क्या भारत कर रहा है नाराज बाइडेन को मनाने की कोशिश? जयशंकर का अमेरिका दौरा नॉर्मल नहीं!

अमेरिकी राजदूत का लंबे अर्से से भारत में नहीं होना दोनों देशों के बीच अविश्वास को लेकर संदेह बढ़ा रहा है। वहीं, मोदी सरकार का यह विचार तेजी से बढ़ रहा है, कि बाइडेन प्रशासन अपने मुख्य काम से विचलित हो रहा है।

वॉशिंगटन, सितंबर 20: पिछले हफ्ते उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइजेशन शिखर सम्मेलन में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक हो रही थी, तो पीएम मोदी ने पुतिन के सामने उनके मुंह पर कहा, कि 'आज का युग युद्ध का युग नहीं है' और रूसी राष्ट्रपति के लिए पीएम मोदी के मुंह से ये बयान सुनना किसी झटके से कम नहीं था और रूसी डिप्लोमेट्स ने भारतीय प्रधानमंत्री से ऐसे शब्दों की कतई उम्मीद नहीं की थी, लेकिन पीएम मोदी की बातों ने अमेरिकी अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन अब एस. जयशंकर अमेरिका का यात्रा कर रहे हैं और कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि भारत नाराज अमेरिका को मनाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका को मनाने की कोशिश

अमेरिका को मनाने की कोशिश

भारतीय विदेश मंत्री का अमेरिका दौरा वैसे तो संयुक्त राष्ट्र महासभा कार्यक्रम के लिए है, लेकिन द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर का अपने अमेरिकी समकक्ष एंटनी ब्लिंकन और अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन से मुलाकात करने का कार्यक्रम है। वह क्वाड, ब्रिक्स और संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में भी भाग लेंगे। भारतीय विदेश मंत्री की यह यात्रा भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण समय पर हो रही है, जिसे हाल ही के समय में थोड़ा तनावपूर्ण महसूस किया गया है। हालांकि, ये देखना काफी अजीब है, क्योंकि दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र देशों ने सार्वजनिक रूप से कम से कम एक दूसरे में स्नेह और विश्वास दोनों का प्रदर्शन किया है और 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौता के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, लेकिन इसके बाद भी अंदरखाने की रिपोर्ट में कहा गया है, कि जो बाइडेन भारत से नाराज हैं और भारत नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति को मनाने की कोशिश कर रहा है।

भारत-अमेरिका में कैसा रिश्ता?

भारत-अमेरिका में कैसा रिश्ता?

द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि लगता है कुछ चीजें हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की निगरानी में बिखर गई हैं और दोनों देशों के बीच इस वक्त किसी बड़े आइडिया भी बात करने के लिए नहीं है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पिछले पांच सालों से लटका हुआ है और ऐसा लग रहा है, कि बाइडेन प्रशासन ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। वहीं, राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडेन ने अभी तक भारत में नये राजदूत को नहीं भेजा है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद से जाने के बाद केनेथ जस्टर की भी विदाई हो गई थी और उसके बाद से नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास 'रूजवेल्ट हाउस' अभी तक खाली है और अब बाइडेन को राष्ट्रपति बने पौने दो सालों का वक्त हो चुका है, लेकिन अमेरिका ने अभी तक भारत में अपना राजदूत नहीं भेजा है और ये पहली बार है, जब कोई अमेरिकी राजदूत भारत में इतने लंबे अर्से से नहीं है।

दोस्ती में आ रही है दरार?

दोस्ती में आ रही है दरार?

अमेरिकी राजदूत का लंबे अर्से से भारत में नहीं होना दोनों देशों के बीच अविश्वास को लेकर संदेह बढ़ा रहा है। वहीं, मोदी सरकार का यह विचार तेजी से बढ़ रहा है, कि बाइडेन प्रशासन अपने मुख्य काम से विचलित हो रहा है। मोदी सरकार का मानना है, कि बाइडेन प्रशासन को भारत से संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, लेकिन वो मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर फोकस कर रहा है। पिछले दिनों एस. जयशंकर ने बढ़ते नस्लीय हिंसा को लेकर अमेरिका की आलोचना भी थी और इसे भारत का जवाब माना गया। हालांकि, फिर भी बाइडेन प्रशासन खुद औपचारिक रूप से भारत की आलोचना नहीं की है, लेकिन स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों और श्रम कानूनों पर अंकुश लगाने और लोकतंत्र जैसे मुद्दों पर भारत की आलोचना करने का जिम्मा बाइडेन प्रशासन ने अपने अधिकारियों पर छोड़ दिया है और वो काम बाइडेन के अधिकारी बखूबी कर रहे हैं।

भारत भी झुकने को तैयार नहीं

भारत भी झुकने को तैयार नहीं

बराक ओबामा और जो बाइडेन प्रशासन के बीच अंतर यह है, कि ओबामा ने कम से कम इस बात को स्वीकार किया था, कि भारत के लोकतंत्र की मौलिक रूप से जीवंत प्रकृति को नीचे नहीं रखा जा सकता है। दूसरी ओर, बाइडेन इस महीन अंतर को समझने में असमर्थ हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है, कि लोकतंत्र भारत की आत्मा है और भले ही कुछ अप्रिय घटनाएं घटें, फिर भी भारत की बड़ी आबादी लोकतंत्र के ही साथ है और महज मुट्ठी भर लोग ही लोकतांत्रिक विचारधारा के खिलाफ हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत की दक्षिणपंथी सरकार को समर्थन करने वाले भी लोकतंत्र का समर्थन करते हैं, ना की कोई तानाशाह सरकार को स्वीकार कर सकते हैं।

