सेमीकंडक्टर बनाने की रेस में पिछड़ा भारत, जानिए कैसे SCL में अगर आग नहीं लगती, तो चिप बनाने के किंग होते हम

Why india failing in semiconductor race: दुनिया की ताजा स्थिति ये है, कि आज जिसके पास सेमीकंडक्टर बनाने की क्षमता है, 10 सालों के बाद उसी का दुनिया पर वर्चस्व होगा और कड़ी मेहनत के बाद भी आज का भारत, सेमीकंडक्टर की रेस में पिछड़ता जा रहा है।

पिछले हफ्ते ताइवान की चिप बनाने वाली कंपनी फॉक्सकॉन ने वेदांता से खुद को अलग कर लिया। इन दोनों कंपनियों ने मिलकर गुजरात में सेमीकंडक्टर बनाने का एग्रीमेंट किया था और ये सौदा 19.5 अरब डॉलर का था, जो दुनिया का सबसे बड़ा चिप बनाने का सौदा था। इस डील का टूटना भारत के लिए बहुत बड़ा झटका है। लिहाजा, एक बार फिर से सवाल उठते हैं, कि आखिर सेमीकंडक्टर बनाने की रेस में हम बार बार क्यों पिछड़ जाते हैं?

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भारत का सेमीकंडक्टर संघर्ष

सही टेक्नोलॉजी खोजने के लिए संघर्ष, कंपनियों के विलय के कारण हो रहे विवाद की वजह से बाहर हो रहे आवेदक और एक गैर-व्यावहारिक प्रस्ताव..सेमीकंडक्टर चिप्स के निर्माण की भारत की महत्वाकांक्षा एक दीवार में फंस गई है।

जून में जिन तीन संस्थाओं ने भारत में चिप्स बनाने के लिए आवेदन किया था, उन्हें अपने संयंत्र स्थापित करने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। ये बाधाएं ऐसी हैं, कि उन कंपनियों को चिप का उत्पादन शुरू करने में महीनों की देरी का सामना करना होगा और निश्चत तौर पर, अगले पांच सालों में वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र बनने के देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर इसका असर पड़ेगा।

ये आज के हालात हैं.. लेकिन, फिलहाल थोड़ा इतिहास खंगाल लेते हैं।

भारत सेमीकंडक्टर डिज़ाइन पावरहाउस रहा है। ध्यान दीजिए, डिजाइन का, ना की निर्माण का। लगभग हर प्रमुख सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनी की भारत में मौजूदगी है, और भारत में दुनिया के सबसे एडवांस सेमिकंडक्टर चिप का डिजाइन तैयार किया जाता है।

लेकिन एक बार जब वे डिज़ाइन पूरे हो जाते हैं, तो उन्हें बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया या ताइवान भेजा जाता है। यह सवाल उठता है, कि भारत उन कंपनियों में से कोई भी चिप्स क्यों नहीं बना सकती है?

1980 के दशक में, भारत सरकार ने अपना सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग राष्ट्रीय चैंपियन बनाने में चीन, ताइवान, मलेशिया, कोरिया और सिंगापुर की तरह बनने का प्रयास शुरू किया था। लेकिन, भारत की कोशिश मनमाफिक तरीके से शुरू नहीं हो पाई और धीरे धीरे भारत सेमीकंक्डर बनाने की मंशा से पीछे हटता चला गया।

भारत में बनने वाली किसी भी सरकार ने भारत में सेमिकंडक्टर निर्माण की दिशा में काम करने का फैसला नहीं किया, जबकि उस वक्त चीन, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे देश लगातार चिप बनाने में महारत हासिल करने की क्षमता विकसित कर रहे थे।

1960 के बाद से ही पश्चिमी देशों की कई कंपनियों ने पूर्वी एशिया में सेमीकंडक्टर निर्माण की कोशिशें शुरू की थीं और अलग अलग देशों से बात करनी शुरू की थी। जाहिर सी बात है, कुछ कंपनियों ने भारत का भी रूख किया, लेकिन उनका प्रपोजल भारतीय अधिकारियों की फाइलों में उलझकर रह गया।

