Jammu Kashmir result 2024: नतीजों से पहले आतंकवाद और अलगाववाद को हराकर कैसे कश्मीर में जीत गया लोकतंत्र

Jammu Kashmir result 2024: जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजे 8 अक्टूबर को आएंगे। लेकिन, उससे पहले ही वहां के मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है। उन्होंने इस चुनाव में जिस उत्साह के साथ भाग लिया है और जितना शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न करवाया है, उसकी वजह से जम्हूरियत जीत गई है और आतंकवाद और अलगाववाद की लंका घाटी में ही जलकर खाक कर दी गई है।

चुनाव आयोग ने कहा है कि तीन चरणों के मतदान में कहीं भी कोई कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं हुई है। यह उस जम्मू और कश्मीर की तस्वीर है, जहां 2014 के विधानसभा चुनावों में 170 ऐसी घटनाएं दर्ज की गई थीं। 87 वारदातें तो सिर्फ चुनाव के दौरान ही हुई थीं।

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कश्मीर में अप्रत्याशित रूप से शांतिपूर्ण रहा चुनाव
वह वो दौर था जब ना तो प्रत्याशी प्रचार के लिए निकल पाते थे और ना ही मतदान बहिष्कार के आह्वानों की वजह से कई इलाकों में ज्यादातर वोटर मतदान केंद्र तक भी पहुंच पाते थे। आज तो यह स्थिति है कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव कार्य देश के कई राज्यों में भी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा हमारे सामने है।

एक भी बूथ पर पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी
ना तो वहां चुनाव से पहले किसी राजनीतिक कार्यकर्ता को हिरासत में लेने की जरूरत पड़ी है और न ही किसी खतरे की आशंका की वजह से अंतिम वक्त में मतदान केंद्र बदला गया है। 2014 के विधानसभा चुनावों में यहां 98 मतदान केंद्रों को कानून और व्यवस्था कायम रखने के लिए अंतिम वक्त में दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा था। यह चुनाव ऐसा हुआ है कि एक भी बूथ पर पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी है।

कश्मीर के लोगों ने खोद दी अलगाववाद की कब्र
8 अक्टूबर को जब ईवीएम में पड़े वोटों की गिनती होगी, तब सिर्फ यह पता चलेगा कि जम्मू कश्मीर की जनता ने क्या जनादेश दिया है। लेकिन, जिस तरह से चुनाव बहिष्कार का आह्वान बंद हो गया और अलदाववादी खुद चुनाव मैदान में वोट मांगते दिखे और कतारों में लगकर ईवीएम पर बटन दबाने का इंतजार किया, वह लोकतंत्र की असली जीत है।

आतंकवाद के गढ़ रहे इलाकों में लोगों ने खुलकर की वोटिंग
कश्मीर घाटी के जो इलाके कभी आतंकवाद के गढ़ बने हुए थे, वहां काफी वोटिंग हुई है। मसलन, पुलवामा विधानसभा सीट में 2014 के मुकाबले 13%, शोपियां के जौनपोरा में 9.5% और श्रीनगर की ईदगाह सीट पर 9.2% अधिक मतदान दर्ज हुआ।

चुनाव में भाग लेने वालों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी
इसी तरह 2014 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले उम्मीदवारों की संख्या इस बार 7% बढ़ (815 से 873 ) गई तो 28 के मुकाबले 43 महिला उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया है। पिछली बार से 26% ज्यादा निर्दलीय और 71% अधिक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया है।

सोमवार (एक अक्टूबर,2024) को जो 40 सीटों पर अंतिम दौर के लिए वोटिंग हुई है, उसमें 69.7% मतदान का रिपोर्ट है और इसके कुछ और भी बेहतर होने की ही गुंजाइश है। तीन दौर में यह सबसे ज्यादा मतदान है।

सोमवार रात 11 बजे के चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक तीनों दौर मिलाकर इस चुनाव में 63.5% वोटिंग हुई है। कश्मीर घाटी के सोपोर और बारामूला तीन दशकों से ज्यादा समय से चुनाव बहिष्कार के लिए जाने जाते थे, लेकिन इस बार वहां रिकॉर्ड वोटिंग हुई है।

तीन समुदायों के लोगों ने पहली बार डाले वोट
यह चुनाव इसलिए भी मायने रखता है कि पहली बार पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, वाल्मीकि समाज और गोरखा समुदाय के लोगों को भी मतदान का मौका मिला है, क्योंकि अनुच्छेद 370 हटने की वजह से उन्हें मताधिकार मिल गया है। इन समुदायों के करीब 1.5 लाख लोग मुख्य रूप से जम्मू, सांबा और कठुआ जिलों में रहते हैं।

वाल्मीकियों को 1957 में हिमाचल प्रदेश और पंजाब से सफाई कार्यों के लिए यहां लाकर बसाया गया था, लेकिन कभी भी उन्हें उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया था। ऐसे लोगों के लिए यह चुनाव लोकतंत्र का पहला त्योहार बन गया है।

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