस बार अंतर ये है कि वह जेएमएम और उसकी साथी कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल, चंपाई को लाकर भाजपा ने सिर्फ उनकी सरायकेला सीट पर जीत सुनिश्चित करने का दांव नहीं चला है, बल्कि उसका लक्ष्य इससे भी कहीं बड़ा है।

जेएमएम से चंपाई की अप्रिय विदाई को मुद्दा बनाने में सफलता
जेएमएम से निकलने की घटना को चंपाई खुद का अपमान बताते रहे हैं और भाजपा उनके इस दावे को विशेष रूप से आदिवासी मतदाताओं तक पहुंचाने में कामयाब नजर आई है।
वनइंडिया ने अनौपचारिक बातचीत में पिछले दिनों जितने भी आदिवासी वोटरों से बात की है, वह सब जेएमएम और हेमंत सोरेन से नाराज तो नहीं दिखे, लेकिन चंपाई के पार्टी से निकलने की घटना को भी वे हजम नहीं कर पाए हैं।
चंपाई के जरिए चैंपियन बनेगी बीजेपी?
उन्हें लगता है कि चंपाई के साथ उनकी पुरानी पार्टी ने कहीं न कहीं अन्याय किया है। आदिवासी समाज में चंपाई के प्रति यही सहानुभूति इस चुनाव में बीजेपी के लिए एक्स फैक्टर साबित हो सकता है।
चंपाई को भाजपा में लाने का पार्टी का एक मकसद यह भी रहा है कि वह न सिर्फ झारखंड की राजनीति को समझते हैं, बल्कि जेएमएम के अंदरूनी गुणा गणित को भी दशकों से जानते और उसे संभालते रहे हैं।
बीजेपी के लिए चुनाव अभियान में काफी कारगर साबित हुए चंपाई!
वह तब से जेएमएम को जानते हैं, जब हेमंत राजनीति में सक्रिय थे भी नहीं। हेमंत सोरेन ने भाजपा के खिलाफ एक नैरेटिव मूल निवासी बनाम बाहरी भी बनाने की कोशिश की है। चंपाई इसकी धार को कुंद करने में पूरे अभियान के दौरान बीजेपी के काम आए हैं।
बीजेपी के बांग्लादेशी घुसपैठ वाले मुद्दे को मिली धार
बीजेपी ने इस बार झारखंड विधानसभा चुनाव की शुरुआत से कुछ महीने पहले से जिस तरह से बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उछाला है, उसे भी चंपाई की वजह से ज्यादा धार मिली है।
अगर वह कह रहे हैं कि ये विदेशी घुसपैठिए आदिवासियों की पहचान के लिए खतरा बन चुके हैं और इलाके की जनसांख्यिकी बदल चुकी है तो पार्टी के इस एजेंडे की अहमियत और भी बढ़ गई है।
चुनाव प्रचार के दौरान वे बांग्लादेशी घुसपैठियों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी बातचीत का लगातार हवाला देते रहे हैं। उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा,'मैंने उन्हें झारखंड के हालात और संथाल परगना इलाके में जहां बांग्लादेशी घुसपैठ बहुत ज्यादा बढ़ गई है, उसके बारे में बताया है। गांव वालों के घर हटाए जा रहे हैं और घुसपैठियों को बसाया जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा की मौजूदा सरकार घुसपैठियों को रोकने के लिए कुछ नहीं करेगी और लोग यह जानते हैं।'
उन्होंने बताया कि 'मैंने प्रधानमंत्री को झारखंड के इतिहास और इसके भूगोल के बारे में सूचना दी और बताया कि हमें कुछ करने की जरूरत है, नहीं तो यहां से आदिवासी खत्म हो जाएंगे।'
कांग्रेस के खिलाफ भी बीजेपी को मिला हथियार!
बीजेपी के लिए चंपाई की जरूरत अब सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। उन्होंने उनकी वजह से कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भी घेरने की ओर कारगर कदम बढ़ाया है।
चंपाई बताते हैं कि कांग्रेस के शासन काल में किस तरह से आदिवासियों की उपेक्षा हुई और किस तरह से झारखंड के निर्माण में रुकावटें डाली गईं और झारखंड आंदोलनकारियों पर बुलेट बरसाए गए। इससे इंडिया ब्लॉक की चुनौती बढ़ती दिखी है।
क्या भाजपा के नैरेटिव को नतीजों में बदल पाएंगे चंपाई?
झारखंड मुक्ति मोर्चा खुद को प्रदेश के 'मूल निवासियों' के हितों के लिए काम करने वाली पार्टी कहती है और कांग्रेस देश भर में आदिवासियों और दलितों को 'न्याय' दिलाने के दावे करती है। बीजेपी ने एक चंपाई सोरेन की सहायता से इन दोनों के सियासी अभियानों पर ब्रेक लगाने की कोशिश की है।
राज्य की 81 में से 43 पर पहले चरण में 13 नवंबर को और अंतिम चरण में 20 नवंबर को बाकी सीटों पर चुनाव हैं। इनमें 68 पर बीजेपी और बाकी 13 सीटों पर उसके सहयोगी चुनाव लड़ रहे हैं।
चंपाई सोरेन फैक्टर ने इस चुनाव में भाजपा को बड़ा चुनावी हथियार निश्चित तौर पर थमाया है,लेकिन उससे वह किस हद तक चुनावी फसल काट पाती है,इसका अंदाजा 23 नवंबर को वोटों की गिनती के बाद ही लग सकता है।
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