1960 के दशक के मध्य में, फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर ने गंभीरता से भारत में एक कारखाना लगाने पर विचार किया। लेकिन प्रसिद्ध दुर्जेय भारतीय नौकरशाही ने उस कंपनी को इतना डरा दिया, कि आखिरकार उन्होंने मलेशिया और फिलीपींस में कारखाना बनाना चुना।

1970 और 80 के दशक में जैसे ही टेक्नोलॉजी ने अपनी रफ्तार पकड़नी शुरू की, भारत सरकार ने माइक्रोप्रोसेसरों और अन्य अर्धचालकों को एक नई क्रांति की संभावित नींव के रूप में पहचाना। उन्होंने निर्णय लिया, इस रेस में भारत को शामिल करना चाहिए।

इस प्रकार साल 1984 में भारत सरकार ने 100% राज्य स्वामित्व वाले उद्यम SCL की स्थापना की।

SCL का लक्ष्य एज सर्किट और इलेक्ट्रॉनिक्स का डिजाइन और निर्माण करना था। उनका दृष्टिकोण था, कि ये कंपनी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की नींव बन सकती है।

सरकार ने इस उद्यम में लगभग 40-70 मिलियन अमरीकी डालर का निवेश किया, जो उस समय काफी बड़ी रकम थी। कंपनी का मुख्यालय पंजाब राज्य के नियोजित शहर मोहाली में तय किया गया।

उस समय पंजाब की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी। लेकिन, पंजाब क्षेत्र टेक्नोलॉजी की दिशा में भी आगे बढ़ रहा था और यह एक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग केंद्र के रूप में उभर रहा था। उस समय पंजाब में वायरलेस सिस्टम और पंजाब कम्युनिकेशंस लिमिटेड जैसी प्रमुख इकाइयां स्थित थीं।

एससीएल ने IIT और बैंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे शीर्ष तकनीकी विश्वविद्यालयों से युवा ग्रेजुएट्स को नियुक्त किया। इन विश्वविद्यालयों का पश्चिम के साथ मजबूत संबंध है, और उन्होंने कुशल इंजीनियरिंग प्रतिभाओं के एक बहुत मजबूत समूह को प्रशिक्षित किया है। विशेष रूप से आईआईटी बॉम्बे स्कूल में लंबे समय से बहुत अच्छा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम चल रहा था, लिहाजा उनके छात्रों को कंपनी में भर्ती किया गया।

वे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, भारतीय राज्य के स्वामित्व वाली एयरोस्पेस और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी जैसी प्रतिष्ठित भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों से भी भर्ती करने में सक्षम थे।

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सेमीकंडक्टर बनाने में दिक्कतें क्या हैं?

सेमीकंडक्टर बनाने के लिए काफी ज्यादा रुपयों की जरूरत होती है और अच्छी क्वालिटी का चिप बनाने के लिए काफी महंगे मशीनों की जरूरत होती है, खासकर फोटोलिथोग्राफी क्षेत्र में। वहीं, चिप की टेस्टिंग के लिए भी महंगी मशीनों की जरूरत होती है।

इसके अलावा, इन मशीनों के रखरखाव में भी भारी-भरकम खर्च आता है।

भारत के मामले में, इन मशीनों को यूरोप या जापान जैसी जगहों से आयात करना पड़ता था और अभी भी वही हाल है। लेकिन, उस वक्त ये काम आसान नहीं था। कंपनी की डिमांड सरकारी फायलों में धूल खाती रहती थी।

चिप बनाने के लिए 100 प्रतिशत सरकारी खरीद-फरोख्त के साथ-साथ स्थिर बिजली और पानी की आपूर्ति होनी चाहिए। पर्यावरण संबंधी चिंताएं अलग से होती हैं, क्योंकि चिप मैन्युफैक्चरिंग काफी जहरीली प्रक्रिया है। भारत के सामने यहां शुरू से ही चुनौतियां हैं।

