यूक्रेन की मदद करने में निकली यूरोप की हवा, अमेरिका मदद मिलना भी होगा बंद.. भारत की बात मानेगा, या जंग हारेगा?
Ukraine War: अमेरिकी संसद के स्पीकर केविन मैक्कार्थी को उनकी पार्टी ने स्पीकर पद से इसलिए हटा दिया है, क्योंकि उन्होंने बाइडेन प्रशासन को यूक्रेन की और मदद करने लिए फंड जारी कर दिया था। अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी बहुमत में है और बाइडेन प्रशासन के साथ समझौता ये हुआ है, कि अमेरिकी संसद, बाइडेन प्रशासन को यूक्रेन की मदद करने के लिए और पैसा जारी नहीं करेगा।
जो बाइडेन भी मान चुके हैं, कि अब अमेरिका के लिए आगे यूक्रेन की आर्थिक मदद करना संभव नहीं हो सकता है और गुरुवार को स्पेन में यूरोपीय राजनीतिक समुदाय (ईपीसी) की एक बैठक में, यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा, कि यूरोपीय संघ कीव के प्राथमिक दाता के रूप में अमेरिका की जगह नहीं ले सकता है।

बोरेल ने कहा, कि 'यूरोप किसी भी हाल में अमेरिका की मदद रूकने पर उस अंतर को भर नहीं सकता है।'
यानि, अमेरिका के दम पर उछल रहे यूरोप की हवा टाइट हो गई और यूक्रेन अकेला। इस बीच अगर कोई खुश है, तो वो हैं व्लादिमीर पुतिन, जिन्होंने कहा है, कि अमेरिका मदद के बिना यूक्रेन एक हफ्ते में खत्म हो जाएगा, तो क्या एक हफ्ते में यूक्रेन जंग हार जाएगा? या फिर यूक्रेन अभी भी भारत के बताए रास्ते पर चलेगा और रूस के साथ समझौता स्वीकार करेगा?
मदद नहीं मिलने पर क्या करेगा यूक्रेन?
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने गुरुवार को स्पेन में यूरोपीय नेताओं की बैठक में बोलते हुए वाशिंगटन के "राजनीतिक तूफानों" के बारे में चिंता व्यक्त की, लेकिन कहा, कि उन्हें विश्वास है कि उन्हें अभी भी अमेरिका के दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है।
लेकिन, जेलेंस्की की ये उम्मीद सपनों की तरह है। अमेरिका में यूक्रेनी मदद के खिलाफ अब लोगों का विरोध फूटने लगा है और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी भी इसे राजनीतिक मुद्दा बना चुके हैं। लिहाजा, अगले साल चुनाव से पहले, बाइडेन प्रशासन अब जनता की नब्ज को पहचानने की कोशिश करेगा।

ईपीसी शिखर सम्मेलन में नेताओं ने कहा, कि पुतिन का कैलकुलेशन यह है, कि पश्चिम, यूक्रेन को मदद देना बंद करेगा, जिससे उन्हें जीत का रास्ता मिल जाएगा।
एस्टोनिया के प्रधान मंत्री काजा कैलास ने कहा, कि "मुझे लगता है, कि रूस चाहता है कि हम थक जाएं।" उन्होंने कहा, "हमें उन्हें दिखाना चाहिए कि हम थके हुए नहीं हैं।" हमें यूक्रेन की यथासंभव मदद करनी होगी।
फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने ज़ेलेंस्की के साथ एक बैठक में यूक्रेन के लिए "अथक" समर्थन का वादा करते हुए उस संदेश को सुदृढ़ किया।
लेकिन, सवाल ये है, कि यूरोप मदद के सिए पैसा कहां से लाएगा? यूरोपीय देश पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पस्त है, फ्रांस संघर्ष कर रहा है और जर्मनी की स्थिति ऐसी नहीं है, कि वो यूक्रेन की मदद के लिए डॉलर्स की बारिश कर पाए।

लिहाजा, यूरोपीय संघ में बड़ी बड़ी दरारें दिख रही हैं।
स्लोवाकिया ने घोषणा की है, कि उसने रविवार को संसदीय चुनावों के बाद पड़ोसी यूक्रेन को सैन्य सहायता पर फैसले रोक दिए हैं, जो पूर्व प्रधान मंत्री रॉबर्ट फिको की एसएमईआर-एसएसडी पार्टी द्वारा लिए गए थे। स्लोवाकिया की विपक्षी पार्टी ने यूक्रेन के लिए सैन्य समर्थन और रूस पर प्रतिबंधों को समाप्त करने के वादे पर चुनावी अभियान चलाया था।
इसके अलावा, पोलैंड पहले ही यूक्रेन से नाराज चल रहा है।
इसके अलावा, अमेरिका में जेलेंस्की के तानाशाही रवैये के खिलाफ भी गुस्सा फूट रहा है। विवेक रामास्वामी बार बार यूक्रेन में मतदान को टालने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन, जेलेंस्की मतदान नहीं करवाने की जिद पर अड़े हैं। लिहाजा, अमेरिका में अब यूक्रेनी लोकतंत्र पर बहस शुरू हो गई है।

तो फिर यूक्रेन के पास रास्ता क्या बचा है?
यूक्रेन के पास भारत की बात मानने के अलावा अब कोई और विकल्प नहीं बचा है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले साल उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से दो टूक शब्दों में कहा था, कि 'ये युद्ध का युग नहीं है।'
भारत ने यूक्रेन और रूस, दोनों से एक मंच पर बैठने, बातचीत करने और एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ने की वकालत की है। लेकिन, अमेरिकी डॉलर्स के सहारे जेलेंस्की लगातार रूस के खिलाफ आग उगलते रहे हैं, लेकिन अगर अमेरिकी मदद मिलना बंद होता है, तो जेलेंस्की के पास सरेंडर करने या फिर अपने देश को गंवाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।












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