Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

चीन: दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार से बाहर क्यों जा रहे हैं विदेशी निवेशक, पांच कारण

चीनी अर्थव्यवस्था
Getty Images
चीनी अर्थव्यवस्था

चीन की 'तेज़ी से होती आर्थिक तरक्की' के पीछे एक बड़ा कारण यहां होने वाला विदेशी निवेश था.

इसी तेज़ आर्थिक तरक्की के बलबूते चीन ने बीते चार दशकों में अपने के 85 करोड़ नागरिकों को गरीबी रेखा से ऊपर निकाला है.

साल 1976 में माओ ज़ेडांग की मौत के बाद से चीन ने अपनी नीति में थोड़ा बदलाव किया और रूढ़िवादी कम्यूनिज़्म के बजाय आर्थिक तरक्की का नया रास्ता अपनाया.

उसने देश के दरवाज़े विदेशी निवेश के लिए खोले.

नतीजा ये हुआ कि आने वाले दशकों में निवेश में बढ़ोतरी हुई और चीन की जीडीपी औसतन नौ फीसदी की दर से बढ़ने लगी.

विदेशी निवेश में गिरावट

लेकिन कई सालों तक चला ये ट्रेंड अब पलटता दिख रहा है. इस साल की शुरुआत से, ख़ासकर रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से चीन में हो रहे विदेशी निवेश में काफी गिरावट दर्ज की गई है.

इस साल केवल जनवरी से मार्च के बीच विदेशी निवेशकों के चीनी मुद्रा युआन में बॉन्ड्स के रूप में किए निवेश से 150 अरब डॉलर निकाल लिए हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल फाइनेंस की मई महीने की रिपोर्ट में कहा गया है कि "इस साल जनवरी में चीन में कैपिटल इनफ्लो यानी विदेशी निवेश का आना देखा गया लेकिन फरवरी और मार्च में विदेशी निवेश निकालने की गति इतनी बढ़ गई कि ये तिमाही किसी साल की सबसे बुरी तिमाही थी. अप्रैल में भी अर्थव्यवस्था से संपत्ति का बाहर निकलना जारी रहा."

वॉशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल फाइनेंस का अनुमान है कि इस साल क़रीब 300 अरब डॉलर की संपत्ति का आउटफ्लो चीन से अमेरिका की तरफ हुआ है जो 2021 के मुक़ाबले दोगुना है. साल 2021 में कुल 129 अरब डॉलर मूल्य की संपत्ति चीन से अमेरिका गई है.

बीबीसी ने इस ट्रेंड के चार बड़े कारणों के बारे में विश्लेषण किया और ये पाया है कि अगर ये ट्रेंड आने वाले कुछ महीनों तक जारी रहा तो इसका चीनी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा और इसे रोकने के लिए चीनी अधिकारी क्या कर रहे हैं.

कोरोना वायरस से चीन की अर्थव्यवस्था को झटका

चीन ने स्पाइडर मैन पर पाबंदी क्यों लगाई? -दुनिया जहान

चीन में कोरोना महामारी
Getty Images
चीन में कोरोना महामारी

1- 'ज़ीरो कोविड' नीति


स्पेन के अर्थशास्त्री और लेखक प्रोफ़ेसर ख़ुआन रेमॉन रैलो ने बीबीसी से कहा, "चीन ने ज़ीरो कोविड नीति लागू की है और कोरोना महामारी की पहली लहर के दौर की तरह इसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पड़ा है."

महामारी के दो साल के बाद जहां अधिकांश देशों ने लॉकडाउन ख़त्म कर दिया है और दूसरी पाबंदियों में ढील दे रहे हैं वहीं चीन में मामला ऐसा नहीं है.

महामारी से पहले बीजिंग की बड़ी प्राथमिकता वहां की आर्थिक प्रगति रही है. शहर के अधिकांश आबादी को कोरोना का टीका लग चुका है, इसके बावजूद संभावित स्वास्थ्य इमर्जेंसी को देखते हुए इस बार आर्थिक प्रगति सरकार की प्राथमिकता नहीं रही है.

शंघाई में सरकार ने कोरोना को फैलने से रोकने के लिए सख़्त पाबंदियां लगाई गई हैं. देश की जीडीपी में 5 फीसदी का योगदान इस शहर की आर्थिक गतिविधियों का होता है. इसके अलावा देश के दूसरे शहरों में भी सरकार ने कड़ी पाबंदियां लगाई हैं जिसका असर वहां के व्यापार पर पड़ा है.

अप्रैल के महीने में शहरों में बेरोज़गारी 6 फीसदी बढ़ गई जबकि आर्थिक गतिविधियां 0.68 फीसदी सिकुड़ गई हैं. कुछ लोगों का मानना है कि चीन इस साल 5.5 फीसदी की विकास दर हासिल कर सकेगा, पहले के सालों की तुलना ये आंकड़ा पहले ही कम है.

