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'द ग्रेट गेम': जब काराकोरम बना था जासूसों का अड्डा, भारतीय हिस्से पर क़ब्ज़े के लिए रूस और ब्रिटेन का संघर्ष

By असद अली

काराकोरम
BBC
काराकोरम

भारतीय फ़ौजी इंटेलिजेंस के पूर्व चीफ़ जनरल (रिटायर्ड) अमरजीत बेदी ने लद्दाख़ के क्षेत्र में भारत और चीन के फ़ौजी तनाव की पृष्ठभूमि में हाल ही में कहा था कि भारत को अपनी ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका की समीक्षा करनी चाहिए और चीन के साथ तनाव ख़त्म होने के बाद उन्हें ठीक किया जाना चाहिए.

याद रहे कि जिन पहाड़ी श्रृंखलाओ में आज चीन और भारत आमने-सामने हैं वहां पहली बार बड़ी वैश्विक ताक़तें आमने सामने नहीं आई हैं. पहले भी ये क्षेत्र रूस, चीन और ब्रिटिश भारत के बीच एक बड़ा संघर्ष देख चुका है.

आज, मानवीय साहस, क्षमता और बुद्धिमत्ता के साथ-साथ विज्ञान और आधुनिक उपकरणों की पहुंच भी जासूसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन वैज्ञानिक खोजों के युग से पहले, उस समय स्थिति बहुत अलग थी.

इसकी एक झलक देखने के लिए हिमालय, काराकोरम, हिन्दुकुश और पामेर की ही पहाड़ी श्रृंखलाओं में चलते हैं लेकिन आज से दो सौ साल पहले.

19वीं सदी के शुरू में जानवरों का एक अँग्रेज़ डॉक्टर तिब्बत पहुंचा. कहा जाता है कि डॉक्टर विलियम मूर क्राफ्ट से पहले इस क्षेत्र से सन 1715 में दो यूरोपीय पादरी गुज़रे थे.

सन 1808 में ब्रिटेन से भारत आने वाले डॉक्टर मूर क्राफ्ट, ईस्ट इण्डिया कंपनी के लिए ऊंची नस्ल के घोड़ों की तलाश में थे और उनका मानना था कि तिब्बत और इससे उत्तर में उन्हें ऐसे जानवर मिल जायेंगे जो भारत में कंपनी के काम आएंगे.

हिमालय के दर्रों के पार इस बर्फीले क्षेत्र में अपने दूसरे या तीसरे दौरे पर डॉक्टर मूर क्राफ्ट एक तिब्बती अधिकारी के घर में मौजूद थे. उनके लिए हर चीज़ नई थी लेकिन जिस चीज़ ने उन्हें हैरान कर दिया वो थी वहां दो यूरोपीय नस्ल के कुत्तों का मौजूद होना.

कुत्तों ने जब उनके फ़ौजी इशारों को समझने का सबूत दिया तो मूर क्राफ्ट ने सोचा इसका एक ही मतलब हो सकता है कि ये कुत्ते पहले किसी फ़ौजी के पास थे.लेकिन वो फ़ौजी कौन था और ये कुत्ते इस क्षेत्र में कैसे पहुंचे थे? उनके कानों में ख़तरे की घंटियां बज उठीं.

पीटर हॉपकिर्क अपनी किताब 'द ग्रेट गेम: द स्ट्रगल फॉर एम्पॉयर इन सेन्ट्रल एशिया' में लिखते हैं कि मूर क्राफ्ट के अनुसार इसका एक ही मतलब था कि कोई रूसी भी इस क्षेत्र में पहुंच चुका था. गांव वालों से पूछताछ से पता चला कि उन्हें ये कुत्ते किसी रूसी व्यापारी से मिले थे, लेकिन मूर क्राफ्ट को विश्वास था कि रूसी तो होगा लेकिन वो व्यापारी बिलकुल नहीं था.

'द ग्रेट गेम'

क्षेत्र में किसी रूसी के मौजूद होने की संभावना से इस ब्रिटिश डॉक्टर को अपनी पुरानी आशंकाओं के सही होने का सबूत मिल गया कि रूस किसी न किसी तरह उत्तर पश्चिम के रास्ते हमला करके भारत को ब्रिटेन से छीनना चाहता है.

इन दो कुत्तों का मालिक वो रूसी कौन था और क्या वो अकेला था? क्या मूर क्राफ्ट का इस क्षेत्र में आने का मक़सद सिर्फ घोड़े खरीदना था? रूसी साम्राज्य अपने एजेंट यहां क्यों भेज रहा था और ब्रिटेन के लिए इसमें परेशानी की क्या बात थी? इन सब बातों के महत्त्व को समझने के लिए क्षेत्र की आज की स्थिति को संक्षेप में समझना ज़रूरी है.

रूसी और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इन पहाड़ों में किसी मुहीम के शुरू होने से पहले या किसी संभावित हमले को रोकने के लिए सूचना का ज़रिया थे विलियम मूर क्राफ्ट और उन्हें मिलने वाले यूरोपीय नस्ल के कुत्तों के रूसी मालिक जैसे बहुत से नौजवान अफ़सर.

