मौत के बाद क्या होता है, विचित्र जानवर, डर या खुशी? वैज्ञानिकों ने सुलझाई सबसे बड़ी रहस्यमयी गुत्थी!

मरने के बारे में बात करना कभी भी बातचीत का सबसे खुशमिजाज विषय नहीं रहा है, लेकिन फिर भी लोगों के मन में ये जानने की उत्सुकता रहती है, कि मरने के बाद क्या होता है?

वॉशिंगटन, मई 20: मरने के बारे में बात करना कभी भी बातचीत का सबसे खुशमिजाज विषय नहीं रहा है, लेकिन फिर भी लोगों के मन में ये जानने की उत्सुकता रहती है, कि मरने के बाद क्या होता है? जीवन के महान अनुत्तरित प्रश्नों में से एक, कि मरने के बाद क्या होता है, इसका जवाब हर कोई जानना चाहता है और विज्ञान से ही जाना जा सकता है, कि मरने के बाद किसी इंसान की आत्मा के साथ क्या होता है? आत्मा कहा जाता है, क्या वास्तव में स्वर्ग या नर्क होते हैं?

सबसे बड़ा रहस्य

सबसे बड़ा रहस्य

किसी इंसान की मौत होने के बाद डॉक्टर हमें बता सकते हैं, कि उसकी मौत कैसे हुई है और हम जानते हैं, कि किसी इंसान की मौत होने के बाद उसके शरीर का क्या किया जाता है, लेकिन गहरा रहस्य इस सवाल में है, कि किसी व्यक्ति की आत्मा का क्या होता है, अगर ऐसी कोई चीज मौजूद है और जब वे इस नश्वर शरीर को छोड़कर बाहर निकल जाती है। और इसका उत्तर देने का हमारा सबसे अच्छा मौका शायद उन लोगों से जानना है जो 'मर गए' हैं और वापस आ गए हैं। ब्रिटिश न्यूज पेपर डेली स्टार ने कई शीर्ष न्यूरोलॉजिस्ट और डॉक्टरों से इस मुद्दे पर बात की है और उनसे जानने की कोशिश की है, कि आखिर मरने के बाद क्या होता है? इसके साथ ही उन लोगों से भी बात की गई है, जिनके बारे में दावे किए गये हैं, कि वो मरकर जिंदा हो गये।

मृत्यु... सिर्फ एक प्रक्रिया है

मृत्यु... सिर्फ एक प्रक्रिया है

मरना उतना भी बुरा नहीं है, जितना लोग डरते हैं। कम से कम डॉ. कैथरीन मैनिक्स तो यही मानती हैं, जो जीवन और मृत्यु को लेकर पिछले कई सालों से काम करती आ रही हैं और एक माहिर डॉक्टर हैं। डॉ. कैथरीन मैनिक्स ने कहा कि, "मेरी विनम्र राय में, मरना शायद उतना बुरा नहीं है जितना लोग उम्मीद कर रहे हैं'। उन्होंने कहा कि, "हमने सामान्य मानव मृत्यु के समृद्ध ज्ञान को खो दिया है और यह हमारे लिए मरने और ज्ञान को पुनः प्राप्त करने के बारे में बात करने का समय है। मरना, जन्म लेने की तरह, वास्तव में सिर्फ एक प्रक्रिया है। धीरे-धीरे लोग थकते जाते हैं, कमजोर होते जाते हैं और फिर मर जाते हैं'।

मृत्यु से घबराने की जरूरत नहीं

मृत्यु से घबराने की जरूरत नहीं

'विद द एंड इन माइंड' की लेखक डॉ मैनिक्स ने बीबीसी आइडियाज़ के लिए एक शॉर्ट फिल्म में मृत्यु के बारे में बात की। जिसमें उन्होंने कहा कि, 'हमें मौत के बारे में बात करने के तरीके को बदलने की जरूरत है और 'डी' शब्द से नहीं घबराना चाहिए। जब कोई मरने वाला होता है तो क्या होता है, इस बारे में खुलकर बातचीत करके वह वर्जना को तोड़ने का लक्ष्य रखती है। उन्होंने कहा कि, "मृत्यु" जैसे भावों का उपयोग करते समय खतरा यह है कि परिवार यह नहीं समझ सकते हैं कि मृत्यु निकट आ रही है और ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां लोग नहीं जानते कि कैसे इस हैंडल करना है या किसी प्रियजन को क्या कहना है जो मर रहा है।