हॉन्ग कॉन्ग में मौजूद इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के प्रमुख विश्लेषक निक मारो कहते हैं, "कई कंपनियां आज भी चीन को एक बड़े और महत्वपूर्ण बाज़ार के रूप में देखती हैं. लेकिन आज के वक्त में उनके लिए ऐसा कर पाना मुश्किल है क्योंकि लगभग पूरी दुनिया कोरोना की पाबंदियों से बाहर निकल आई है लेकिन चीन में अभी भी सख़्त पाबंदियां लगी हुई हैं."

मारो मानते हैं कि चीन की ज़ीरो कोविड की नीति पूंजीपतियों को चीन पर दांव लगाने से रोकती है.

वो कहते हैं, "बिना सूचना दिए कब अचानक से नियम बदल दिए जाएं इसे लेकर अनिश्चितता है, ऐसे में भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए निवेश की योजना बनाना और फ़ैसले लेना मुश्किल हो जाता है."

"एक समस्या ये है कि क्या विदेशी निवेशक ज़ीरो कोविड नीति को अस्थायी समस्या के रूप में देखते हैं जिसके वो कुछ वक्त तक झेल सकते हैं. अगर ये नीति लंबे वक्त तक लागू रही तो उनके लिए इसके बीच यहां काम करना मुश्किल हो सकता है."

लद्दाख पर अमेरिका की चिंता से चीन नाराज़, भारत के लिए क्या हैं मायने?

अमेरिका ने कहा- भारत सीमा पर मज़बूत हो रहा है चीन

चीन का रियल इस्टेट
Getty Images
चीन का रियल इस्टेट

2. चीन का रियल इस्टेट संकट


हाल के दशकों में चीन के रियल इस्टेट सेक्टर में तेज़ी देखी गई थी, यहां की अर्थव्यवस्था के विकास में इसका बड़ा योगदान था. लेकिन बीते साल से इस सेक्टर पर बैंकों के बढ़ते कर्ज के बादल मंडरा रहे हैं. देश की बड़ी रियल इस्टेट कंपनी एवरग्रांड की आर्थिक स्थिति भी बुरी तरह बिगड़ी है.

हालांकि चीन के रियल इस्टेट संकट की आशंका बीते कई सालों से लगाई जा रही थी, लेकिन ज़ीरो कोविड नीति और दूसरे कारणों के अर्थव्यवस्था पर मिलेजुले की आशंका ने विदेशी निवेशकों को और डरा दिया है.

प्रोफ़ेसर ख़ुआन रेमॉन रैलो कहते हैं, "बीते एक दशक में चीन की अर्थव्यवस्था में गति का एक बड़ा कारण सस्ता कर्ज़ और इस कारण रियल इस्टेट में आया बबल था."

वो कहते हैं कि इस बबल के फूटने के बाद देश अब एक अलग प्रोडक्टिव मॉडल की तरफ बढ़ रहा है लेकिन ये प्रक्रिया अपने आप में 'जटिल' है.

वो कहते हैं, "इस बबल के फूटने से होने वाले असर को संभालने की प्रक्रिया धीमी तो होगी ही इसकी अपनी अलग मुश्किलें भी होगी और चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी जो रुख़ अपना रही है उससे ये नहीं लगता कि इसका असर जल्द ख़त्म होगा."

ऐसा नहीं है कि चीनी अधिकारियों को इस बात का अंदाज़ा नहीं है.

उन्होंने रियल इस्टेट बाज़ार में जान फूंकने के लिए कई कदम भी उठाए हैं और केंद्रीय सरकारी बैंक ने गिरवी रखने की ब्याज दरों में कमी की है.

चीन उन कुछ देशों में शामिल है जो संकट से उबरने के लिए दूसरा रास्ता अपना रहा है.

चीन के मुक़ाबले यूरोप के सेंट्रल बैंक और अमेरिका के फेडेरल रिज़र्व ने इन्फ्लेशन पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाया है.

वैश्विक स्तर पर बढ़ रही महंगाई के बीच कई देश चीन के इस कदम को जोखिम भरा मानेंगे लेकिन रियल इस्टेट संकट से उबरने के लिए वो अर्थव्यवस्था में और पैसे डालने को तैयार है.

अमेरिका की इस रणनीति को कैसे चुनौती दे रहा चीन और भारत है किस ओर

चीन की प्रशांत क्षेत्र के देशों पर पकड़ बनाने की कोशिश क्या नाकाम हो गई है?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
Getty Images
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

3. रूस, भूराजनीतिक तनाव और मानवाधिकारों का मामला


यूक्रेन पर हमला करने के बाद से पश्चिमी देश रूस को वैश्विक स्तर पर आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने रूस पर ऐसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं जिनके बारे में पहले सुना नहीं की गया था.