इन अफ़सरों और एजेंट्स ने अपने जीवन के कई साल हिमालय, काराकोरम, पामेर जैसी पहाड़ी श्रृंखलाओं और इस क्षेत्र के रेगिस्तानों में भेस बदल कर घुमते हुए बिता दिए.

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पीटर हॉपकिर्क अपनी किताब में लिखते हैं कि रूस और ब्रिटिश साम्राज्य के एशिया में इस संघर्ष को 'ग्रेट गेम' का नाम भी एक ऐसे ही नौजवान ब्रिटिश फ़ौजी /जासूस ने दिया था जो खुद भी मध्य एशिया के एक राज्य में इसी 'ग्रेट गेम' का शिकार हो कर जान से हाथ धो बैठा था. उस नौजवान अफ़सर का ज़िक्र आगे चल कर करेंगे.

रूस में कई पीढ़ियों से मध्य एशिया और इसके पार के इलाक़ों में दौलत की रेल पेल की कहानिया पहुंच रही थीं और एक ताक़तवर साम्राज्य बनने के बाद अब वो उनकी असलियत जानने के अलावा इस क्षेत्र के व्यापार में भी हिस्सा चाहता था.

दूसरी तरफ़ भारत में बहुत से ब्रिटिश अधिकारियों को ये शंका होनी शुरू हो गई थी कि उत्तर में ऊंचे पहाड़ों के बावजूद रूस वहां पहुंचने की कोशिश ज़रूर करेगा.

पीटर हॉपकिर्क ने अपनी किताब में लिखा है कि जिस बड़ी बिसात पर राजनीतिक वर्चस्व की ये रहस्यमय लड़ाई लड़ी गई पश्चिम में माउंट एवरेस्ट की बर्फ से ढंकी चोटियों से लेकर मध्य एशिया के रेगिस्तानों और पहाड़ी श्रृंखलाओं से होती हुई पूर्व में चीनी तुर्किस्तान और तिब्बत तक फैली हुई थी.और इस खेल का टारगेट कम से कम लंदन और कलकत्ता में बैठे ब्रिटिश अधिकारीयों के दिमाग में और एशिया में तैनात रूसी अफ़सरों के मन में सिर्फ एक था: 'ब्रिटिश इंडिया'.

इस विश्लेषण के बाद, कहानी का रुख़ एक बार फिर विलियम मूर क्राफ्ट और उसके प्रतिद्वंद्वी रूसी जासूसों की ओर करते है.

तिब्बत वाले रूसी कपड़ा पहनेंगे या ब्रिटिश

तिब्बत
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तिब्बत

विलियम मूर क्राफ्ट को जब तिब्बत में रूसी फ़ौजियों की मौजूदगी का शक हुआ तो उसके बाद सन 1825 में अपनी मौत तक वो कलकत्ता में अपने अधिकारीयों को मध्य एशिया में रूस के इरादों के बारे में पत्र लिखकर सूचित करते रहे.

किताब 'द ग्रेट गेम' के अनुसार उन्होंने एक जगह लिखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी को निर्णय लेना है कि "तुर्किस्तान और तिब्बत के लोग रूस के कपड़े पहनेंगे या ब्रिटिश के और बर्मिंघम में बने हुए लोहे और स्टील के औज़ार खरीदेंगे या सेंट पीटर्सबर्ग में."

सन 1819 में मूर क्राफ्ट की दृढ़ता काम कर गई और उन्हें मध्य एशिया में बुख़ारा तक दो हज़ार मील की यात्रा के लिए ग्रांट मिल गई. लेकिन इस दौरे के दौरान पकड़े जाने या रूस की तरफ़ से विरोध की स्थिति में सरकार उनके संबंध से इंकार कर सकती थी.

अब उनके मिशन के रास्ते में एक और मुश्किल थी. बुख़ारा तक का सीधा रास्ता अफ़ग़ानिस्तान से हो कर गुज़रता था जो उस समय गंभीर रूप से गृह युद्ध की चपेट में था.

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हॉपकिर्क लिखते हैं कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को बाई-पास करते हुए उत्तर चीनी तुर्किस्तान में काशगर होते हुए बुख़ारा जाने का फैसला किया और उसके लिए पहले लद्दाख में लेह जाना ज़रूरी था.

किताब के अनुसार वो सितंबर सन 1820 में लेह पहुंचे और वो इस क्षेत्र में आने वाले पहले ब्रिटिश थे. उन्होंने आते ही काराकोरम के पार यारकंद में चीनी शासकों से संपर्क की कोशिशें शुरू कर दीं. लेकिन उन्हें जल्दी अंदाज़ा हो गया कि ये काम इतना आसान नहीं है.

पहली बात तो ये थी कि यारकंद लेह से 300 मील दूर था और रास्ते में विश्व के सबसे कठिन पहाड़ी रास्ते थे जवाब आने में कई महीने लग सकते थे. दूसरा ये कि स्थानीय व्यापारी जो कई पीढ़ियों से वहां व्यापार कर रहे थे और जिन का लेह यारकंद रूट पर एकाधिकार था, ईस्ट इण्डिया कंपनी के आने से बिलकुल खुश नहीं थे.

