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पृथ्वी पर कहां से आया अथाह पानी? सूर्य की सौर हवाओं में मिला इस रहस्य का जवाब

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लंदन, 30 नवंबर। हमारी पृथ्वी पर 70 प्रतिशत पानी है और बाकी 30 प्रतिशत जंगल, मैदान, मरूस्थल व अन्य जमीन। हालांकि एक सच यह भी है कि इतना अधिक पानी होने के बावजूद हमारे पीने योग्य सिर्फ 3 प्रतिशत पानी है। इसमें से 2.4 प्रतिशत ग्लेशियरों और उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में जमा हुआ है, जबकि 0.6 फीसदी पानी ही नदियों, झीलों और तालाबों में है जिसे पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि हमारी धरती पर पानी कहां से आया?

सदियों पुराने रहस्य का हुआ खुलासा

सदियों पुराने रहस्य का हुआ खुलासा

'जल ही जीवन है' ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन ये जल (पानी) कहां से आया यह बड़ा रहस्य है। सदियों से चले आ रहे इस सवाल का जवाब अब मिल गया है, आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सहस्य का खुलासा सूर्य की सौर हवाओं ने किया है। जी हां, वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर महासागरों, समुद्र, ग्लेशियर और नदियों में मौजूद पानी की उत्पत्ति के पीछे सूर्य की सौर हवा की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी।

4.6 अरब साल पहले हुई थी टक्कर

4.6 अरब साल पहले हुई थी टक्कर

हम यह भी जानते हैं कि हमारी पृथ्वी जैसी आज है, वैसी करोड़ों साल पहले नहीं हुआ करती थी। पृथ्वी अपने जन्म के समय आग का गोला हुआ करती थी जो समय के साथ ठंडी होती गई। इसके बाद करीब 4.6 अरब साल पहले हमारे ग्रह पर आने वाले क्षुद्रग्रहों ने यहां पानी पहुंचाया और पृथ्वी को रहने योग्य बनाया, जैसा कि हम इसे आज देखते हैं। हालांकि उल्कापिंडों में पानी की संरचना पृथ्वी से बिल्कुल मेल नहीं खाती है।

सूरज की हवा पानी बनाने के पीछे जिम्मेदार

सूरज की हवा पानी बनाने के पीछे जिम्मेदार

हाल ही में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि पृथ्वी पर पानी की उत्पत्ति के पीछे सिर्फ क्षुद्रग्रह नहीं बल्कि एक और स्रोत रहा होगा। इस दूसरा स्रोत हमारा सूर्य है, जिसका चक्कर पृथ्वी लगाती है। एक स्टडी में पता लगाया कि कैसे सूरज की हवा धरती पर पानी पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों ने पानी के पीछे के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए कुछ उल्कापिंडों और एस्टेरॉयड्स के टुकड़ों पर रिसर्च किया।

करोड़ों साल पहले धरती पर ऐसे आया पानी

करोड़ों साल पहले धरती पर ऐसे आया पानी

करोड़ों साल पहले पानी से भरे उल्कापिंड और एस्टेरॉयड्स की टक्कर हमारी धरती से हुई। इस घटना की वजह से पानी पृथ्वी तक तो पहुंच गया लेकिन इसकी मात्रा बढ़ाने में सूर्य ने बड़ी भूमिका निभाई। उल्कापिंड से धरती पर पहुंचे पानी में हाइड्रोजन का भारी रूप ज्यादा था, इस पानी की रासायनिक संरचना वर्तमान में पृथ्वी पर मौजूद पानी की संरचना से बिल्कुल अगल थी। अंतरिक्ष से आए पानी में ड्यूटीरियम अधिक था, जिसे आसान भाषा में हाइड्रोजन का भारी रूप कहा जा सकता है।

आज भी अंतरिक्ष में हो सकते हैं पानी के उल्कापिंड

आज भी अंतरिक्ष में हो सकते हैं पानी के उल्कापिंड

इस खुलासे से यह भी पता चलता है कि आज भी अंतरिक्ष में ऐसे कई पानी से भरे उल्कापिंड तैर रहे हैं, लेकिन उनमें मौजूद पानी का रूप थोड़ा अलग होगा। पानी की उत्पत्ति को लेकर यह बड़ा खुलासा इंग्लैंड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के साइंसिट्स ल्यूक डेली और उनकी टीम ने किया है। स्टडी के मुताबिक धरती के बदलते मौसम से पानी की मात्रा को बढ़ने में मदद मिली। ल्यूक डेली ने जापानी स्पेसक्राफ्ट हायाबूसा द्वारा लाए गए एस्टेरॉयड्स की जांच की।

2010 में अंतरिक्ष से लाया गया था उल्कापिंड

2010 में अंतरिक्ष से लाया गया था उल्कापिंड

ये एस्टेरॉयड्स साल 2010 में अंतरिक्ष से धरती पर लाया गया था। इसका अध्ययन करने पर पता चला कि उसके टुकड़े पर कुछ ऐसे कण हैं जो सूर्य की सौर हवा के संपर्क में आने के बाद पानी में बदल गए। साइंसिट्स ल्यूक डेली की गणना के अनुसार एस्टेरॉयड ड्यूटीरियम से भरा पड़ा था और इसके मीटर क्यूब के टुकड़े से करीब 20 लीटर पानी निकल सकता है। यह स्टडी अंतरिक्ष में जीवन की खोज को और आसान बना सकती है।

क्या होती है सैर हवा?

क्या होती है सैर हवा?

सूरज से उठने वाली ऊंची-ऊंची लपटों को सौर हवा कहा जाता है, यह आमतौर पर हाइड्रोजन के आयन होते हैं। इस सौर हवा और एस्टेरॉयड के पत्थरों में मौजूद ऑक्सीजन के एटम के मिश्रण से पानी बनता है। पुराने रिसर्च में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि इटोकावा नाम के एस्टेरॉयड पर काफी ज्यादा पानी है। ल्यूक डेली कहते हैं कि जब अंतरिक्ष में जमा धूल पानी से भर गई तो वह धूल कण भारी होने लगे। इसके बाद वह किसी तरह आपस में मिलकर एस्टेरॉयड्स से बन गए। जब वह धरती से टकराए तो यहां सागरों का निर्माण हुआ।

यह भी पढ़ें: Video: नहाने का शौकीन है ये तोता! खुद से चलाया पानी का नल और लेने लगा 'शॉवर' के मजे

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English summary
Where on earth did the infinite water come from answer to this mystery found in solar winds of Sun
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