• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

तालिबान और ईरान के रिश्ते इतने उलझे हुए क्यों हैं?

By BBC News हिन्दी
Google Oneindia News
तालिबान-ईरान संबंध
EPA
तालिबान-ईरान संबंध

अफ़ग़ानिस्तान में कट्टरपंथी सुन्नी तालिबान के फिर से मजबूत होने की आशंकाओं के बीच ईरान की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं. तालिबान और ईरान के आपसी रिश्ते बेहद उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं.

ईरान का अफ़ग़ानिस्तान के साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध है. ईरान खुद को अल्पसंख्यक शिया मुसलमानों के संरक्षक के तौर पर पेश करता रहा है. शिया मुसलमान ईरान की बहुसंख्यक लोग है.

ईरान ने लाखों अफ़ग़ान शरणार्थियों को पनाह दी है. शिया मत को मानने वाले हज़ारा समुदाय के लोगों को ईरान ने ख़ासतौर पर सीरिया के गृह युद्ध में अपने फतेमियोन ब्रिगेड में शामिल किया है.

अतीत में कई मौकों पर तालिबान को ईरान का वरदहस्त मिला है लेकिन ये बात भी दिलचस्प है कि शियाओं को लेकर उसकी ऐतिहासिक चिढ़ का साया दोनों के रिश्तों पर लंबे समय से हावी रहा है.

इसे यूं भी देखा जा सकता है कि ईरान और तालिबान के दोनों के रिश्ते सरहदी इलाकों में सुरक्षा ज़रूरतों पर आधारित हैं.

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी में क्या पाकिस्तान कर रहा है मदद?

अफ़ग़ानिस्तान के बगराम से अमेरिकी सेना की वापसी, क्यों अहम है ये इलाक़ा

ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव

अगस्त, 1998 में मज़ार-ए-शरीफ़ में तालिबान और नॉर्दर्न एलायंस के बीच भीषण लड़ाई हुई थी. इस लड़ाई में तालिबान के सैकड़ों लड़ाके मारे गए थे. उस वक्त नॉर्दर्न एलायंस को ईरान का समर्थन हासिल था.

बदले की कार्रवाई में तालिबान ने मज़ार-ए-शरीफ़ पर कब्ज़ा कर लिया और हज़ारों की संख्या में हज़ारा मुसलमानों की हत्या कर दी. इस कार्रवाई में 11 ईरानी नागरिक भी मारे गए थे. इसके बाद जंग के हालात बनते हुए दिखे. ईरान ने बोर्डर पर 70 हज़ार सैनिक तैनात कर दिए.

तालिबान ने ईरान के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए कजाकी डैम की धारा बंद कर दी. उस वक्त ईरान में सूखा पड़ा हुआ था. कजाकी डैम की धारा बंद किए जाने से ईरान को जाने वाली जल आपूर्ति बहुत कम हो गई.

तालिबान की इस नाकाबंदी से ईरान के हमाउं क्षेत्र में बहुत नुक़सान पहुंचा. इसके बाद अमेरिका ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोला तो उसे ईरान की मदद मिली. ईरान ने अमेरिका को सैनिक और खुफिया दोनों ही स्तरों पर मदद पहुंचाई.

साल 2002 में जब अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निमाण को लेकर बॉन कॉन्फ्रेंस हुई थी तो ईरान ने भी उसे सक्रिय रूप से भाग लिया था. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन ख़त्म होने के साल भर बाद अक्टूबर, 2002 में कजाकी बांध से ईरान को पानी की आपूर्ति शुरू हो गई.

लेकिन तालिबान के ख़िलाफ़ ईरान और अमेरिका की ये दोस्ती उस वक्त ख़त्म हो गई जब अमेरिका ने ईरान को 'शैतान की धुरी' बताकर उसका नाम अपने दुश्मनों की सूची में डाल दिया.

तालिबान आख़िर हैं कौन?

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कदमों की धमक, 1700 भारतीयों का क्या होगा?

तालिबान का ईरान के बीच 'सहयोग'

ईरान और तालिबान के रिश्तों में और भी कई पेचीदगियां हैं. प्रवासियों, पानी और सशस्त्र गुटों की आमदरफ़्त, ये वो बातें हैं जिनसे तालिबान और ईरान के रिश्ते प्रभावित होते हैं. अफ़ग़ानिस्तान से दो नदियां ईरान की ओर जाती है. इनमें एक हेलमंद नदी है और दूसरी हारी रुद.

अगर इन दोनों नदियों की धाराएं रोकी जाती हैं तो ईरान की बड़ी आबादी पानी के बिना हाहाकार करने लगती है. तालिबान के उदय से, ईरान को नई अफ़ग़ान हुकूमत और उसकी बांध परियोजनाओं से ख़तरा महसूस होने लगा.

इन परियोजनाओं में से एक हेलमंद नदी पर बना कमाल ख़ान डैम प्रोजेक्ट है. इसी मार्च में कमाल ख़ान डैम का उद्घाटन हुआ है. ईरान की तरफ़ इस डैम को लेकर चिंता का माहौल है.

अफ़ग़ानिस्तान और अमेरिका ने बार-बार ईरान पर, ख़ासकर उसके रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स पर तालिबान को वित्तीय और सैनिक मदद मुहैया कराने का आरोप लगाया है.