मूर क्राफ्ट ने उनमे से कुछ को कंपनी का एजेंट बनाने की भी कोशिश की लेकिन वो खुश नहीं थे और किताब 'द ग्रेट गेम' के अनुसार बाद में ब्रिटेन को पता चला कि उन व्यापारियों ने चीनियों से कहा था कि जैसे ही कंपनी के एजेंटों को इस रास्ते से गुज़रने की इजाज़त मिलेगी वो अपनी फ़ौज ले कर आ जायेंगे.

लेह में भी रूसी एजेंट बाज़ी ले गया

लेह
AFP
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मूर क्राफ्ट को अभी लेह में ज़्यादा समय नहीं बीता था कि उनकी बड़ी आशंका तिब्बत की तरह यहां भी सही साबित हो गई. एक रूसी एजेंट पहले ही क्षेत्र में क़दम जमा चुका था.

ज़ाहिरी तौर पर तो वो एक व्यापारी था लेकिन जल्दी ही मूर क्राफ्ट को पता चला कि वो व्यक्ति आग़ा मेहदी,असल में रूस का ख़ास एजेंट था जो (लगभग साढ़े चार हज़ार किलो मीटर दूर) सेंट पीटर्सबर्ग में अपने आकाओं के लिए अहम व्यापारिक और राजनीतिक मिशन अंजाम देता था.

आग़ा मेहदी उर्फ़ महकती राफिलोव कौन था?

पीटर हॉपकिर्क ने लिखा है कि आग़ा मेहदी ने एक आम कुली के तौर पर इस क्षेत्र में काम शुरू किया था और जल्दी ही वो अपनी खूबसूरती की वजह से पूरे एशिया में मशहूर कश्मीरी शॉलों के व्यापारी बन गए और उन्हीं शॉलों का व्यापार करते करते वो सेंट पीटर्सबर्ग पहुंच गए.

"सेंट पीटर्सबर्ग में उनकी कश्मीरी शॉलों ने रूस के शासक 'ज़ार एलेक्ज़ेंडर' का ध्यान आकर्षित किया फिर उन्होंने उस कमाल के व्यापारी से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की."

यहां एक दिलचस्प घटना घटी. ज़ार एलेक्ज़ेंडर ने आग़ा मेहदी को लद्दाख और कश्मीर के साथ व्यापारिक संबंध बनाये रखने के निर्देश के साथ वापिस भेज दिया. "वो इसमें कामयाब रहे और अब कुछ रूसी चीज़ें उन क्षेत्रों के बाज़ारों में दिखने लगी."

किताब 'द ग्रेट गेम' में लिखा है कि जब वो दोबारा सेंट पीटर्सबर्ग गए तो ज़ार ने उन्हें एक चेन और सोने के मैडल के साथ रूसी नाम भी दिया : महकती राफिलोव

रूस का, महाराजा रणजीत सिंह के लिए संदेश

रूस के ज़ार महाराजा रणजीति सिंह के साथ व्यापार करना चाहते थे
Getty Images
रूस के ज़ार महाराजा रणजीति सिंह के साथ व्यापार करना चाहते थे

लेकिन इस बार आग़ा मेहदी उर्फ़ महकती राफिलोव को एक नए और राजनीतिक मिशन के साथ रूस से वापस भेजा गया. उनकी मंज़िल अब लद्दाख और कश्मीर से सैकड़ों मील दक्षिण में पंजाब राज्य में महाराजा रणजीत सिंह का दरबार था.

हॉपकिर्क लिखते हैं की उन्हें महाराजा रणजीत सिंह के साथ दोस्ताना संबंध स्थापित करने के निर्देश दिए गए थे. "उनके पास ज़ार का एक परिचय पत्र था जिस पर रूस के विदेश मंत्री के हस्ताक्षर थे. उसमें रूस की तरफ़ से रणजीत सिंह के व्यापारियों के साथ व्यापर करने की इच्छा व्यक्त की गई थी और लिखा था उनका रूस में स्वागत किया जायेगा."

किताब के अनुसार ब्रिटिश डॉक्टर मूर क्राफ्ट को जल्दी ही इस बात का पता चल गया था. उन्हें आभास हो गया था कि आग़ा मेहदी में वो सभी योगयताएं थी जो उनके मिशन के लिए अहम थी मिसाल के तौर पर स्थानीय इलाक़े की जानकारी और लोगों में पसंद किया जाना और व्यापारिक बुद्धि.

हॉपकिर्क लिखते है कि मूर क्राफ्ट ने ये सभी जानकारी ग्यारह सौ मील दूर दक्षिण में अपने अधिकारीयों को लिखने में देर नहीं की. लेकिन आग़ा मेहदी की कहानी अचानक काराकोरम के ऊंचे ऊंचे दर्रों में, उनकी मौत के साथ, महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचने से पहले ख़त्म हो गई. उनकी मौत कैसे हुई ये कभी साफ़ नहीं हो सका.

