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गायब हो गई जबलपुर आयुष्मान फर्जीवाड़ा केस की फाइलें ! जेल में रहते भी पाठक दंपति का कारनामा?

जबलपुर, 04 सितंबर: आयुष्मान भारत योजना के नाम करोड़ों के फर्जीवाड़े और अवैध रूप से होटल में हॉस्पिटल संचालन के आरोपों में गिरफ्तार डॉ. अश्वनी पाठक और पत्नी दुहिता पाठक का जांच के दौरान एक और कारनामा सामने आया हैं। न्यायिक अभिरक्षा में दोनों जेल में हैं, लेकिन उसके हॉस्पिटल से जांच की कई फाइलें गायब हो गई है। योजना के नाम पर भर्ती हुए फर्जी मरीजों से संबंधित फाइलों की जांच के लिए जब SIT हॉस्पिटल पहुंची, तो 21 फ़ाइल गायब मिली।

कहां गई फर्जी मरीजों की फाइलें?

कहां गई फर्जी मरीजों की फाइलें?

जबलपुर में सेंट्रल इंडिया किडनी अस्पताल की आड़ लेकर होटल में हॉस्पिटल चलाने का गैरक़ानूनी धंधा करने के आरोप में गिरफ्तार डॉ. अश्वनी पाठक और दुहिता पाठक के मामले की SIT जांच कर रही है। मामले में कई चौकाने वाली जानकारियां सामने आ रही है। एसआईटी जब वेगा होटल में भर्ती मरीजों से संबंधित जांच के लिए वहां पहुंची तो उसे 21 मरीजों की फाइलें नहीं मिली। जबकि छापे के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने आयुष्मान योजना के 30 मरीजों के भर्ती होने का दावा किया था।

आयुष्मान योजना के डायरेक्टर भी आए थे

आयुष्मान योजना के डायरेक्टर भी आए थे

इस मामले का खुलासा होने के बाद एमपी की जिम्मेदारी सँभालने वाले योजना के डायरेक्टर डॉ. पद्माकर त्रिपाठी भी आए थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की पड़ताल करने के साथ योजना से जुड़े अधिकारियों से भी पूछताछ की थी। डायरेक्टर त्रिपाठी का गुपचुप तरीके से हुआ दौरा भी चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रदेश स्तर के इस अधिकारी ने मीडिया से भी दूरी बनाकर रखी और चर्चा करने में परेहज किया। बड़ी प्लानिंग के साथ हुए फर्जीवाड़े में उनके विभाग से जुड़े कितने लोगों जानकारी मांगी गई है, यह भी उन्होंने नहीं बताया। ऐसे में जानकारों का कहना है कि डॉ. पाठक के इस कांड पर योजना से जुड़े बड़े अफसर भी पर्दा डालने में जुटे है, क्योकि फर्जी मरीज के भर्ती होने के अप्रूवल से लेकर इलाज के भुगतान तक बड़ा खेल हुआ।

योजना के जिला समन्वयक और नोडल अधिकारी तलब

योजना के जिला समन्वयक और नोडल अधिकारी तलब

पुलिस की एसआईटी ने आयुष्मान योजना के जिला समन्वयक रामभुवन साहू और नोडल अधिकारी धीरज दवंडे को तलब किया है। यही वो दो अधिकारी है, जिनकी देखरेख में डॉ. पाठक दंपति का काला धंधा बढ़ता गया। इनके रहते हुए हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले योजना के मरीजों का किस आधार पर फीडल वेरिफिकेशन हुआ, जांच का यह सबसे बड़ा एंगल है। दोनों अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध है, क्योकि जब इस मामले का खुलासा हुआ तो उसी वक्त पता चले फर्जी मरीजों के सारे रिकॉर्ड क्यों जब्त नहीं किए गए? भर्ती मिले मरीजों में 4-6 मरीजों के बयान लेने के अलावा बाकी मरीजों के बयान क्यों दर्ज नहीं किए? उसके अगले दिन सभी भर्ती मरीज वहां से गायब भी गए।

सामने आ रहे है कई शिकायतकर्ता

सामने आ रहे है कई शिकायतकर्ता

सेन्ट्रल किडनी हॉस्पिटल संचालकों की करतूतों से पर्दा उठने के बाद जांच टीम को कई और शिकायतें भी मिली है। यहां की धांधली का शिकार कई पीड़ितों ने निष्पक्ष जांच के लिए भोपाल में भी शिकायत की है। कोई और नहीं बल्कि भाजपा चिकित्सक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर अश्विनी त्रिवेदी ने खुद मांग की है कि इसकी हाईलेवल जांच होना चाहिए। उन्होंने अकेले जबलपुर जिले में आयुष्मान योजना से लगभग 92 करोड़ रुपए के भुगतान का दावा किया किया। त्रिवेदी बोले कि पूरे प्रदेश के निजी अस्पतालों की जांच होना चाहिए, क्योकि बड़े माफिया के तौर पर कई अस्पताल संचालक अभी भी इस कारोबार में लगे है। यदि ईमानदारी से जांच हुई तो कई अरब का बड़ा घोटाला सामने आएगा।

फर्जी मरीजों को भेजने वालों की पड़ताल

फर्जी मरीजों को भेजने वालों की पड़ताल

आरोपी डॉ. दंपति के गिरोह में शामिल रहे अन्य लोगों से भी पूछताछ जारी है। सूत्रों के मुताबिक जांच टीम को पता चला कि जबलपुर समेत अन्य जिलों से फर्जी मरीजों को भेजने वालों में कई झोलाछाप डॉक्टर भी थे। ग्रामीण इलाकों में ऐसे डाक्टरों को पता रहता था कि उनके क्षेत्र में कितने आयुष्मान कार्डधारी लोग कौन है। फिर चंद रुपयों की लालच में आने वाले लोगों को भर्ती होने यहां भेजा जाता था। खबर है कि ऐसे कई झोलाछाप डॉक्टर अपने अड्डों से बोरिया बिस्तर समेटकर भाग गए है।

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