वो पहला अरब देश जिसने इजराइल को दी थी मान्यता, नाराज मुस्लिम कट्टरपंथियों ने राष्ट्रपति की कर दी थी हत्या
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1948 में इजराइल देश की स्थापना हुई। अमेरिका, इजराइल को मान्यता देने वाला सबसे पहला देश था। शुरुआती दौर में आनाकानी करने के बाद 1950 में भारत ने भी इजराइल को मान्यता दे दी।
लेकिन ऐतिहासिक रूप से मिस्र जो कि इजरायल के बड़े विरोधियों में से एक था, आखिर कैसे इजराइल का सहयोगी देश बन गया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मिस्र, इजराइल को मान्यता देने पर मजबूर हो गया?

आइये जानते हैं:
जैसा कि आपको पता है कि इजराइल की स्थापना 1948 में हुई थी। लेकिन इसके अगले ही दिन अरब देशों ने इजराइल पर हमला कर दिया। लगभग एक साल बाद 1949 में ये युद्ध खत्म हुआ। और जब ये युद्ध खत्म हुआ... इजरायल, संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित सीमाओं से परे अपने सीमाओं का विस्तार कर चुका था।
इसके बाद 'स्वेज संकट' के नाम से जाना जाने वाला दूसरा बड़ा संघर्ष 1956 में शुरू हुआ था। उस दौरान मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के जवाब में इजरायल, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस पर हमला कर दिया। मिस्र द्वारा नहर पर पुनः नियंत्रण हासिल करने के साथ युद्ध समाप्त हो गया, लेकिन इससे इजरायल और मिस्र के बीच संबंधों में काफी खटास आ गई थी।
मिस्र ने मई 1967 में सिनाई प्रायद्वीप में अपनी सेनाएं जुटाईं और 'संयुक्त राष्ट्र शांति सेना' को निष्कासित कर दिया। ये सेना 1956 के स्वेज संकट के बाद से ही वहां तैनात थी। इतना ही नहीं, मिस्र ने इजराइल के लिए एक महत्वपूर्ण शिपिंग लेन, तिरान जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया।
इससे नाराज होकर इजराइल ने 5 जून, 1967 को मिस्र के खिलाफ 'ऑपरेशन फोकस' शुरू कर दिया। इजराइली वायुसेना के लगभग 200 विमानों ने मिस्र के 18 अलग-अलग हवाई क्षेत्रों पर हमला किया और मिस्र की वायु सेना को लगभग 90 प्रतिशत को खत्म कर दिया। इसके अलावा इजरायली टैंक और पैदल सेना ने सीमा पार और सिनाई प्रायद्वीप और गाजा पट्टी में धावा बोल दिया।
इसी बीच जॉर्डन तक गलत सूचना पहुंच गई कि मिस्र ने इजराइल को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इससे उत्साहित होकर जॉर्डन ने यरूशलेम में इजरायल के ठिकानों पर गोलाबारी शुरू कर दी। इसका जवाब देते हुए इजरायल ने पूर्वी यरुशलम और वेस्ट बैंक पर विनाशकारी जवाबी हमले शुरू कर दिए।
इसके कुछ दिन बाद इजराइल ने सीरिया पर भी हमला कर दिया और उसके गोलान हाइट्स को जीत लिया। इसके बाद 10 जून, 1967 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में संघर्ष विराम प्रभावी हुआ। 6 दिनों के इस युद्ध ने पश्चिमी एशिया का नक्शा बदल दिया था।
इस युद्ध के दौरान इजरायल को सिनाई प्रायद्वीप, गोलान हाइट्स और पूर्वी यरुशलम जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया था।
सिनाई प्रायद्वीप 60000 वर्ग किलोमीटर का इलाका है जो उत्तर में भूमध्य सागर, दक्षिण में लाल सागर और उत्तर पूर्व में इजराइल से घिरा है। यह मिस्र के कुल क्षेत्रफल का 6 प्रतिशत है। जबकि मिस्र की मुख्य भूमि अफ्रीकी महाद्वीप में आती है, सिनाई को एशियाई महाद्वीप के हिस्से के रूप में गिना जाता है।
मिस्र ने सिनाई प्रायद्वीप और सीरिया ने गोलान हाइट्स को फिर से हासिल करने के लिए 6 साल बाद यानी कि 1973 में एक बार फिर से इजराइल पर हमला कर दिया। मिस्र के सैनिकों ने सिनाई प्रायद्वीप में घुसपैठ की और सीरियाई सैनिक गोलान हाइट्स में घुस गए।
लेकिन एक बार फिर से अऱब देशों को युद्ध में निराशा हाथ लगी। इस युद्ध के बाद इजरायल ने पहले से ज्यादा क्षेत्र हासिल कर लिया। सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा करने की लगातार 2 लड़ाई हारने के बाद मिस्र ने युद्ध से नहीं बल्कि कूटनीति से इसे हासिल करने का प्रयास शुरू किया।
अंततः 1978 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए शांति समझौते के एक हिस्से के रूप में इजराइल द्वारा सिनाई को मिस्र को वापस सौंप दिया गया, जिसे कैंप डेविड समझौते के रूप में भी जाना जाता है। बदले में, मिस्र को इजराइल को एक वैध राज्य के रूप में मान्यता देनी पड़ी।
अब तक मिस्र ने इजराइल को एक वैध संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता नहीं दी थी। मिस्र ने भी इज़राइल के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखने का वादा किया। कहा जा सकता है कि इजराइल ने केवल राजनीतिक मान्यता के लिए, मिस्र के हाथों अपना विशाल क्षेत्र खो दिया।
लेकिन इतनी सी बात नहीं थी। इजराइल को इसका फायदा अब तक मिल रहा है। उस दौर में इजराइल को मिस्र के नेतृत्व में एकजुट अरब से बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन कैंप डेविड समझौता ने आने वाले समय में अरब एकता को चकनाचूर कर दिया। 1978 के बाद अरब एकता एक दिवास्वप्न बन गयी।
मिस्र इजराइल को राजनीतिक मान्यता देने वाला पहला राज्य बन गया। मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात 19 नवंबर 1977 को यरुशलम पहुंचे और उन्होंने इजराइली संसद में भाषण दिया। सादात इसराइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने।
हालांकि मिस्र के राष्ट्रपति को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। इजराइल संग समझौता कर उन्होंने उन्होंने अपने ही 'डेथ वारंट' पर साइन कर दिया था। 1981 में मिस्र की सेना में लेफ्टिनेंट खालिद और अन्य लोगों ने राष्ट्रपति पर गोलिया बरसा दीं। उन्हें 34 गोलियां लगीं। बाद में उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उनका बचना नामुमकिन था।
हालांकि मिस्र संग इजराइल का समझौता इस यहूदी देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। यह संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन आदि जैसे अन्य अरब राज्यों के लिए एक मिसाल बन गया, जिन्होंने 2020 में इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए।












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