हालांकि हॉपकिर्क ने अपनी किताब में लिखा है कि मूर क्राफ्ट ने लंदन अपने एक दोस्त को पत्र में कहा था कि "अगर राफिलोव कुछ देर और ज़िंदा रह जाता तो वो एशिया में ऐसी स्थिति पैदा कर देता कि यूरोप में कुछ कैबिनेट हैरान रह जाती."

जैसे आग़ा मेहदी ने रूसी साम्राज्य के लिए सेवाएं दीं उसी तरह से रूसी फ़ौजी अफ़सर भी भारत और अफ़ग़ानिस्तान तक जाने वाले रास्तों को समझने के लिए मुहिमों का हिस्सा बने.

रूसी अफ़सर तुर्क के भेष में जॉर्जिया से खैवा कैसे पहुंचा?

सन 1819 में जॉर्जिया में रूसी फ़ौज के मुख्य दफ्तर में तैनात एक 24 वर्षीय रूसी फ़ौजी अफ़सर निकोलाई मरावी इव एक मिशन के लिए रवाना हुआ जो बहुत से लोगों के लिए शायद 'आत्महत्या' के बराबर था. मरावी इव का मिशन एक तुर्क का वेश बदल कर पूर्व में सुनसान मैदानों और समुन्द्र पार आठ सौ मील दूर खेवा में था.

रास्ते में एक रेगिस्तान तो था ही लेकिन अपहरण करके गुलाम के तौर पर बेचे जाने या लुटेरों के हत्थे चढ़ जाने का ख़तरा भी था. उसका उद्देश्य मध्य एशियाई राज्य के ख़ान को शांत करना और भविष्य के संभावित रूसी आक्रमण के लिए परिस्थितियां बनाना था.

उनके काम में उनके ब्रिटिश समकक्षों की तरह क्षेत्र के भूगोल और रक्षा क्षमताओं के बारे में जानकारी इकठ्ठा करना और क्षेत्र की दौलत के बारे में मशहूर कहानियों की असलियत पता करना भी था.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि उनके मिशन उन रूसियों की स्थिति पता करना भी था जिन्हें बड़ी संख्या में अपहरण करके गुलाम बना कर उन इलाक़ों में बेच दिया गया था. इस बारे में उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी ने रूस को भविष्य में मध्य एशिया की मुस्लिम रियासतों में फ़ौजी कार्रवाइयों का सही कारण दे दिया था.

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किताब 'द ग्रेट गेम' में लिखा है कि नाकामी या पकड़े जाने की स्थीति में उस नौजवान अफ़सर को पता था कि उनका साम्राज्य उनसे संबंध होने से मना कर देगा.

जिस तरह ब्रिटिश डॉक्टर विलियम मूर क्राफ्ट उत्तरी पहाड़ी श्रृंखलाओं में एक्टिव थे कुछ ब्रिटिश अधिकारी दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान की रेकी में व्यस्त थे.

बम्बई से हेरात और फ़ारस नोशकी के रास्ते: दो ब्रिटिश एजेंट्स की हज़ारों मील की यात्रा

द ग्रेट गेम में लिखा है कि पांचवें बम्बई नेटो इन्फेंट्री के कैप्टन चार्ल्स क्रिस्टी और लेफ्टिनेंट हैनरी पोटिंगर सन 1810 में जासूसी के मिशन पर भेष बदल कर बलूचिस्तान के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के लिए रवाना हुए. वो इस बारे में खुश क़िस्मत थे कि उस क्षेत्र में लोगों ने कभी पहले कोई यूरोपीय नहीं देखा था.

पोटिंगर बम्बई से रवाना होने के चार महीने बाद हेरात में दाखिल हुए. उनके 20 वर्षीय साथी पोटिंगर की मंज़िल नौ सौ मील दूर फ़ारस में थी. उनके रास्ते में दो बड़े रेगिस्तान थे और इस यात्रा में उन्हें तीन महीने लगे.

किताब 'द ग्रेट गेम' में लिखा है कि पश्चिम के रास्ते भारत पर किसी हमले के डर से ब्रिटिश के लिए हेरात का बहुत अधिक महत्व था ये शहर पश्चिम से भारत आने वाले विजेताओं के रास्ते में था. यहां से कोई भी फ़ौज ख़ैबर या बोलान पास के ज़रिये भारत में दाखिल हो सकती थी.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि लंबे चौड़े रेगिस्तान और मुश्किल पहाड़ों के बीच में ये शहर एक उपजाऊ घाटी में था जिसके बारे में कहा जाता था कि यहां एक पूरी फ़ौज के लिए पानी और खाना मौजूद था. क्रिस्टी का काम इस बात की पुष्टि करना था.

उन्होंने लिखा है कि क्रिस्टी बम्बई से रवाना होने के चार महीने बाद शहर के केंद्रीय द्वार में दाखिल हुए. वो एक मुसलमान धार्मिक व्यक्ति का भेष छोड़ कर अब एक व्यापारी के रूप में थे जो घोड़े ख़रीदने के लिए निकला था.क्योंकि उनके दस्तावेज़ों में यही लिखा था.