इस युद्ध ने विदेशी निवेशकों को भी चिंता में डाल दिया है कि अगर शी जिंनपिंग ताइवान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान करने की घोषणा करते हैं, हॉन्ग कॉन्ग में बढ़ रहे चीन के विरोध को ताकत के इस्तेमाल से ख़त्म करने का फ़ैसला लेते हैं या फिर अपने पड़ोसियों के साथ सीमा को लेकर जारी तनाव को सेना के इस्तेमाल के ज़रिए सुलझाने की कोशिश करते हैं तो चीन में उनके निवेश का भविष्य क्या होगा.

दूसरी तरफ यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के हमले को लेकर चीन का रूस की तरफ खड़े दिखने से भी निवेशकों को मदद नहीं मिल रही.

इंवेस्टमेंट सर्विस एसपीआई ऐसेट मैनेजमेंट के मैनेजिंग पार्टनर स्टीफ़न्स इन्निस कहते हैं, "चीन के रूस के साथ संबंध को लेकर बाज़ार में चिंता है, इससे निवेशकों में डर है और यूक्रेन पर हमले के बाद से इसका असर दिखने लगा है."

हाल में ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में स्टीफ़न्स ने कहा था, "निवेशकों ने चीनी बॉन्ड्स बेचने शुरू कर दिया. हम खुश हैं कि हमने चीनी बॉन्ड्स नहीं खरीदे."

प्रोफ़ेसर रैलो बताते हैं कि अब धीरे-धीरे वैश्विक व्यापार भी क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ने लगा है, ख़ास कर दो इलाक़ों में यूरोप और अमेरिका के बीच और दूसरी तरफ रूस और चीन के बीच.

वो कहते हैं, "पश्चिमी मुल्कों की कंपनियां मानने लगी हैं कि दूसरे गुट के देशों के साथ व्यापार बढ़ाना उनके हितों के विपरीत जा सकता है. इसलिए वो उस बाज़ार को खोने के लिए तैयार हैं."

चीन की अर्थव्यवस्था
Getty Images
चीन की अर्थव्यवस्था

विश्लेषक निक मारो भी कहते हैं कि "अर्थव्यवस्था और राणनितीक तौर पर प्रतियोगिता के बीच चीन और पश्चिमी मुल्कों के बीच तनाव गहरा रहा है, साथ ही गणतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को लेकर भी चीन और पश्चिमी मुल्कों के बीच तीखी बयानबाज़ी चलती रही है."

इसका एक उदाहरण तब मिला जब दुनिया के सबसे बड़ा वेल्थ फंड मैनेजिंग कंपनी नॉर्वे की नॉर्जेस बैंक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट ने इस साल मार्च में खेल का सामान बनाने वाली चीन की कंपनी ली निंग के शेयर ये कहते हुए शामिल करने से इनकार कर दिया कि इसमें "बड़ा जोखिम है और इससे गंभीर रूप से मानवाधिकारों के उल्लंघन हो सकता है."

चीन के शिनजियांग प्रांत में तैयार होने वाले सूती कपड़े को दुनिया की सबसे बेहतरीन कपड़ों में शुमार किया जाता है. लेकिन मानवाधिकार एजेंसियों का कहना है कि इस कपड़े को तैयार करने वाले मजदूरों से जबर्दस्ती काम लिया जाता है.

इस मुददे को लेकर बीते साल पश्चिमी देशों के कुछ ब्रांड्स ने अपने सप्लाई चेन से शिनजियांग कॉटन को हटा दिया है. इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ये बड़ी बहस का मुद्दा रहा है और चीन की मशहूर हस्तियां और आम लोग इन पाबंदियों पर एतराज जताते रहे हैं.

जैक मा
Getty Images
जैक मा

4. निजी सेक्टर को लेकर नीति


चीन की अर्थव्यवस्था में उछाल और देश के भीतर विदेशी निवेश में हुई बढ़ोतरी के साथ-साथ चीन में अपने फ्री मार्केट और निजी कंपनियों के तरक्की को नज़र में रखते हुए सुधार लागू किए.

हालांकि निक मारो कहते हैं कि "इनसे दोनों निजी और विदेशी कंपनियों को फायदा हो सकता था लेकिन सुधारों का एजेंडा बीच में ही एक तरह से रुक गया."

वो कहते हैं कि "मौजूदा वक्त में कई सेक्टर में, ख़ास कर तकनीक के मामले में सरकारों का अपने व्यापार को सुरक्षा देने और हस्तक्षेप करने का ट्रेंड बढ़ रहा है. इसे लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील दी जा रही है."