इनका कहना है कि ईरान तालिबान की मदद इसलिए करता है ताकि बदले में तालिबान इन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के काम में रोड़ा अटका सके. ईरान को होने वाली पानी की सप्लाई पर इन परियोजनाओं से अफ़ग़ानिस्तान का कंट्रोल बढ़ जाएगा.

अफ़ग़ानिस्तान में गठबंधन सेनाओं की मौजूदगी को लेकर तालिबान के साथ-साथ ईरान भी असहज महसूस करता है. तालिबान के साथ ईरान के सुरक्षा सहयोग की एक वजह ये भी रही है. अमेरिका और ब्रिटेन ईरान पर तालिबान को हथियारों की आपूर्ति करने का आरोप लगाते रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान का बढ़ता दबदबा, रिश्तों को लेकर असमंजस में भारत

तालिबान और अफ़ग़ान नेताओं में समझौता होगा?

रणनीतिक गठजोड़

ठीक इसी तरह जब साल 2015 में अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट ग्रुप के उदय के बाद ईरान ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के मकसद से तालिबान के साथ सहयोग बढ़ा लिया. इस्लामिक स्टेट तालिबान के नियंत्रण वाले इलाकों में ही पनप रहा था.

ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच इस रणनीतिक गठजोड़ का विस्तार कूटनीतिक संबंधों में भी बदलते हुए देखा गया.

ईरान के साथ तालिबान के रिश्ते किस हद तक हैं, ये बात उस वक्त शीशे की तरह साफ़ हो गई जब तालिबान के नेता मुल्ला अख़्तर मंसूर मई, 2016 में ईरान से पाकिस्तान लौटने के क्रम में अमेरिकी ड्रोन हमले का शिकार हो गए.

साल 2018 के आख़िर में ईरान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से तालिबान के प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की. आधिकारिक रूप से यह कहा गया कि ये सबकुछ अफ़ग़ान हुकूमत की जानकारी में हो रहा है. ईरान ने माना कि तालिबान के साथ उसकी बातचीत 'अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा समस्याओं को सुलझाने के मुद्दे पर' हुई है.

साल 2000 में जब अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर तालिबान और अमेरिका के बीच समझौता हुआ तो उसके बाद ईरान ने अमेरिका पर अफ़ग़ान शांति वार्ता तो तवज्जो ना देने का आरोप लगाया.

लेकिन ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़ारिफ़ ने सार्वजनिक रूप से ये कहा कि "तालिबान अफ़ग़ानिस्तान का पूरा भविष्य नहीं बल्कि उसके आने वाले कल का एक हिस्सा है."

तालिबान के क़रीब रूस क्यों आ रहा?

अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध में क्यों फंसा है अमरीका

अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान
Getty Images
अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान

तालिबान-ईरान संबंध की मौजूदा स्थिति

ईरानी मीडिया के बड़े तबके ने तालिबान के एक सैनिक ताक़त के रूप में फिर से मजबूत होने और सत्ता में उनके वापस लौटने की संभावनाओं को लेकर चिंता ज़ाहिर की है.

हालांकि ईरानी डिप्लोमैट्स, अमेरिकी विदेश नीति को दोष देने के साथ-साथ सार्वजनिक रूप से यही कह रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में लड़ाई कम करने की ज़रूरत है और इसके लिए बातचीत की जाए.

लेकिन ईरान के कट्टरपंथी धड़ों का एक हिस्सा और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़ा मीडिया एक अलग ही कहानी ही कह रहा है. ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम ने तालिबान को आधुनिक बनाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.

तसनीम न्यूज़ एजेंसी ने अपने प्लेटफॉर्म पर तालिबान के सीनियर नेताओं को धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता को खारिज करने के लिए प्लेटफॉर्म मुहैया कराया है.

उदाहरण के लिए तालिबान के प्रवक्ता ज़बिहुल्ला मुजाहिद ने तसनीम से कहा, "हम अपने शिया भाइयों को ये भरोसा दिलाते हैं कि उनके ख़िलाफ़ भेदभाव वाली कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी और न हम इसकी इजाज़त देंगे."

तसनीम न्यूज़ एजेंसी जैसे स्रोत ईरानी सुरक्षा एजेंसियों और तालिबान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सामंजस्य को सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर करते हैं. दूसरी तरफ़ ईरानी मीडिया से वास्ता पड़ने पर तालिबान के रुख में भी बढ़ती नरमी के संकेत दिखने लगे हैं.

हाल ही में इलना न्यूज़ एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में ज़बिहुल्ला मुजाहिद ने कहा कि जब वे सत्ता में थे तो गृह युद्ध और अनुभव की कमी के कारण ईरान से मधुर संबंध बनाने में नाकाम रहे. उन्होंने कहा कि तालिबान के बर्ताव में भी बदलाव आया है और उसमें काफी सुधार हुआ है.

ईरान और तालिबान के संबंधों का सरलीकरण करना या इसे आसानी से समझ लेना बहुत मुश्किल है. दोनों पक्षों का रुख ज़रूरतों और फायदे को देखते हुए ऊपर-नीचे होता रहा है.

लेकिन एक बात तय है और वो ये है कि दोनों ही पक्ष तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में वापस लौटने की तैयारी कर रहे हैं जिसकी पूरी संभावना भी है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
world relation of iran and afghanistan is complicated know why
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X