वो एक महीना वहां रहे और बहुत बारीकी से शहर के बारे में नोट्स लिए. हॉपकिर्क ने लिखा है कि बलूचिस्तान से रवाना होने के बाद क्रिस्टी ने 2250 मील की यात्रा की थी जबकि पोटिंगर ने 2400 मील से अधिक यात्रा की थी.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि उन दोनों अफ़सरों के काम में रास्ते के हर गांव और बस्ती की डिटेल नोट करना, हर कुएं और तालाब का ज़िक्र और सुरक्षात्मक नज़रिये से अहम स्थानों को दर्ज करना था. इन अफ़सरों ने रास्ते में मिलने वाले क़बीलों और उनकी ज़िन्दगी के हालात के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठी की.

जब नेपोलियन ने रूस के ज़ार को भारत पर हमले का आइडिया दिया

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किताब हिमालयन बैटल ग्राउंड में इतिहासकार लिखते हैं कि भारत की दौलत की चकाचौंध कई बार आक्रमणकारियों को खींच कर यहां ला चुकी थी और इस इलाक़े के लोगों ने लगातार हमलों के खौफ़ में रहना सीख लिया था.

इतिहासकार लिखते हैं कि ब्रिटेन का भारत के उत्तर पश्चिम में अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बढ़ोतरी और अपने साम्राज्य की सीमाओं को फैलाने के दौरान उत्तर से दक्षिण की तरफ़ पश्चिमी तुर्किस्तान की रियासतों की तरफ़ बढ़ते हुए रूसी साम्राज्य से सामना हुआ.

"इन दो बड़ी शक्तियों के बीच टकराव को टालना मुश्किल लगने लगा और एक दूसरे के इरादों के बारे में शक ने स्थिति को और भी ख़तरनाक बना दिया ."

हॉपकिर्क लिखते हैं कि सन 1807 में लंदन में उस समय ख़तरे की घंटियां बज उठी थीं जब ख़बर पहुंची कि फ़्रांस के शासक नेपोलियन बोनापार्ट ने रूस के ज़ार एलेक्ज़ेंडर प्रथम को साथ मिल कर भारत पर हमला करने के लिए कहा है. हालांकि जल्दी ही दोनों में मतभेदों की वजह से बात आगे नहीं बढ़ सकी.

जब रूस ने सोचा मुसलामानों से मुग़लिया सल्तनत को बनाने का वादा किया जाये?

किताब 'द ग्रेट गेम में' लिखा है कि पीटर द ग्रेट पहले रूसी ज़ार थे जिनकी नज़र भारत की तरफ़ गई थी. उनके ज़माने में मध्य एशिया में ऑक्सिस नदी के पार सोने के बड़े भंडार की ख़बर आती थी. उन्होंने रूसी पर्यटकों से भारत के बारे में सुन रखा था कि मध्य एशिया की रियासतों के पार यह देश दौलत से मालामाल है.

उन्होंने अपनी जिंदगी में कैस्पियन सागर के पार संबंध बढ़ाने के लिए खेवा की तरफ़ एक मिशन भी रवाना किया लेकिन वो नाकाम रहा.

ज़ार पीटर दी ग्रेट की मौत के कुछ समय के बाद सन 1725 में रूस में एक कहानी चलने लगी कि इनके महान बादशाह ने मरते समय वसीयत की थी कि उनके बाद आने वाले शासक रूस को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाएंगे और इतिहासकारों के अनुसार इस सपने को पूरा करने की दो चाबियां थीं: भारत और कुस्तुंतुनिया (आज का इस्तांबुल). इस कहानी के अनुसार उन्होंने अपने बाद आने वालों को आदेश दिया था कि जब तक इसे हासिल न कर लें तब तक उनका काम ख़त्म नहीं होगा.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि पीटर द ग्रेट के लगभग 40 साल बाद कैथरीन दी ग्रेट का ज़माना शुरू हुआ और उसने एक बार भारत में दिलचस्पी दिखाना शुरू कर दी जहां ईस्ट इंडिया कंपनी अब अपने क़दम जमा रही थी.

कहा जाता है कि सन 1791 में अपने दौर के अंत में कैथरीन ने भारत में दिलचस्पी दिखाई थी और शायद उसकी योजना उन्हें शायद एक फ्रांसीसी ने पेश की थी. इस फ्रांसीसी ने कैथरीन को सलाह दी कि बुख़ारा और काबुल के रास्ते यह कहते हुए आगे बढ़ें कि वो मुग़लिया सल्तनत को फिर से स्थापित करना चाहती हैं. हालांकि उनके एक उच्च अधिकारी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया.

ये अगली सदी में भारत पर रूस के हमले की बहुत सी योजनाओं के सिलसिले की पहली कड़ी थी.

और ग्रेट गेम शुरू हो गया

इतिहासकार लिखते हैं 19वीं सदी में रूस के हमले का ख़तरा बहुत यक़ीनी था.

