गहलोत के मंत्री का दावा, राज्यसभा चुनाव में 25 करोड़ और सियासी संकट के समय 60 करोड़ की मिला ऑफर
जयपुर, 2 अगस्त। राजस्थान में गहलोत सरकार के मंत्री राजेंद्र गुढ़ा के एक बयान से प्रदेश की सियासत में उबाल आ गया है। राजेंद्र गुढ़ा ने दावा किया है कि हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में उन्हें 25 करोड़ और साल 2020 में सियासी संकट के समय 60 करोड़ रुपए की ऑफर मिली थी। मंत्री राजेंद्र गुढ़ा के इस बयान से प्रदेश की सियासत गरमा गई है। मंत्री गुढ़ा ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में किसी व्यक्ति को वोट देने के लिए और सरकार गिराने के लिए ऑफर मिले थे। उन्होंने कहा कि 60 करोड़ का ऑफर मिलने पर एक बार मन में लगा था। लेकिन पत्नी बेटे और बेटी से जब बात की तो उन्होंने रोक दिया पत्नी ने कहा कि हमें पैसे नहीं चाहिए। ऐसा करने से आपकी इज्जत खराब हो जाएगी। हमें इज्जत चाहिए। मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा सोमवार को प्रदेश के झुंझुनू जिले में एक निजी स्कूल के कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान एक छात्रा ने उनसे सवाल पूछते हुए कहा कि भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। इस सवाल के जवाब में गुढ़ा ने यह बात कही।

सरकार के संकटमोचक बने
राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर छह विधायक जीते थे। राजेंद्र गुढ़ा उन छह विधायकों में शामिल है। साल 2019 में बसपा के सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे। तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट जुलाई 2020 में पार्टी के 18 विधायकों के साथ राजस्थान छोड़ कर चले गए थे। इसके बाद कांग्रेस में सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दो अलग-अलग गुट हो गए थे। इस दौरान गुढ़ा गहलोत खेमे में शामिल थे। नवंबर 2021 में उन्हें इसका इनाम भी मिला। कैबिनेट विस्तार के दौरान गहलोत ने गुढ़ा को सैनिक कल्याण राज्य मंत्री बनाया था।

ऑफर किससे मिली यह साफ नहीं
मंत्री राजेंद्र गुढ़ा ने राज्यसभा चुनाव और सियासी संकट के समय ऑफर मिलने की बात तो कही है। लेकिन यह ऑफर किनके द्वारा दी गई। यह साफ नहीं किया। जून 2022 में राज्यसभा की 4 सीटों के लिए चुनाव था। भाजपा ने घनश्याम तिवारी को उम्मीदवार घोषित किया था। इसके अलावा कारोबारी सुभाष चंद्रा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर चुनाव मैदान में उतरे थे। भाजपा ने उन्हें समर्थन का ऐलान किया था। चुनाव में घनश्याम तिवाड़ी और कांग्रेस के 3 उम्मीदवारों की जीत हुई और सुभाष चंद्रा को हार का सामना करना पड़ा।













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