आलोचक कहते हैं कि साल 2021 में चीन की सरकार ने कंट्रोल करने के इरादे से बड़ी तकनीकी कंपनियों पर अपना पंजा कसना शुरू किया. इससे अलीबाबा जैसी कंपनियों को बड़ा नुक़सान भी झेलना पड़ा.

नियमकों ने जो अभियान चलाया उसका सबसे अधिक असर जैक मा की कंपनी पर पड़ा. बीते साल अप्रैल में इस पर एंटीट्रस्ट के एक मामले में क़रीब 2.8 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया गया. चीन के इतिहास में ये जुर्माने के तौर पर सबसे बड़ी रकम है.

जानकार कहते हैं कि चीनी सरकार देश के भीतर राज्यों के हाथों में अधिक ताकत दे रही है जिससे आर्थिक विकास के रास्ते में लौटने की उसकी कोशिश की गति धीमी हो सकती है.

हाल में समाचार एजेंसी रॉयटर्स और ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी थी कि इस सेक्टर पर नीतियों के असर को लेकर सरकार गंभीर है और इसमें सुधार करने की कोशिशें की जा रही हैं. हालांकि अब तक सरकार ने आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई घोषणा नहीं की है.

अंतरिक्ष महाशक्ति बनने के लिए चीन किस योजना पर काम कर रहा है?

अमेरिका ने किया IPEF का एलान, भारत भी शामिल लेकिन कितना फायदा होगा?

शंघाई स्टॉक मार्केट
Getty Images
शंघाई स्टॉक मार्केट

5. बाज़ार, व्यापार और सरकार


हाल के महीनों में चीन का स्टॉक मार्केट भी निवेशकों को उनके निवेश का अधिक फायदा दे नहीं पाया है.

अप्रैल के आख़िर में शंघाई स्टॉक मार्केट बेहद निचले स्तर पर खुला, उसके बाद से इसमें थोड़ा उछाल ज़रूर आया लेकिन ये साल की शुरूआत के क़रीब कतई नहीं है. वहीं मई के महीने में चीनी मुद्रा युआन डॉलर के मुक़ाबले दो साल के अपने सबसे निचले स्तर पर थी.

हालांकि दूसरी तरफ, ये भी कहा जा सकता है कि चीनी बाज़ार में जो गिरावट देखी जा रही है, वो अमेरिका और यूरोप के दूसरे बाज़ारों में देखी जा रही गिरावट की तुलना में कम ही है. साल 2021 में ऊंचीई तक पहुंचने के बाद इन बाज़ारों में भी गिरावट दिखने लगी है.

पहली तिमाही की चीन का ट्रेड सरप्लस 200 अरब डॉलर से अधिक था. इसका एक कारण निर्यात में कमी भी था लेकिन फिर भी इससे देश के बाहर जाते विदेशी निवेश से हो रहे नुक़सान की कुछ भरपाई हो सकी.

इस मामले में इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल फाइनेंस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विदेशी निवेश के बाहर जाने से अभी चीन पर अधिक असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उसके पास निर्यात संबंधी अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा है.

इंस्टीट्यूट का कहना है कि देश में हो रहे विनिवेश की भी अपनी मुश्किलें और सीमाएं है. इंस्टीट्यूट के अनुसार, "हम देख रहे हैं कि बड़ी कंपनियां ये बाज़ार छोड़ना चाहती हैं, लेकिन हमें इसे पलायन नहीं समझना चाहिए. इनमें से कई कंपनियां दशकों तक चीन में काम करती रही हैं और उनके लिए इस बाज़ार को छोड़ कर जाने का फ़ैसला आसान नहीं होगा."

हाल में अपने संपादकीय में द इकोनॉमिस्ट में लिखा था कि इसी साल अक्तूबर में चीन के कम्यूनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन है. इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती गति को उछाल देने के लिए कई अहम फ़ैसले लिए जा सकते हैं जिनसे हो सकता है कि विदेशी निवेशकों को भी उम्मीद मिले.

पत्रिका ने लिखा, "इसे लेकर सकारात्मक नज़रिया ये है कि विचारधारा का मुश्किल दौर, राजनीतिक गड़बड़ियों और धीमे विकास का ये दौर हो सकता है कि पार्टी के अधिवेशन की तैयारी का हिस्सा हो. जब ये वक्त गुज़र जाएगा राजनीति पर नेताओं की पकड़ बढ़ेगी और ज़ीरो कोविड का दौर भी ख़त्म हो जाएगा, इसी के साथ अर्थव्यवस्था और तकनीक में फिर से विकास का दौर लौटेगा."

क्वाड सम्मेलन से पहले चीन फिर हुआ नाराज़, कर दी बड़ी भविष्यवाणी

ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका फिर आमने सामने, क्या है ये विवाद

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+