"लगभग 4 सदियों से रूस 55 वर्ग मील प्रतिदिन या 20 हज़ार मील वार्षिक के एवरेज से पूर्व की तरफ़ बढ़ता जा रहा था. 19वीं सदी के शुरू में एशिया में रूस और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच दो हज़ार मील की दूरी थी जो कि सदी के अंत तक कम होकर कुछ ही सौ मील रह गई थी और पामेर के कुछ क्षेत्रों में तो यह दूरी 20 मील थी."

इतिहासकारों के अनुसार 19वीं सदी के मध्य तक शाहराह रेशम के एतिहासिक शहर एक-एक करके रूस के कब्ज़े में जा रहे थे. सन 1865 में ताशकंद भी रूस ने जीत लिया था. अगले 3 सालों में समरकंद बुख़ारा भी ज़ार के साम्राज्य का हिस्सा बन चुके थे.

ब्रिटेन ने सोचा था कि ऊंचे ऊंचे हिन्दूकुश और पामेर पहाड़ी श्रृंखला उनके क्षेत्रों को हमेशा रूस के हमले से सुरक्षित रखेंगी और यही उनकी सबसे बड़ी समस्या थी.

किताब 'हिमालयन बैटल ग्राउंड: सायनो इंडिया राइवलरी इन लद्दाख' (हिमालयाई मैदान ए जंग: लद्दाख में इंडिया चीन दुश्मनी) में लिखा है कि इन पहाड़ी श्रृंखलाओं में घूमते फिरते ब्रिटिश एजेंट्स की सब 'अच्छा है' की रिपोर्ट में भी साम्राज्य के सुरक्षित होने के इस आभास को मज़बूती दी. इन एजेंटस का काम मुश्किल भरे पहाड़ों में छिपे हुए ऐसे संभावित रास्तों को तलाश करना था जहां से रूस भारत में दाख़िल हो सकता था.

किताब में लिखा है कि ऐसे ही एक ब्रिटिश अधिकारी थॉमस गॉर्डन जिन्होंने सन 1873 में आमेर की पहाड़ी श्रृंखला में समय बिताया था लिखा कि पूर्वी (या चीनी) तुर्किस्तान और लद्दाख के बीच ऊंचे ऊंचे पहाड़ किसी भी नई फ़ौज को उस तरफ़ नहीं आने देगी लेकिन पामेर और गिलगित और चितराल में दर्रों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

'हिमालयन बैटल ग्राउंड' के अनुसार उसी तरह की एक रिपोर्ट सर हैनरी रॉलिंसन ने सन 1876 में लिखी थी कि "मैं सोचता हूँ इस रास्ते से रूस के साथ टकराव का ज़रा भी ख़तरा नहीं.... उन दूसरे रास्तों के होते हुए कोई भी फ़ौज कभी भी.... काराकोरम से पंजाब तक फैले हुए इन पहाड़ों के रास्ते आने की कोशिश नहीं करेंगी जहां एक के बाद एक 15 से 19 हज़ार फिट ऊंचाई वाले दर्रे हैं."

"भारत के उत्तर पश्चिम में ये क्षेत्र सबसे अधिक मुश्किल भरे हैं और यही वजह इस क्षेत्र में दो बड़े साम्राज्यों के टकराव की संभावना बहुत कम है."

लेकिन इतिहासकार लिखते हैं कि सन 1885 में रूस की मध्य एशिया में कार्रवाई ने ब्रिटेन को कश्मीर के रास्ते रूस के संभावित हमले के बारे में होशियार कर दिया.

फिर सन 1888 में जब एक ब्रिटिश अधिकारी एलग्रेन डूरंड ने हन्ज़ा से वापसी पर लाहौर आकर रिपोर्ट दी कि उन्होंने गिलगित से गुज़रते हुए सुना था कि एक रूसी अफ़सर हन्ज़ा में देखा गया है. इसकी सूचना बिलकुल सही थी.

ये रूसी अफ़सर कैप्टन ग्रोमिचोस्की था जो पामेर की पहाड़ी श्रृंखला और पूर्वी तुर्किस्तान के बीच रास्ता ढूंढने में कामयाब हो गया था.

और यूं फिर जैसा कि डूरंड ने कहा "खेल शुरू हो गया"

हन्ज़ा के इलाक़े में ख़ुफ़िया पहाड़ी रास्ते की तलाश जहां से डाकू आते थे

गिलगित
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रूसी कैप्टन ग्रोमिचोस्की का हन्ज़ा में आना और उनके ज़रिये हन्ज़ा के शासकों का रूस के क़रीब होने की संभावना तो ब्रिटेन के लिए चिंता की वजह थी ही इसके साथ एक और बड़ी समस्या भी थी: हन्ज़ा में एक ख़ुफ़िया पहाड़ी दर्रा, जहां से लेह यारकंद रुट पर हमला किया जा सकता था.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि सालों से आक्रमणकारी इस ख़ुफ़िया दर्रे से आकर लेह और यारकंद के बीच यात्रा करने वाले व्यापारियों को लूट कर ख़ुफ़िया रास्ते से ग़ायब हो जाते थे.