भारत के पास बुनियादी ढांचे का भारी अभाव रहा है और बिजली के एक बार कटने से या फिर पानी की सप्लाई एक बार बंद होने से महीनों की कड़ी मेहनत बर्बाद हो सकती है।

इसके अलावा, चिप इंडस्ट्री में हर दिन रिसर्च की जरूरत पड़ती है, क्योंकि टेक्नोलॉजी का लगातार विकास होता रहता है, लिहाजा चिप इंडस्ट्री चलाने में काफी ज्यादा रिस्क है, जिसके लिए सरकारों को तैयार रहना होता है।

SCL आगे बढ़ा, मगर फिसल गया

एससीएल एक अग्रणी सेमीकंडक्टर निर्माता बनना चाहता था। लेकिन, एससीएल के पास टेक्नोलॉजी को लेकर दिक्कतें थीं।

हालांकि, 1984 में एससीएल की स्थापना के समय, वे अमेरिकन माइक्रोसिस्टम्स इंक से 5-माइक्रोन प्रक्रिया प्रौद्योगिकी का लाइसेंस प्राप्त करने में सक्षम हो गये थे।

इसके तुरंत बाद, एससीएल दो अन्य कंपनियों के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों के निर्माण के सौदे के हिस्से के रूप में उनसे प्रक्रिया प्रौद्योगिकी हासिल करने में सक्षम हो गई।

पहला सौदा अमेरिकी औद्योगिक स्वचालन कंपनी, रॉकवेल के साथ उनके 2560G माइक्रोप्रोसेसर बनाने के उद्देश्य से था।

दूसरा सौदा जापानी फर्म हिताची के साथ उनकी इलेक्ट्रॉनिक कलाई घड़ी के लिए घटकों के उत्पादन के उद्देश्य से था।

इन संसाधनों का उपयोग करते हुए, कंपनी 1980 के दशक के अंत में 5 माइक्रोन प्रक्रिया टेक्नोलॉजी से 0.8 माइक्रोन प्रक्रिया तक बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी। 0.8 माइक्रोन, या 800 नैनोमीटर, पहली बार 1987 में एनटीटी, तोशिबा और इंटेल जैसी अग्रणी कंपनियों द्वारा हासिल किया गया था।

इस प्वाइंट पर एससीएल काफी अच्छा करने लगी थी और ऐसा संभव लग रहा था, कि भारत एक दशक के भीतर वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्माता बनने का अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है।

लेकिन, सारी उम्मीदें 1989 में ख़त्म हो गईं, जब एससीएल में भीषण आग लग गई। आग लगने का कारण अज्ञात बना हुआ है। कुछ स्रोतों ने बिना सबूत के दावा किया है, कि यह आगजनी थी। वजह कुछ भी रहा हो, लेकिन भारत का सपना उस आग में जल गया।

आग लगने से भयानक रसायन निकलते हैं और उस आग लगने के बाद फिर से कंपनी को खड़ा करने के लिए काफी मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत थी, जो उस समय नहीं दिखाई गई, क्योंकि इसमें करोड़ों रुपये खर्च होना था।

हालांकि, 1997 में फिर से उत्पादन शुरू किया गया, लेकिन उस वक्त तक दुनिया में चिप बनाने की टेक्नोलॉजी इतनी आगे निकल चुकी थी, कि एससीएल के लिए उसे पकड़ना संभव नहीं रहा।

आज, एससीएल ज्यादातर अपने पुराने 6 इंच वेफर फैब के साथ अनुसंधान एवं विकास का काम करता है। हाल ही में 2019 में, उन्होंने घोषणा की कि वे 180 एनएम नोड पर चिप डिज़ाइन स्वीकार करने में सक्षम हैं।

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