रूस-अमेरिका में एक का चुनाव

रूस-अमेरिका में एक का चुनाव

वहीं, बाइडेन प्रशासन ने इन मौलिक बातों पर ध्यान नहीं देकर भारत-रूस के रिश्तों पर अपनी ऊर्जा बर्बाद की है और बाइडेन प्रशासन इस विचारधारा के साथ आगे बढ़ रही है, कि नई दिल्ली को रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का समर्थन करने के बीच चयन करना चाहिए। लेकिन, भारतीय अधिकारी भी उसी तरह से हठी बने हुए हैं और उन्होंने बाइडेन प्रशासन की हर मांग को खारिज कर दिया और भारत ने साफ कर दिया, कि वो अपना हित देख रहा है और यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी तेल खरीदकर 35 हजार करोड़ रुपये बचाए हैं। लिहाजा, दोनों तरफ से हठयोग चल रहा है। लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, यही वजह है, कि भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर अमेरिका गये हैं, ताकि वो एंटनी ब्लिंकन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन से ईमानदार बातचीत कर अगर किसी प्रकार की नाराजगी है, तो उसे बीच से हटा सकें।

क्या दूर होगी अमेरिका की नाराजगी

क्या दूर होगी अमेरिका की नाराजगी

रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिसपर भारतीय विदेश मंत्री अमेरिकी मंत्रियों से बात कर सकते हैं, जिनमें सबसे पहला मुद्दा रूस का ही होगा। तथ्य यह है कि, पीएम मोदी ने पुतिन के साथ स्पष्ट रूप से बात की और उन्हें बताया कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वह यूक्रेन के साथ शांति के लिए युद्ध का चयन कर रहे थे और पीएम मोदी ने जो बातें हिन्दी में की और उनकी टिप्पणियों को जिस तरह से सोशल मीडिया पर डाला गया, वह यह संकेत दे रहा है, कि भारत पूरी तरह से रूस के साथ नहीं है। निश्चित तौर पर यह अमेरिका के लिए एक संदेश है। भारत अमेरिका को साफ तौर पर संदेश दे रहा है, कि अगर भारत अपनी अर्थव्यवस्था के लिए रूस से भारी मात्रा में रियायती तेल खरीद रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं, कि भारत युद्ध का किसी भी तरह से समर्थन करता है। इसके साथ ही पिछले 6 महीने से लड़ने के बाद भी रूस यूक्रेन में युद्ध जीत नहीं पाया है, और ज्यादातर रूसी हथियार यूक्रेन में नाकाम हो गये हैं, इससे भारत के पास भी एक संदेश पहुंचा है, कि उसके पास सबसे ज्यादा रूसी हथियार हैं और वो दो दुश्मनों के साथ अपनी सीमा को साझा करता है। लिहाजा, भारत अमेरिका को भी नाराज नहीं रखना चाहता है।

भारत की बड़ी चिंताएं

भारत की बड़ी चिंताएं

भारत की बड़ी चिंताएं ये हैं, कि अगर रूस युद्ध को जारी रखता है, जैसा ही पुतिन ने कहा है, तो फिर भारत को युद्ध चलने तक रूसी तेल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और पश्चिमी देशों को यूक्रेन को हर हाल में बचाना होगा, चाहे उसके लिए उसे कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े, तो फिर भारत असमंजस की स्थिति में फंसा रहेगा, भले ही वह रूस की बाकी नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता हो। भारत की दूसरी चिंता चीन है और एस. जयशंकर को उम्मीद होगी, कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पीएलए के सैनिकों के साथ पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस दृढ़ संकल्प के साथ चीन के दबाव का सामना किया है, उसे अमेरिका समझेगा। इसके अलावा, पिछले हफ्ते के एससीओ शिखर सम्मेलन में, मोदी ने सुनिश्चित किया, कि जरूरी ग्रप फोटो छोड़कर चीन के शी जिनपिंग के साथ कोई फोटो-ऑप नहीं था। यह अमेरिका के लिए एक और संकेत है, कि भारत एक आक्रामक चीन के सामने मुखर विरोधी बनने के लिए तैयार है अपनी सहयोगी एशियाई शक्ति को नियंत्रित करने में अपनी भूमिका निभाएगा।

क्या भारत के आंतरिक मामलों में दखल देगा यूएस?

क्या भारत के आंतरिक मामलों में दखल देगा यूएस?

हालांकि, जहां तक ​​भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में डेमोक्रेटिक पार्टी की चिंताओं का सवाल है, तो इस बात की संभावना बहुत कम है, कि ब्लिंकन या अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शेरमेन सीधे उस मोर्चे पर जयशंकर को शामिल करेंगे। यदि वे ऐसा करते हैं, तो यह भारत के आंतरिक मामलों में एक उल्लेखनीय हस्तक्षेप होगा और अमेरिका जानता है कि इससे संबंधों में काफी खराबी आ जाएगी और ऐसा करना खुद अमेरिका भी नहीं चाहेगा, भले ही बाइडेन के लिए ये कितना भी अहम क्यों ना हो। लेकिन, इतना तो है ही, कि वाशिंगटन डीसी में नाखुशी अपना असर दिखा रही है - और बढ़ती उदासीनता में कई क्षेत्रों में अपना असर दिखा रहा है, जैसे भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर हो। लिहाजा, अब देखना दिलचस्प होगा, कि भारत अपनी बात रखते हुए भी अमेरिका की नाराजगी कैसे दूर करता है?

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