"ये न सिर्फ ब्रिटिश एशिया में वहां जो थोड़ा बहुत व्यापार होता था उसका गला घोंटने के बराबर था बल्कि भारत की सुरक्षा की ज़िम्मेदारों का मानना था कि अगर लुटेरे ये रास्ता इस्तेमाल कर सकते हैं तो कल को रूस भी इसी रास्ते से आ सकता है."

कलकत्ता में ब्रिटेन ने इस ख़ुफ़िया दर्रे को तलाश करने का फैसला कर लिया और इसकी ज़िम्मेदारी कैप्टन यंगहस्बेंड को सौंपी गई. जिन्हें पहले ही चीन से एक नए रास्ते से भारत तक का 1200 मील की यात्रा करने के बाद काफी शोहरत मिल चुकी थी.

ब्रिटिश फौजी अफ़सर ने रूसी कैप्टन के नक़्शे पर क्या देखा

यंगहस्बेंड आठ अगस्त 1889 को कश्मीरी और गोरखा सिपाहियों के एक ग्रुप के साथ लेह से काराकोरम पास के ज़रिये एक दूर बसे गांव शहीदुल्लाह की तरफ़ रवाना हुए.

बारह हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर इस गांव में ज़्यादातर व्यापारी रहते थे जो लेह यारकंद रूट पर अक्सर यात्रा करते थे. वो उन व्यापारियों से उस ख़ुफ़िया रास्ते (शमशाल पास) के बारे में पता करना चाह रहे थे.

उन्हें उस गांव तक पहुंचने में 15 दिन लगे थे. वहां लोगों ने बताया कि चीनी अधिकारी उनकी लुटेरों के बारे में की गई शिकायत पर ध्यान नहीं देते क्योंकि वो भारत और सिंक्यांग के बीच व्यापार के हक़ में नहीं थे क्योंकि इससे उनका अपना चाय का व्यापर प्रभावित होता था.

यंगहस्बेंड उस गांव से शमशाल पास के बारे में जानकारी प्राप्त करके रवाना हुए और 41 दिन के बाद एक बहुत मुश्किल रास्ते से गुज़रकर उस क़िले तक पहुंचे जो डाकुओं का ठिकाना था और जहां से उस ख़ुफ़िया रास्ते शमशाल पास पर नज़र रखी जाती थी.

क़िले में लोगों से बातचीत करके उन्हें अंदाज़ा हुआ कि ये लोग किसी के कहने पर लेह यारकंद पर काफिले लूटते हैं.

इसी दौरान एक दिलचस्प घटना घटी. कैप्टन यंगहस्बेंड को सूचना मिली कि रूसी कैप्टन ग्रोमिचोस्की क्षेत्र में वापस आ चुके हैं और उन्होंने उनसे मिलने की इच्छा भी ज़ाहिर की है.

कैप्टन यंगहस्बेंड ने बाद में इस मुलाक़ात के बारे में लिखा भी था. रूसी मेज़बानों ने उस रात पहाड़ों में अच्छा खाना पेश किया और खूब वोदका पी गई.

ब्रिटिश कैप्टन ने रूसी अफ़सर के नक़्शे पर पहाड़ी श्रृंखला पामेर में एक रास्ते पर लाल निशान लगा हुआ देखा. "अब इस बात में कोई शक़ बाक़ी नहीं रह गया था कि रूस इस सुनसान क्षेत्र के बारे में जनता है जहां रूस, अफ़ग़ानिस्तान, चीन और ब्रिटिश भारत मिलते हैं."

हॉपकिर्क लिखते हैं कि ग्रोमिचोस्की ने ब्रिटिश अफ़सर को साफ कर दिया कि रूस की फ़ौज में अफ़सरों और जवानों को एक ही चीज़ का इन्तिज़ार है और वो हैं भारत पर मार्च का आदेश.

दो विरोधी साम्राज्यों के अफ़सरों ने उन ऊंची बर्फ से ढकी चोटियों में अपनी सरकारों की नीतियों का बचाव किया, एक दूसरे के इरादों को समझने की कोशिश की, बातों बातों में एक दूसरे से जानकारी निकलवाने की भी कोशिश की. तीन दिन एक साथ बिताने के बाद वो अपने अपने ख़ुफ़िया मिशन पर रवाना हो गए.

लेकिन ये दोनों के बीच अंतिम संपर्क नहीं था. सालों बाद यंगहस्बेंड को अपने पुराने दुश्मन का पत्र मिला.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि ग्रोमिचोस्की ने इस पत्र में बताया कि कैसे वो जनरल के पद तक पहुंचा और फिर 1917 की क्रांति के बाद उनसे सब कुछ छीनकर उन्हें साइबेरिया में क़ैद कर दिया गया. वो वहां से फ़रार होने में कामयाब होने के बाद पोलेंड पहुंच गए जहां वास्तव में उनका परिवार था.

ग्रोमिचोस्की ने अपनी मुहिमों के बारे में अपनी किताब भी पत्र के साथ यंगहस्बेंड को भेजी थी जिसे ब्रिटेन में बहुत से सम्मान और इनाम दिए जा चुके थे.