मौत के होते हैं पांच स्टेज

मौत के होते हैं पांच स्टेज

डॉ थॉमस फ्लेशमैन का मानना है कि मरने के पांच चरण होते हैं। डॉ थॉमस फ्लेशमैन एक विख्यात डॉक्टर हैं, जो पिछले 35 सालों से इन विषयों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने सिद्धांत को उन सैकड़ों रोगियों के साथ बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट तैयार किया है, जिन्हें "मृत्यु के बेहद नजदीक से अनुभव" हुए हैं। फ्लेशमैन ने अपनी डॉक्टरी की पेशा में करीब 2,000 लोगों की मौत देखी है और उनपर रिसर्च किया है। 2014 में हैम्बर्ग में टेड टॉक में उन्होंने कहा था कि, "पहला चरण अचानक परिवर्तन होता है और, एक पल से दूसरे क्षण में, सभी दर्द दूर हो जाते हैं। सारी चिंताएं खत्म हो जाती हैं और लोगों के मन से डर खत्म हो जाता है और उसे सिर्फ और सिर्फ हर तरफ शांति दिखने लगती है। कई बार मरने वाला इंसान अंदर से काफी खुश हो जाता है'। डॉ. फ्लेशमैन की ये बातें हमारी सोच से पूरी तरह अलग हैं, क्योंकि साधारणतया लोगों का यही मानना होता है, कि आखिरी वक्त में लोग काफी डर जाते होंगे, क्योंकि अब उनकी मौत होने वाली होती है।

मौत के बाकी चरण

मौत के बाकी चरण

डॉ फ्लेशमैन दूसरे चरण को "शरीर से बाहर के अनुभव" के रूप में वर्णित करते हैं, जहां लोगों को ऐसा लगता है कि वे "खुद से ऊपर उड़ रहे हैं" और अंत में "खुद को स्ट्रेचर पर लेटे हुए देखते हैं"। उन्होंने कहा कि, तीसरा चरण 98-99% लोगों के लिए "आरामदायक" लगता है, लेकिन 2% तक लोग "भयानक शोर, भयानक गंध और भयानक जीवों" को देखने की बात करते हैं। चौथे चरण में वे कहते हैं कि, रोगी अक्सर कहता है कि, वो काफी तेज प्रकाश को देख रहा है और उसकी आंखों के सामने से सारा कालापन गायब हो चुका है और इस दृश्य को रोगिया ने काफी ज्यादा उज्ज्वल और आकर्षक बताया है। इसके साथ ही मौत के पांचवें चरण को लेकर वह कहते हैं कि, मृत्यु के अत्यंत करीब से बचकर आए कुछ रोगियों ने कहा कि, उन्होंने काफी सुंदर वातावरण देखा, काफी सुंदर रंग देखे। वहीं, कुछ रोगियों ने कहा कि, उन्होंने हर तरफ शांति और एक अलग तरह के प्यार का अनुभव किया।

मौत के फौरन बाद क्या होता है?

मौत के फौरन बाद क्या होता है?

कई रिसर्च में पाया गया है कि, मौत के बाद भी कुछ देर तक डेड बॉडी का दिमाग काम करता रहता है, जिसका मतलब ये होता है, कि वो जान सकते हैं, कि वो मर चुके हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि, सेरेब्रम में मस्तिष्क का काम जारी रहता है और दिमाग का वह हिस्सा दिल के रुकने के बाद भी शरीर को संकेत भेजता रहता है और शरीर को सचेत करने की कोशिश करता रहता है। न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी लैंगोन मेडिकल सेंटर के डॉ सैम पारनिया ने कहा कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को मरने में कई दिन लग सकते हैं। 2016 में पश्चिमी ओंटारियो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चार लोगों के शवों की जांच की, जिनका लाइफ सपोर्ट मशीनें बंद थीं। तीन मामलों में दिल की फेल होने के बाद मस्तिष्क की गतिविधि बंद हो गई। लेकिन एक मामले में, मस्तिष्क तरंगें उन्हें मृत घोषित किए जाने के बावजूद शरीर को संकेत भेज रहीं थीं। आमतौर पर ये ब्रेनवेव्स नींद के दौरान ही होती हैं। डॉ पारनिया ने न्यूज़वीक को बताया: "आकर्षक बात यह है कि आपके और मेरे मरने के बाद ही एक समय आता है, कि हमारे शरीर के अंदर की कोशिकाएं धीरे-धीरे अपनी मृत्यु की प्रक्रिया की ओर जाने लगती हैं'। उन्होंने कहा कि, कोशिकाएं तुरंत जीवन से मृत में परिवर्तित नहीं होती हैं। वास्तव में, कोशिकाएं हृदय गति के रुकने के बाद भी कई बार काम करती रहती हैं, जितना हमें पता चला है।

क्या इंसान बन जाता है अलौकिक प्राणी?

