J&K Elections: प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी ने किसके इशारे पर की चुनावी रैली? क्या हैं सियासी मायने?
Jammu Kashmir Chunav: पिछले कुछ दिनों से जैसी चर्चा थी, वही हुआ और प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के नेता चुनावी रैली में नजर आने लगे। इस संगठन पर केंद्र सरकार ने 2019 में प्रतिबंध लगा दिया था और इसी साल फरवरी में इस बैन को और पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है। जमात के नेताओं के चुनावी रैलियों में नजर आने के मायने दूरगामी लग रहे हैं।
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में चार निर्दलीय उम्मीदवारों की एक साझा चुनावी रैली आयोजित की गई, जिसमें अन्य लोगों के अलावा प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के सेलेक्ट पैनल के लोग भी शामिल हुए। इस मंच से घोषणा की गई कि परंपरागत राजनीतिक दलों की 'शोषणकारी राजनीति' को खत्म किया जाएगा।

जमात-ए-इस्लामी के कई नेता जेल में
जमात पर प्रतिबंध तो पांच साल पहले लगा है, लेकिन वह 35 वर्षों से चुनावी राजनीति से दूर है। इसे अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) ऐक्ट के तहत बैन किया गया है। जमात-ए-इस्लामी के कई सदस्य जेल में हैं और करोड़ों रुपए की इसकी कई संपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं। जमात की ओर से लगातार केंद्र सरकार से अपने ऊपर लगे प्रतिबंध को हटाने की मिन्नतें की जा रही हैं।
दक्षिण कश्मीर में चार निर्दलीयों के समर्थन में जमात ने की रैली
जमात पहले चरण यानी 18 सितंबर को होने वाले चुनाव के लिए जिन चार निर्दलीय प्रत्याशियों के समर्थन में रैली में शामिल हुआ है, उनमें कुलगाम से सयार अहमद रेशी शामिल हैं। रेशी जमात के ही पूर्व नेता हैं। इस सीट को सीपीएम नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी का गढ़ माना जाता है।
'शिक्षित लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहते हैं'
रेशी का कहना है, 'लोगों ने कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया। शिक्षित लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहते हैं। ये एक नई सुबह और नए युग की शुरुआत है।'
इसी तरह से जैनापोरा से एजाज अहमद मीर चुनाव मैदान में हैं, जो पहले पीडीपी में थे और 2014 में यहां से जीते भी थे। देवसार से नाजिर अहमद और पुलवामा से तलत माजिद को भी जमात-ए-इस्लामी का समर्थन हासिल हुआ है।
एजाज मीर कहते हैं, 'हम कश्मीर के बारे में बात करेंगे और लोगों का आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करेंगे....हम पारदर्शी तरीके से काम करेंगे, जिसमें भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं होगी।'
जमात नेता सरकार से चर्चा के दे रहे संकेत
जमात-ए-इस्लामी के पैनल हेड गुलाम कादिर वानी भी रैली में मौजूद थे। उनका कहना था, 'पहले हमसे कोई बातचीत नहीं कर रहा था। अब, संस्थाओं ने हमसे संपर्क किया है और लोगों ने हमसे बातचीत करनी शुरू की है, जिससे आखिरकार हमारे लिए मतदान प्रक्रिया में शामिल होने का रास्ता साफ हुआ है।'
रैली में शामिल होने का मतलब, 35 साल बाद चुनाव प्रक्रिया का समर्थन
वानी की बातों से संकेत मिल रहा है कि इनकी सरकार के साथ चर्चा चल रही है। माना जा रहा है कि निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देने का मतलब ये है कि जमात सरकार को यह आश्वस्त करना चाहता है कि वह 35 साल के बाद पूरी तरह से मतदान में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुका है।
कुछ क्षेत्रीय दलों को लग सकता है झटका
दरअसल, जमात का कश्मीर घाटी में जनता के एक बहुत बड़े वर्ग पर प्रभाव माना जाता है। माना जाता है कि चुनाव बहिष्कार में इस संगठन का पहले बहुत बड़ा रोल होता था, जिससे यहां मतदान प्रतिशत बहुत कम होता था।
अगर जमात चुनाव प्रक्रिया का समर्थन करता है तो इससे ज्यादा लोग वोट डालने निकलेंगे। इससे सही मायने में चुनाव का मतलब मजबूत होगा। लेकिन, एक आशंका यह भी जताई जाती है कि ऐसा होने पर कुछ स्थापित क्षेत्रीय दलों को झटका लग सकता है, जिन्हें कम मतदान का ज्यादा फायदा मिलता रहा है।












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