रूस, ब्रिटेन और चीन की इस 'ग्रेट गेम' में बहुत से अधिकारी, सिपाही और एजेंट्स शामिल थे और जो इस काम में मारे भी गए.

बुख़ारा में दो ब्रिटिश अफ़सरों की मौत

बुख़ारा
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हॉपकिर्क ने अपनी किताब में विस्तार से दो ब्रिटिश अधिकारियों कर्नल चार्ल्स स्टोडार्ट और कैप्टन आर्थर कोनोली की बुख़ारा में मौत की डिटेल बताई है. ये घटना 1842 में घटी थी.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि दोनों अफ़सर जो ब्रिटेन में अपने घर से लगभग चार हज़ार मील दूर थे कई महीनों से स्थानीय शासक की क़ैद में थे. दोनों इस बड़े संघर्ष का हिस्सा बनने की क़ीमत चुका रहे थे जिसे 'द ग्रेट गेम' का नाम दिया गया था.

उन्होंने लिखा है कि उन दोनों को ईस्ट इण्डिया कंपनी ने बुख़ारा के साथ रूस के ख़िलाफ गठबंधन में अपने साथ मिलाने के लिए भेजा था.

हॉपकिर्क लिखते हैं, "स्थिति ये थी कि ये कर्नल ही थे जिन्होंने पहली बार ग्रेट गेम नाम दिया था.... कई साल बाद में (रुडयार्ड) किपलिंग ने अपने उपन्यास किम के ज़रिये इसे मशहूर किया था."

द ग्रेट गेम ख़त्म कैसे हुआ?

सन 1905 दिसंबर में ब्रिटेन में सर हैनरी कैंपबेल बैनरमैन के नेतृत्व में नई कैबिनेट बनी. हॉपकिर्क लिखते हैं कि रूस और ब्रिटेन दोनों सरकार अब एशिया के बारे में विवाद हमेशा के लिए हल करना चाहती थीं. जिस पर हालिया दशकों में दोनों देशों का बहुत समय और ऊर्जा ख़र्च होती चली आ रही थी.

उन्होंने लिखा है कि कई महीनों तक चलने वाली ये वार्ता सिर्फ तीन देशों तिब्बत, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान पर केंद्रित थी और ये तीनों देश भारत की सुरक्षा के लिए बहुत ज़रूरी थे.

बहुत से मतभेद और ले देने के बाद अंत में अगस्त सन 1907 में ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर एडवर्ड ग्रे और रूस के विदेश मंत्री काउंट एलेक्ज़ेंडर अज़ोलुस्की के बीच समझौता हो गया.

"ग्रेट गेम तेज़ी से ख़त्म होने की तरफ़ बढ़ रहा था." हॉपकिर्क लिखते हैं कि ब्रिटेन अब जर्मनी के बारे में फिक्रमंद था.

"31 अगस्त को सेंट पीटर्सबर्ग में बहुत गोपनीयता के साथ रूस-ब्रिटेन ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए."

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समझौता ये हुआ था कि दोनों देश तिब्बत में दख़ल नहीं देंगे और इसके साथ कोई भी मामला चीन के ज़रिये तय किया जायेगा.

हॉपकिर्क लिखते हैं कि रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर ब्रिटेन का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया और दोनों ने वहां अपने एजेंट्स न भेजने का वदा किया.

वो लिखते हैं कि ब्रिटेन ने मध्य एशिया में ज़ार के शासन का विरोध न करने का भी आश्वासन दिया. ईरान के मामले में, इस फैसले के अनुसार देश की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसके उत्तरी और मध्य भागों में रूस के प्रभाव को स्वीकार कर लिया गया जबकि देश के दक्षिण में ब्रिटेन के प्रभाव को स्वीकार कर लिया गया.

रूस और ब्रिटेन के बीच इस समझौते का दोनों देशों में कड़ा विरोध हुआ. हॉपकिर्क लिखते हैं कि ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को भी उनकी सलाह न लेने पर सख़्त एतराज़ था.

"आखिरकार रूस के हमले का डर ख़त्म हो गया. इस काम में लगभग एक सदी लग गई जिसमें दोनों तरफ़ से बहुत से बहादुर लोगों की जाने गईं लेकिन आखिर विवाद कूटनीति के द्वारा ही सुलझा."

हॉपकिर्क लिखते हैं अगस्त सन 1914 में रूस और ब्रिटेन एशिया और यूरोप में जर्मनी और तुर्की के विरुद्ध जंग में एक साथ मिलकर शामिल हो गए.

लेकिन फिर रूस में अक्टूबर सन 1917 में क्रांति हुई और नई सरकार की तरफ़ से सन 1907 के सारे समझौते ख़त्म कर दिए गए. हॉपकिर्क लिखते हैं इसके बाद 'ग्रेट गेम' नए रूप में एक बार फिर शुरू हो गया.

BBC Hindi
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English summary
'The Great Game': When Karakoram became the base of spies, Russia and Britain's struggle for occupation on the Indian side
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