क्या इंसान बन जाता है अलौकिक प्राणी?

साल 2006 में डेविड डिचफील्ड नाम का एक शख्स रेलवे प्लेटफॉर्म पर अपने एक दोस्त को छोड़ने के लिए जाते हैं, लेकिन ट्रेन खुलते समय उनका पोट ट्रेन के दरवाजे से फंस जाता है और वो गिर जाते हैं। उन्हें फौरन लगा, कि अब वो मरने वाले हैं। वो ट्रेन और प्लेटफॉर्म के बीच फंसकर फिर ट्रेन की पटरियों के नीचे आ गये। वो पटरियों के बीच में फंस गये थे और ट्रेन उनके ऊपर से गुजर चुकी थी। इस दौरान वो बुरी तरह से घायल हो गये थे और उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। कैम्ब्रिज के रहने वाले 61 वर्षीय डेविड ने कहा कि, 'मैं कुछ देर के लिए होश में था और मैं अपने ऊपर से ट्रेन को गुजरते देख रहा था, मेरा बायां हाथ कट चुका था और जब मैं अस्पताल पहुँचा तो मैं बहुत दर्द में था और मुझे मौत का डर सता रही थी। उन्होंने कहा कि, तब, मुझे लगा कि मैं अपना शरीर छोड़ रहा हूं और अचानक से सारी चिंताओं से मैं मुक्त होने लगा और मैं एक अंधेरे कमरे में था, जहां शांति ही शांति थी। उन्होंने कहा कि, मुझे लगा कि मैं मर चुका हूं और इस जगह पर मुझे अत्यधिक राहत महसूस हो रही थी।

चारों तरफ रोशनी ही रोशनी

चारों तरफ रोशनी ही रोशनी

उन्होंने कहा कि, 'फिर मैंने देखा कि चारों तरफ सिर्फ रोशनी ही रोशनी है और मैं रोशनी का पूंज मुझे छू रहा है'। उन्होंने कहा कि, उस वक्त मैंने अस्पताल की ट्रॉली को पकड़ने की कोशिश की, लेकिम मैंने महसूस किया, कि मैं अस्पताल में ट्रॉली पर नहीं, बल्कि एक विशालकाय चट्टान के पास था और ऊपर देखने पर, मुझे सितारों का एक विशाल झरना दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा कि, "मैंने अपने पैरों से किसी की उपस्थिति महसूस की, एक सफेद गोरा बाल वाला व्यक्ति, जिसकी त्वचा भीतर के प्रकाश से चमक रही थी, लेकिन उन्होंने एक काले रंग की टी-शर्ट पहन रखी थी। वो मुझे दिखा और मुझे ऐसा लग रहा था, कि यह प्राणी मेरी देखभाल करेगा और मुझे ठीक करेगा।

पूरी तरह बदल गई जिंदगी

पूरी तरह बदल गई जिंदगी

डेविड डिचफील्ड ने कहा कि, मुझे थोड़ा थोड़ा ये भी समझ आ रहा था, कि डॉक्टर मेरा इलाज कर रहे हैं, लेकिन मैं खुद को विशालकाय चट्टान पर देख रहा था और मैं बार बार अस्पताल में अपने इलाज की तरफ लौटना चाहता था। इस दौरान मैंने देखा कि सफेद रोशनी की एक सुरंग मेरे पास आ रही है, जिसके किनारे पर आग की लपटें उठ रही हैं, और टेलीपैथिक रूप से प्राणियों के साथ संचार के माध्यम से उन्होंने मुझे बताया कि, यह सारी सृष्टि का स्रोत है। और फिर मैं अस्पताल में वापस अपने शरीर में आ गया, जहां मेरा इलाज चल रहा था। उन्होंने कहा कि, इस घटना के बाद मैं पूरी तरह बदल दिया और जो अनुभव में उस वक्त किया, वो कभी नहीं तिया था। आपको बता दें कि, डेविड डिचफील्ड ने इन अनुभवों पर 'शाइन ऑन' नाम की एक किताब भी लिखी है। जिसमें उन्होंने उन पलों का वर्णन किया है।

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